रमज़ान का बयान

रमज़ान ,चाँद देखने, रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ो का बयान , रोजा टूटने की उन सूरत ओं का बयान जिनमें सिर्फ कजा लाजिम है।

(1) रमज़ान

  भी मिस्ल नमांज़ के फ़र्ज़े ऐन है इसकी फर्जियत का मुनकिर काफिर और बिला उज्ज्र छोड़ने वाला सख्त गुनहगार और दोज़ख का सज़ादार जो बच्चे रोज़ह रख सकते हों उनको रखाया जाये ओर कवी मज़बूत लड़के लड़कियों को मार कर रख या जाये । पूरे एक महीना रमज़ान का रोजा कर्ज हैं । शरीयत में रोज़ा के मानी हैं अल्लाह की एबादत की नीयत से सुबह सादिक से लेकर सूरज डूबने तक खाने पीने और जेमा से अपने को के रखना रोज़ा के लिये औरत का हैज़ व नेफास से खाली होना शर्त है मानी हैज़ व नेफास की हालत में रोज़ह सही नहीं । हैज़ व नेफास वाली पर फर्ज है कि पाक होने के बाद इन दिनों के रोज़ा की क़ज़ा रक्खे नाबालिग़ पर रोज़ा फर्ज़ नहीं और मजनून पर भी फर्ज़ न होगा जबकि पूरा महीना रमज़ान का जुनून की हालत में गुज़र जाये और अगर किसी एक दिन में 


भी ऐसे वक्त में होश आया कि वह वक्त रोज़ा की नीयत का वक्त है तो पूरे • महीने की कज़ा लाजिम है । मसलन शुरु रमजान से पागल हुआ और • उन्तीसवीं तारीख को सुबह सादिक़ से जहवए कुबरा तक किसी वक्त में होश आया तो पूरे रमज़ान की कज़ा लाज़िम हुई । 

मसला 

- रमज़ान के अदा रोज़े और नज़रे मुअय्यन और नफिल व सुन्नत व मुस्तहब व मकरूह रोजों की नीयत का वक्त सूरज डूबने से लेकर ज़हवए कुबरा तक है । उस वक्त जब नीयत कर ले यह रोज़े हो जायेंगे लेकिन रात ही में कर लेना बेहतर है इन 6 रोज़ों के अलावा जितने रोज़े हैं ( जैसे रमज़ान की क़ज़ा का रोज़ा गैर मुअय्यन नज़र का रोज़ा नफिल की कज़ा का रोज़ा , मुअय्यन नज़र की कज़ा का रोज़ा , कफ़्फ़ारे का रोज़ा और जेनायत का रोज़ा और तमत्तोका रोज़ा ) इन सब रोज़ों की नीयत के लिये वक़्त सूरज डूबने के बाद से सुबह सादिक शुरु होने तक है इसके बाद नहीं और इनमें से जो रोज़ा रक्खा जाये खास उसकी नीयत भी ज़रूरी है । जैसे यूं नीयत करे कि कल मैं अपने 28 तारीख रमज़ान की क़ज़ा का रोज़ा रक्खूंगा या जो मैंने एक दिन के रोज़े की मिन्नत मानी थी कल उसका रोज़ा है और इसी तरह जो रोज़ा रखना हो उसको नीयत में मुक़र्रर करे ।

 मसला 

- रोज़ा की नीयत ज़हवए कुबरा शुरु होने से पहले हो जानी चाहिये और अगर ख़ास उस वक़्त यानी जिस वक़्त आफताब खते निस्फुन्नहारे शरई पर पहुंच गया तब नीयत की तो रोज़ा न हुआ ।  मसला 

- जिस तरह और एबादतों में बताया गया कि नीयत दिल के एरादे का नाम है ज़बान से कहना कुछ ज़रुरी नहीं । उसी तरह यहां रोज़ह में भी वही मुराद है अलबत्ता ज़बान से कह लेना अच्छा है । अगर रात में नीयत करे तो यूं कहे नीयत की मैंने अल्लाह तआला के लिये इस रमज़ान का फ़र्ज़ रोज़ा कल रक्खूंगा और अगर दिन में नीयत करे तो यह कहे नीयत की मैंने कि अल्लाह तआला के लिये आज रमज़ान का फ़र्ज़ रोजा रखूंगा ।

