आखिरी नबी मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का बयान और उनके बयान से ताल्लुक सवाल-जवाब
सवाल
- आख़री नबी सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम की पैदाइश की तारीख क्या है ?
जवाब
- 12 रबीउलअव्वल पीर के दिन आम्मुल फील ( यानी हाथी वाले हादसे का साल ) के चालीस या पचास दिन बाद
सवाल
- पैदा होने के बाद आपने किन औरतों का दूध पिया ?
जवाब
– माँ हज़रत आमिना का , अबु लहब की बाँदी सोवैबा और हलीमा सादिया का ।
सवाल
क्या यह सही है कि जिस साल नबी - ए- करीम सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम की पैदाइश हुई उस साल दुनिया की सारी औरतों से सिर्फ लड़का ही पैदा हुआ कोई लड़की पैदा न हुई ?
जवाब
- हाँ अल्लाह तआला ने तमाम हमल वाली औरतों के लिये एैसा ही हुक्म दिया था ।
सवाल
- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम और हज़रत ईसा के दरमयान कितने साल का फ़ासला था यानी ज़मानऐ फ़ितरत कितने साल रहा ?
जवाब
तकरीबन 600 साल का इस दरमयान कोई नबी जवाब तशरीफ़ नहीं लाऐ ।
सवाल
हुजूर सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम के नसब कितने नबी आते हैं ?
जवाब
– छ : नबी आते हैं , हज़रत इस्माईल , हज़रत इब्राहीम , हज़रत नूह , हज़रत इदरीस , हज़रत शीस , हज़रत आदम अलैहिमुस्सलाम ।
सवाल
- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम के नाम कितने हैं ?
जवाब
- बेशुमार नाम हैं हुजूर के नाम हर जिन्स में अलग अलग और हर तबके में जुदा - जुदा हैं , अब तक आलिमों व इमामों ने जो नाम शुमार किये हैं 1400 हैं ।
सवाल
- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम का ज़ाती नाम लेकर पुकारना यानी या मुहम्मद , या अहमद कहना कैसा है ?
जवाब
- या मुहम्मद , या अहमद कहना हराम है , बल्कि या नबिय्यल्लाह , या रसूलल्लाह कहा जाऐ ।
सवाल
नबी - ए - करीम सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम का सीन ए मुबारक कितनी बार चीरा गया ?
जवाब
चार बार चीरा गया , पहली बार जब आप हलीमा सअदिया के घर थे , और आपकी उमर मुबारक चार साल की थी , दूसरी बार दस साल की उमर में , तीसरी बार नुबुव्युत का ऐलान करने से करीब जब वही आने का वक्त क़रीब हुआ , • चौथी बार मेराज की रात में ।
सवाल-
क्या हुजूर सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम के पाख़ाना और पैराब पाक हैं ?
जवाब
- हाँ सब पाक व तय्यब हैं ।
सवाल
- प्यारे नबी का वह कौनसा मोअजज़ा ( चमत्कार ) है जो हमेशा रहेगा ओर कभी ख़त्म नहीं होगा ?
जवाब
- कुरान पाक ।
सवाल
- ल - प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम ने जिहाद में अपने मुबारक हाथ से कितने बदबख़्तों को क़त्ल किया ?
जवाब
- सिर्फ उबइ इब्ने ख़ल्फ़ को क़त्ल किया ।
सवाल
- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम ने कितनी औरतों से शादी की ?
जवाब
ग्यारह औरतों से ( 1 ) हज़रत खदीजतुल कुबरा ( 2 ) हज़रत सौदह बिन्त ज़मआ ( 3 ) हज़रत आइशा ( 4 ) हज़रत उम्मे सलमह ( 5 ) हज़रत हफ़सह ( 6 ) हज़रत ज़ैनब बिन्त खुज़ैमह ( 7 ) हज़रत जैनब बिन्त जहश ( 8 ) हज़रत जुवैरिया बिन्त हारिस ( 9 ) हज़रत सफिय्या ( 10 ) हज़रत मैमूना ( 11 ) हज़रत उम्मे हबीबा बिन्त अबी सुफ़यान।
सवाल
- आपकी औलादें कितनी हुई ?