 • मसला

 - दिन में नीयत करे तो जरूरी है कि यह नीयत करे कि मैं 
| सुबह सादिक से रोज़ादार हूँ और अगर यह नीयत है कि अब से रोज़ादार | हूँ सुबह से नहीं तो रोज़ा न होगा । 

मसला

- तीसवीं शाबान के बारे में अगर यह शक हो कि यह पहली रमज़ान है या तीसवीं शाबान उस दिन खालिस नफ़िल की नीयत से रोज़ा रख सकते हैं लेकिन इस नीयत से नहीं कि अगर यह दिन रमज़ान साबित हुआ तो रमज़ान का रोज़ा वरना नफ़िल का कि ऐसी नीयत से रोज़ा मकरूह तहरीमी है हाँ अगर ऐसी तीसवीं तारीख उसकी आदत के दिन में पड़े तो फिर रोज़ा रखना ही अफ़ज़ल है । जैसे कोई शख्स हमेशा जुमेरात का रोज़ा रक्खा करता है और उसी तीसवीं शाबान को जुमेरात पड़ी तो वह अपना नफिल रोज़ा रक्खे ।

 मसला -

 शक के दिन ज़हवए कुबरा के शुरु होने तक इन्तेज़ार करें अगर उस वक़्त तक चाँद देखना साबित हो जाये तो रमज़ान के रोज़े की नीयत कर लें वरना खायें पीयें । 

मसला 

- आखीर शाबान में एक या दो दिन का रोज़ह मकरूह है और तीन या तीन दिन से ज़्यादा का मकरूह नहीं । 

मसला

 ईद के दिन का रोज़ह मकरूह तहरीमी है और इसी तरह बक़रईद के दिन का और उसके बाद ग्यारह बारह , तेरह तारीख तक का ।

 मसला 

- सुन्नत व नफ़िल रोज़े का तन्हा रखना मकरूह तन्ज़ीही है जैसे दसवीं मोहर्रम का रोज़ह न्नत है लेकिन अकेला रोज़ह मकरूह है इसके साथ एक और मिलाया जाये यानी नवीं दसवीं रक्खें और दसवीं ग्यारहवीं का रखने में भी हर्ज नहीं । 

मसला

 - औरत को नफिल रोज़ा बिला एजाज़त शौहर के मकरूह तन्ज़ीही है । 

मसला

 - रोज़ह रखने की मिन्नत मानी तो काम पूरा होने पर इसका रखना वाजिब है । 
मसला 

- नफिल रोज़ा रख कर तोड़ दिया तो अब इसकी कज़ा वाजिब है । 

     (2)   चाँद देखने का बयान 


चाँद देखने का बयान •

 रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फरमाया चांद देख कर रोजह रखना शुरु करो और चांद देख कर अफतार ( ईद करो और अगर अब्र हो तो शाबान की गिनती तीस पूरी कर लो और फ़रमाया रोज़ह न रक्खो जब तक चांद न देख लो और अफ्तार ( ईद ) न करो जब तक चांद न देख लो और अगर अब्र हो तो मेक़दार पूरी कर लो ( यानी तीस दिन ) 
मसला
 - पांच महीनों का चांद देखना वाजिबे केफाया है ।
 ( 1 ) शाबान 
( 2 ) रमज़ान
 ( 3 ) शव्वाल
 ( 4 ज़िक़ादह 
( 5 ) ज़िलहिज्जा 

मसला 

- शाबान की उन्तीस को शाम के वक़्त चांद देखें । दिखाई दे तो कल रोज़ा रक्खें वरना शाबान के तीस दिन पूरे करके रमज़ान का महीना शुरु करें ।

 - मसला

 - मतला साफ़ न होने की सूरत में यानी अब्र व गुबार सिर्फ रमज़ान का सुबूत एक मुसलामान आकिल , बालिग़ , मस्तूर या आदिल की गवाही से हो जाता है । चाहे मर्द हो या औरत और रमजान के सिवा बाक़ी तमाम महीनों के चांद के लिये दो मर्द या एक मर्द और दो औरतें गवाही दें और सब आदिल हों और यह लफ़्ज़ कहें कि गवाही देता हूँ कि मैंने खुद चाँद देखा तब चाँद का सुबूत होगा । 

आदिल होने के यह मानी हैं कि कबीरा गुनाहों से बचता हो और सगीरा पर इसरार न करता हो और ऐसा काम न करता हो जो मुख़्वत के खेलाफ़ हो । मसलन बाज़ार में खाना और मस्तूर से यह मुराद है कि जिसका ज़ाहिर हाल शरा के मुताबिक़ है मगर बातिन का हाल मालूम नहीं । 

मसला-

 जिस आदिल शख्स ने रमज़ान को चांद देखा उस पर वाजिब है कि उसी रात में शहादत अदा करे । 

मसला

 - गांव में चाँद देखा और वहां कोइ शरई क़ाज़ी व हाकिम नहीं जसके पास गवाही दे तो गाँव वालों को जमा करके शहादत अदा करे और अगर यह आदिल है तो लोगों पर रोज़ह रखना लाजिम है । 

मसला

- जब मतला साफ न हो तो ईद के चांद का सुबूत आकिल बालिश , आदिल दो मर्दों या एक मर्द दो औरतों की शहादत से होगा । 

मसला

अगर मतला साफ हो तो जब तक बहुत से लोग शहादत न दें चांद का सुबूत नहीं हो सकता ( चाहे रमज़ान का हो या ईद का या और किसी महीने का ) रहा यह कि इसके लिये कितने लोग होने चाहिये तो यह काज़ी की राए पर है जितने गवाहों से उसे ग़ालिब गुमान हो जाये उतनों की शहादत से चांद होने का हुक्म दे देगा लेकिन अग़र शहर बाहर से या किसी ऊँची जगह से चाँद देखना बयान करे तो एक मस्तूर का भी क़ौल सिर्फ रमज़ान के चाँद में मान लिया जायेगा । मैं यह कहता हूँ कि चाँद देखने में लोगों की जो सुस्ती व लापरवाही का हाल है इसके एतबार से तो मतला साफ होने की हालत में ईद के सिवा और चांदों में भी बजाये बहुत आदमियों के दो गवाहों की गवाही काफ़ी होनी चाहिये ।

 मसला 

 - शहादत देने में यह कहना ज़रूरी है कि मैं गवाही देता हूँ बेगैर इस लफ़्ज़ के शहादत नहीं मगर अब्र में रमज़ान के चांद की गवाही में इतना भी काफी है कि मैंने अपनी आंख से इस रमज़ान का चांद आज या कल या फुलां दिन देखा है । 

मसला

 - अगर कुछ लोग आ कर यह कहें कि फुलां जगह चांद हुआ बल्कि अगर शहादत भी दें कि फलां जगह चाँद हुआ बल्कि अगर यह शहादत दें कि फलां फलां ने देखा बल्कि अगर यह शहादत दें कि फलां जगह के काज़ी ने रोज़ह या अफ्तार के लिये लोगों से कहा यह सब तरीके ना काफ़ी हैं ।

 मसला

 - तन्हा एमाम या क़ाज़ी ने ईद का चांद देखा तो उन्हें करना या ईद का हुक्म देना जाएज़ नहीं ।

 मसला

 - किसी शहर में चांद हुआ और वहाँ से मुतअद्दिद जमाअतें दूसरे शहर में आईं और सबने ख़बर दी कि वहाँ फ़लां दिन चांद हुआ है और तमाम शहर में यह बात मशहूर है और वहां के लोगों ने रुयत की बिना पर फलां दिन से रोजे शुरु किये तो यहाँ वालों के लिये भी सुबूत हो गया । 

        (3) रोज़ह तोडने वाली चीज़ो का बयान 

रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों का बयान 

मसला

 खाने या पीने या जेमा करने से रोजा टूट जाता है जबकि रोज़ादार होना याद हो और अगर रोज़दार होना याद न रहा और भूल कर खा लिया या पी लिया या जेमा कर लिया तो रोज़ा न गया 

मसला 

- हुका , सिगरेट , बीड़ी , चुरुट , सिगार पीने से रोज़ा टूट जाता है ।

  मसला 

- पान या तम्बाकू , सुर्ती खाने से भी रोज़ा टूट जाता है अगरचा पीक थूक दी हो । 

मसला

 - शकर , चीनी , गुड़ वगैरह ऐसी चीजें जो मुंह में रखने से घुल जाती हैं मुंह में रक्खी और थूक निगल गया तो रोज़ा टूट गया । मसला - दांतों में कोई चीज़ चने बराबर या इससे ज़्यादा थी उसे खा गया या कम ही थी मगर मुंह से निकाल कर फिर खा ली तो रोज़ा टूट गया । 