जवाब
– सात , चार साहिबज़ादियाँ और तीन साहिबज़ादे ( 1 ) हज़रत ज़ैनब ( 2 ) हज़रत रुक़य्या ( 3 ) हज़रत उम्मे कुलसूम ( 4 ) हज़रत फातिमा ज़ोहरा ( 5 ) हज़रत क़ासिम ( 6 ) हज़रत अब्दुल्लाह ( 7 ) हज़रत इब्राहीम । छः औलादें हज़रत खदीजा के पेट से पैदा हुई , और बाक़ी हज़रत इब्राहीम मरिया क़िबतिया से पैदा हुऐ ।
सवाल
- यह औलादें किस तरतीब से पैदा हुई ?
जवाब
- सबसे पहले हज़रत कासिम , फिर हज़रत ज़ैनब , फिर हज़रत रुकय्या , फिर हज़रत फातिमा , फिर हज़रत उम्मे कुलसूम , फिर हज़रत अब्दुल्लाह इन छः हज़रात की पैदाइश मक्के में हुई और हज़रत इब्राहीम की पैदाइश मदीने में हुई ।
सवाल
- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम के वाज़ीर कितने हैं ?
जवाब
- चार हैं , दो आसमान में और दो ज़मीन में आसमान हज़रत जिब्राईल , व मीकाईल अलैहिमस्सलाम और ज़मीन में हज़रत अबु बक सिद्दीक़ व उमर फारुक रदियल्लाहु अनहुमा ।
सवाल-
हमारे नबी को इबनुज़्ज़बीहैन ( यानी दो ज़बीहों का बेटा ) क्यों कहा जाता है ?
जवाब -
इसलिये कि एक ज़बीह ( ज़िबह किये हुऐ ) तो हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम हैं जो हमारे नबी के आबा व अजदाद ( बाप - दादा ) में से हैं और दूसरे ज़बीह खुद हुजूर सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम के बाप हज़रत अब्दुलल्लाह हैं कि जब हज़रत अब्दुलमुत्तलिब नज़र पूरी करने के लिये उन्हें ज़िबह करने चले तो सौ ऊँट के बदले से उनकी जान बची , इसलिये आप इनुज्ज़बीहैन कहलाऐ ।
नोट अं
ज़वगत और गज़ावत - ए - पैग़म्बरी नबी की मुबारक वीवियाँ और पाक लड़ाईयाँ
रमूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' चालीस साल के थे , जब हज़रत जिवराईल आपके पास आये और आपको बताया कि वो नवी है । तीन साल वाद आपने मक्का में अपनी नवुव्वत का ऐलान किया । उस साल को बिधात का साल कहा जाता है । आपने 27 वार जिहाद ( मजहवी लड़ाई ) किया | उनमें से 9 में आपने खुद ही हमला किया । 18 पाक लड़ाईयों में आप खुद कमांडर थे । आपके चार बेटें चार बेटियाँ ग्यारह वीवियों वारह चाचा व मामा और छः ख़ालाये थी । आप ने 25 साल की उमर में खुदीर्जातुर्लकुवरा से निकाह किया । ख़दीजा - तुल कुवरा के इन्तेकाल के एक साल बाद आपने यानि 55 साल की उम्र में भी अल्लाह के हुक्म से हज़रत अबू बकर रज़ि - अल्लाहु अन्ह ' की वेटी आइशा से निकाह किया । और 63 वरस की उम्र में आपने अपने कमरे में वफात पाई जो मस्जिद के पास था । आपको उसी कमरे में दफनाया गया । जब मस्जिद को वसीअ किया गया था । तो वो कमरा भी मस्जिद में आ गया था । हज़रत अवू वकर और हज़रत उमर ' रज़ि - अल्लाहु अन्हुम ' भी इसी कमरे में दफनाये गये | हगीरा के सातवे साल में आपने , उम्मे हवीवा से निका किया , जोकि मक्का के कुरैश काफिरों के सरदार अवू सूफयान की बेटी थी | अवु सूफयान , हज़रत उमर ‘ रज़ि - अल्लाहु अन्ह ' के वालिद थे | मक्का के फतह होने पर वो ईमान लाये । रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' ने हफसा से निकाह किया जो हज़रत उमर ' रज़ि - अल्लाहु अन्ह ' की वेटी थी | हिजरत के पाँचवे गाल में , आपने जुवैरिय्या को खरीदा , जोकि वनी मुग़तलाक कवीले की पकड़ी गई वांदी थी ह्यमूरेसी की पाक लड़ाईह और सरदार की बेटी थी , उसे छुड़ाया और उससे निकाह किया ( यानि आपने
इस्लामी तौर से उनसे शादी की जिसका ज़िक्र तफ्सील में सआदत अदबिया के पाँचवे एडिशन के वारवें वाव में है । ) मज़हव तरगीव के लिये आपने उम्मा सालामा , सेवदा , ज़ैनव विन हुज़ैमा , मैमुना और सफिय्या ‘ रज़ि - अल्लाहु अन्हुमा ’ से निकाह किया , आपके चाचा की बेटी जैनव से निकाह अल्लाहु तआला ने करवाया जिवराईल ' अलैहिस्सलाम ' आपके पास 24 हज़ार दफा आये | आप 52 साल के थे जब आप मेराज [ सआदत अबदिया के तीसरे एडिशन के 60 वें बाव में मेराज का ज़िक्र तफ्सीर से है । ] पर गये | 53 साल की उमर में आपने मक्का से मदीना हिजरत की । आप और अबू वकर सेवर नाम की गुफा में तीन रातों तक रूके और पीर की रात को गुफा को छोड़ रवाना हुए | हफ्तों पैदल चलने के बाद , वो कूवा पहुँचे , जो मदीना का एक गाँव था | वो 20 सितम्बर को पीर के दिन पहुँचे । और जब वो मदीना पहुँचे वो उसी हफ्ते का जुमा था ।
रमज़ान के मुबारक महीने में वदर की पाक लड़ाई , हिजरत के दूसरे साल , पीर के दिन लड़ी गई | 313 मुसलमान जिहादी जिसमें 8 अलग - अलग कामों में थे , उनके ख़िलाफ़ हज़ारों कुरैश थे । 13 सहावियों ने शहादत हासिल की । अवु जहल और 70 अलग काफिर कत्ल किये गये ।
हैगीरा के तीसरे साल में शव्वाल के महीने में उहुद की पाक लड़ाई हुई 1700 मुसलमानों की फौज , तीन हज़ार मज़बूत काफिरों के ख़िलाफ थी 170 सहावा अकरम शहीद हुए । उहुद की लड़ाई के चार साल वाद 70 जवान सहावा इस्लाम के मिशन पर नजद के वाशिन्दों के पास भेजे गये । जब वो एक जगह जिसका नाम बीरी मैमुना पहुँचे तो पूरे ग्रुप ने घात लगाकर उनपर हमला किया , दो सहावियों को छोड़के सव शहीद हो गये ।
पाँचवा हेरीगल साल हन्दक की लड़ाई का गवाह है | 10 हज़ार काफिरों के मुकाबले में तीन हज़ार मुसलमान थे । काफिरों ने मदीना का मुहासिरा करा | मुसलमानों ने पहले ही मदीना के नीचे एक खाई खोद दी थी | एक साथ पहले हैवर की पाक लड़ाई में जोकि सातवें साल में हुई थी , एक समझौता बैतु - र- रिज़वान , हुदैविया नाम की जगह हुआ । मुता का पाक जिहाद वीजान्दी कैसर हैराकुलैस के ख़िलाफ हुआ | तीन हज़ार मुसलमान , सौ हज़ार मज़बूत वीजान्टीन फौज के खिलाफ थे । जाफर तय्यर ‘ रज़ि - अल्लाहु तआला अन्ह ' ने इस जंग में शहादत पाई । खालिद विन वालिद के ज़रिये ये जंग जीती गई | मक्का आंठवे साल में फतह हुआ | हुनैन एक मशहूर और बड़ी मज़हबी जंग है।