मसला 

- दाँतों से खून निकल कर हलक से नीचे उतरा और खून थूक से ज्यादा या बराबर था या कम था मगर उसका मज़ा हलक में मालूम हुआ तो इन सब सूरतों में रोज़ा जाता रहा और अगर खून कम था और मज़ा भी मालूम न हुआ तो रोज़ा न गया । 

मसला 

हिक़ना लिया या नथुनों में दवा चढ़ाई या कान में तेल डाला या तेल चला गया तो रोज़ा टूट गया और अगर पानी कान में चला गया या डाला तो रोज़ा नहीं टूटा । 

मसला 

- कुल्ली कर रहा था बिला क़स्द पानी हलक से उतर गया या नाक में पानी चढ़ा रहा था पानी देमाग़ में चढ़ गया तो रोज़ा टूट गया लेकिन अगर रोज़ा होना भूल गया हो तो न टूटेगा ।

 मसला 

- सोते में पानी पी लिया या कुछ खा लिया या मुंह खोला था और पानी का कतरा या ओला हलक में चला गया तो रोज़ा टूट गया । 

मसला

 - दूसरे का थूक निगल गया या अपना ही थूक हाथ पर लेक निगल गया तो रोज़ा जाता रहा ।

 मसला

 - मुंह में रंगीन डोरा रक्खा जिससे थूक रंगीन हो गया फिर थूक निगल लिया तो रोज़ा टूट गया । 

मसला

 - आंसू मुह में चला गया और निगल लिया अगर बूंद दो बूंद है तो रोज़ा न गया और अगर ज़्यादा था कि उसकी नमकीनी पूरे मुंह में मालूम हुई तो रोज़ा टूट गया । पसीना का भी यही हुक्म है ।

 मसला

 - मर्द ने औरत का बोसा लिया या छुआ या मुबाशरत की या गले लगाया और इनज़ाल हो गया तो रोज़ा जाता रहा और अगर औरत ने मर्द को छुआ और मर्द को इनज़ाल हो गया तो रोज़ा न टूटा । औरत को कपड़े के ऊष्ण से छुआ और कपड़ा इतना मोटा है कि बदन की गर्मी मालूम न हुई तो राजा . न टूटा अगरचा इनज़ाल हो गया हो । 

मसला

 - मुबालग़ा के साथ इस्तिन्जा किया यहां तक कि हिकना रखने की जगह तक पानी पहुंच गया तो रोज़ा टूट गया और इतना मुबालग़ा चाहिये भी नहीं कि उससे सख्त बीमारी का अन्देशा है । 

मसला

 - मर्द ने पेशाब के सूराख में पानी या तेल डाला तो रोज़ा न टूटा चाहे मसाना तक पहुंच गया हो और अगर औरत ने शर्मगाह में तेल या पानी टपकाया तो रोज़ा टूट गया । 

. मसला

 - औरत ने पेशाब के मुक़ाम में रुई या कपड़ा रक्खा और बिल्कुल वाहर न रहा तो रोज़ टूट गया और सूखी उंगली किसी ने पाखान मुकाम में रक्खी या औरत ने शर्मगाह में रक्खी तो रोज़ा न गया और पाखाना के अगर उंगली भीगी थी या उस पर कुछ लगा था तो रोजा टूट मुकाम में उस जगह रक्खी हो जहां अमल देते वक्त हिक़ना सिरा रखते हैं । 

 मसला

 - क़सदन भर मुंह के की और रोज़ादार होना याद है तो रोज़ा टूट गया और अगर मुंह भर से कम की तो रोज़ा न टूटा । 






नोट

हेलो दोस्तों 
 हमारी इस्लामिक वेबसाइट हिंदी इस्लामिक नॉलेज वेबसाइट को फॉलो करें ज्यादा ज्यादा लोगों को शेयर करें आपको कमेंट करके बताएं आप किस तरह के हदीस पढना चाहते हैं उसी तरह की आपको हदीस मिलेगी इंशा अल्लाह

टिप्पणियाँ