वो जीत के साथ ख़त्म हुई हैबर एक जानी मानी गढ़ी है | रसूलुल्लाह ‘ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' ने हज़रत अली ' रज़ि - अल्लाहु तआला अन्ह ' को भेजा और गढ़ी पर फतह हासिल हुई | यह वो जगह थी जहाँ रसूलुल्लाह ‘ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' को ज़हरीला खाना पेश किया गया था और आपने मना कर दिया था । वहाँ से वापसी के वक़्त हज़रत आईशा बदनामी का शिकार हुई , जिसने अल्लाह के नवी को बहुत ग़मगीन कर दिया । आयते करीमा नाज़िल हुई , जिससे पता चला कि वो बदनामी एक शैतानी झूठ था । ताईफ की जीत भी मशहूर है ।
अगर तुम खुशी चाहो , ऐ नौजवान ,
तो मेरे बच्चों , लगातार इस्लाम के लिए रोज़े रखो ।
यह फर्ज़ , वाजिब , सुन्नत और मनदूब है ,
और साथ ही साथ अमर - ए - बिल मारूफ ।
हमेशा इन्हे पूरा करो , कोई भी छूटे ना ,
सगीरा और कवीरा एक जैसे है ।
मकरूह और हराम से बचना भी ज़रूरी है ,
कुल का हक अदा करना भी लाज़िम है ।
सीधे अहले सुन्नत से सीखो !
और जो सीखो उसे फौरन अमल में लाओ !
ईमान की वज़ाहत के बारे में
ईमान की 12 वज़ाहते है : मेरा रव अल्लाह तआला है | इसके सबूत का लेख सूरह बकरा की 163 वीं आयत में मौजूद है । मेरे नवी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' है | इसके सबूत का लेख सूरह फातिहा की 28 वीं और 29 वीं आयत में है | मेरा मज़हव इस्लाम है | इसका सबूत सूरह अल इमरान की 19 वीं आयत में है | मेरी किताब कुरान करीम है | इसका सबूत सूरह वकरा की दूसरी आयत में है । मेरा किवला कावा शरीफ है । इसका सबूत सूरह वकरा की 144 वीं आयत में है ।
मेरा मज़हव इतिकाद में अहले सुन्नत वल जमाअत है | इसका सबूत सूरत अनआम की 153 वीं आयत में है ।
मेरे सबसे पहले पुर्खे हज़रत आदम है । इसका सबूत सूरह आराफ की 172 वीं आयत में मौजूद है ।
मेरी मिल्लत , मिल्लत - ए - इस्लाम है । सूरह हज की 78 वीं आयत मेरी बात का सबूत है ।
मैं मुहम्मद ‘ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' की उम्मत में से हूँ । इसका सबूत सूरह अल इमरान की 110 वीं आयत में मौजूद है ।
मैं एक सही ( हक्कान ) मोमिन हूँ । सूरह अन्फाल की चौथी आयतुल करीम इसका सबूत है । अल हम्दु लिल्लाहि अला तौफिकिहि वस तग़फिरूल्लाहा मिन कुल्ली तक्सिरीन ।
इल्म , अमल से पाँच वजहों से बड़ा है : जिस चीज़ का इल्म मुहताज उसका अमल मुहताज है । इल्म ज़रूरी है जबकि अमल उससे अलग नहीं किया जा सकता । इल्म ख़ुद व ख़ुद फायदा पहुँचा सकता है जबकि अमल विना इल्म के फायदा नहीं दे सकता ।
इल्म , अक़्ल से ऊंचा है | जैसे पहले ( साविक ) कदीम है पर आखिरूल ज़िक्र हदीस है । ( यानि वो लावजूद से वजूद में आई । )
आदमी के जीनत ( ज़ेवरात ) उसके इख़्लास के साथ है । इख़्लास ज़ीनत ईमान के साथ है । ईमान की ज़ीनत जन्नत के साथ है । जन्नत की ज़ीनत है हुरीम , गिलमन और जमालुल्लाह में | यानि अल्लाह तआला को इस तरह देखना जो न सोचा जा सकता है न वयान किया जा सकता है ।
साथ ही , अगर अमल ईमान का हिस्सा होता तो एक हायज़ा ( महावारी ) याफ्ता औरत को हर रोज़ की नमाज़ से दोष मुक्त ( साकित ) नहीं किया जाता । इसलिए , ईमान इससे साकित नहीं किया जा सकता ।
कलमा - ए - शहादत का कम से कम ज़िन्दगी में एक बार कहना फर्ज है | मुहम्मद सूरत की 19 वीं आयत इसका सबूत है ।
कलमा - ए - शहादत कहने की चार शर्ते है : जब ज़वान इसे कहे तो दिल साथ हो ( यानि दिल से हो ) । इसके मायने का इल्म होना । इसे साफ दिल से . बोलना । इसे ताज़ीम के साथ बोलना ।
यहाँ कुछ 130 फायदे है कलमा - ए - शहादत बोलने के | पर , चार चीज़ों के होने से इसके सारे फायदे ख़त्म हो जाते है । यह चार चीजें है : शिर्क , शक , तशबीह और तआतिल । शिर्क का मतलब है अल्लाह तआला का शरीक बनाना | शक का मतलब है मेक्स ( संदेह ) मज़हब में | तशवीह के मायने है अल्लाह तआला को एक गैर हकीकी ( काल्पनिक ) हयात में मिलना । तआतिल के मायने है ( यकीन रखना ) और कहना कि , “ अल्लाह तआला चीज़ों के साथ कुछ नहीं करता , हर शय वजूद में आती है जब उसका वक़्त आता है । ”
और साथ ही इस लेख में 130 में से 30 फायदे लिखे है | यह है 30 फायदे , पाँच वो जो दुनिया में है , अगले पाँच मरने के वक़्त , अगले पाँच कव्र के , अगले पाँच उस जगह के जिसे अरासात कहते है , अगले पाँच दोज़ख़ के और आख़िरी पाँच जन्त के |
दुनिया के पाँच फायदे इस तरह है :
1- उसका नाम ख़ूबसूरती से लिया जायेगा ।
2- उसमें अहकाम - ए - इस्लामिया मौजूद होगे |
3- उसकी गर्दन तलवार से महफूज़ होगी ।
4- अल्लाह अज़ीमुश्शान उससे राज़ी होगा ।
5- सारे ईमान वाले उसकी तरफ खिचेंगे ।
मौत के वक़्त के पाँच फायदे यह है कि
1- इज़राईल ' अलैहिस्सलाम ' ( मौत के फरिशतें ) बहुत खूबसूरत शक्ल में सामने आयेंगे ।
2- फरिश्ता उसकी रूह जिस्म से ऐसे निकालेगा जैसे मक्खन में से बाल निकाला जाता है ।
3- जन्त की ख़ुशबू उस तक पहुँचेगी ।
4- उसकी रूह को इल्लियीन ( जन्नत के आठ वागों में सबसे ऊपर ) पर ऊपर तक ले जाया जायेगा और फरिश्तें अच्छी ख़बरों के साथ वहाँ आयेंगे ।
5- एक आवाज़ कहेगी : “ मरहवा ( ख़ुश आमदीद ) , ऐ ईमान वाले , तेरी किस्मत में जन्नत है । "
उसकी कब्र के पाँच फायदे है :
1- उसकी कब्र कुशादा ( बड़ी , विशाल ) होगी |
2- ( सवालातों के फरिशतें ) मुनकर व नकीर बेहद ख़ूबसूरत शक्ल में सामने आयेंगे ।
3- एक फरिशता उसे वो सिखायेगा जो वो नहीं जानता ।
4- अल्लाहु तआला उसके ज़हन की हौसला अफ़ज़ाई करेगा ।
5- वो जन्नत में अपना घर देखेगा ।
अरासात के पाँच फायदे है :
1- हिसाव के सवालात और सुनवाई जो इन्सान के साथ होने वाली होती है उसमें आसानी ।
2- उस इन्सान के लफ्ज़ वा लफ्ज़ हिसाव जो जायगा । नामा - ए - आमाल ( यानि इन्सान की ज़िन्दगी का उसने कहा या करा ) उसके सीधे हाथ में दिया जायेगा
3- उसके सवाव का वजन पैमाने पर ज्यादा बजनी होगा ।
4- वो ' अर्श - ए - रहमान ' के साए में वैठेगा ।
5- वो विजली की रफ्तार से पुल - ए - सिगत को पार करेगा ।
जहन्नुम मे पाँच फायदे इस तरह है
1 - वो जहन्नुम में दाखिल नहीं होगा और उसकी आँखें वाकी जहन्नुमियों की तरह भूरे रंग में तबदील नहीं होगी ।
2- वो अपने शैतान से लड़ाई नहीं करेगा ।
3- न उसके हाथों में आग के कुफ चढ़ाए जाऐंगे और न ही गले में आग की जंजीर ।
4- उसे हमीम ( वेइन्तेहा गर्म पानी ) पीने की सज़ा भी नहीं मिलेगी । 5- वो हमेशा जहन्नुम में नहीं रहेगा ।
जन्नत मे पाँच फायदे है
1- हर फरिश्ता उसका इस्तकबाल करेगा ।
2- सिद्दिकियों के साथ दोस्ती रहेगी ।
3- जन्नत उसका अवदी ठिकाना होगी ।
4- अल्लाह तआला उससे राज़ी रहेगा ।
5- वो शख़्स अल्लाह तआला को देखने की अज़मत हासिल करेगा ।
[ काज़ी ज़दा अहमद अफेन्दी ( 1133-1197 [ 1783 A.D. ] )
अपनी किताव फरादुल फवाईद में अमेन्तु के शहर में फरमाते है . जहन्नुम सात परतों से बनी है जो एक के ऊपर एक है । हर नीचे की परत की आग ऊपरी पर्त से ज़्यादा शदीद है | मुसलमान अपने न बख़्शे हुए गुनाहों के लिये दोज़ख़ की पहली पर्त में जलाये जायेंगे जब तक अपने गुनाहों का हिसाव पूरा न कर ले फिर वो जहन्नुम से निकाल के जन्नत में दाखिल कर लिया जायेंगे | वाकी की छः पर्ते वाकी अलग - अलग काफिरों को जलाने के लिए है | मुनाफिक सातवीं परत में जलाये जायेंगे और सबसे शदीद अज़ाव झेलेंगे | ये दो चेहरे वाले काफिर है जो अपनी बातों से इस्लामी है पर दिल से काफिर है | जब काफिर जल के राख जायेंगे तो उन्हें दोवारा बनाया जायेंगा और दोवारा जलाया जायेंगा , ये जलने का सिलसिला हमेशा चलता रहेगा | जन्नत और जहन्नुम अव भी मौजूद है कुछ इस्लामी आलिमों के मुताबिक , जहन्नुम का पता मालूम नहीं है । जबकि कुछ के मुताविक यह ज़मीन की सात पर्तो के नीचे है | इनके यह लफ्ज़ दिखाते है कि यह ज़मीन में मौजूद नहीं चूंकि चांद , सूरज , ज़मीन , सितारे सव पहले आसमान के नीचे है तो , हम जिस जमीन पर है यहाँ की सात पर्तो के नीचे एक जन्नत है | इसलिए जहन्नुम ज़रूर जन्नत की सात पर्तो में से एक है।
नोट
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