ईमान व कुफ्र का बयान

                   कुफ्र का बयान 


कुफ्र के वजहें कुफ़ तीन तरह का होता है , [ यानि अल्लाह से दुशमनीः ] कुफ़ - ए- इनादी , कुफ़ - ए - जेहली ( या जाहली ) , और कुफ़ - ए - हुक्मी |

 कुफ़ - ए - इनादी एक शख़्स का जान बूझकर इस्लाम और ईमान से किया जाने वाला ज़िद्दी इन्कार है , यानि अबू जहल , फिरऔन , नमरूद और शैद्दाद ( शद्दाद बिन आद ) जैसे लोगों का कुफ्र | इन लोगों को सीधे यह कहना कि यह लोग दोज़खी है , जायज़ है ।

 कुफ़ - ए - जहलीः जैसा कि आम लोगों में मौजूद काफिर यह जानते है कि इस्लाम सही मज़हव है और अज़ाने मुहम्मदी को सुनते है , अगर तुम उनसे कहते हो कि , “ आओ , मुसलमान बनो , ” तो वो कहते है , " अपनी ज़िन्दगी का तरीका वो है जो हमने अपने दादा - परदादाओं और परिवार से सीखा है । हम उसे ही जारी रखेंगे । ” 

कुफ़ - ए - हुक्मी के मायने है , तहकीर ( तौहीन जैसा सलूक ) , की जगह ताज़ीम ( अज़मत जैसा सलूक ) और ताज़ीम की जगह तहकीर । 

औलिया और अम्विया ( नवीयों ) और अल्लाहु तआला के उलेमाओं और उनके बयानों और फिक की किताबों और दिये गये फतवों को अज़मत न देते हुए वल्कि तौहीन करना भी कुफ़ है । काफिरों के मज़हवी सरकार को पसन्द करना और जुन्मार ( एक पुजारी के ज़रिये पहने जाने वाली रस्सी ) पहनना पहनना भी कुफ्र है । विना किसी ज़रूरत के और पादरी कपड़े पहनना और क्रोस जैसे निशानों का पहनना भी कुफ्र है।

कुफ़ से सात नुकसान है : यह यकीन और निकाह को खत्म करता है । ऐसे इन्सान के ज़रिये मारे गये खाये जाने वाले जानवर को भी नहीं खाया जा सकता ( चाहे उसने इस्लाम की शर्तों के मुताबिक उस जानवर का गला घोटा हो ) उसका अपने हलाल के साथ किया हुआ भी ज़िना बन जाता है । उस आदमी को कुत्ल करना वाजिव हो जाता है । जन्नत उससे दूर हो जाती है जहन्नुम उसके नज़दीक हो जाता है । अगर वो कुफ की हालत में मर जाता है तो उसके लिये नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ाई जाती । 

अगर कोई शख्स अपनी ख़्वाहिश से कहता है कि , “ फला फला के पास फला फला चीज़ है ( या नहीं है ) । अगर मैं ग़लत हूँ तो हो सकता है में एक काफिर हूँ , ” उसने एक कसम खाई है जो उसे कुफ में घसीटती है , इस बात से बेपरवाह हो कि उस शख्स ने किसी मखसूस चीज़ का नाम लिया हो या नहीं । उसके ईमान और निकाह की तजदीद ज़रूरी है । 


इस्लाम में मना किये गये काम जैसे ज़िना , सूद या झूठ बोलना को यह कहना कि , “ काश ! यह हलाल होते , तो मैं इसे कर लेता ! ” भी कुफ का सबब बनता है।

मसलन अगर कोई शख्स कहे : " मैं नवियों पर ईमान रखता हूँ । पर में नहीं जानता कि आदम ' अलैहिस्सलाम ' एक नवी है , " तो वो काफिर हो जाता है । एक शख्स जो नहीं जानता कि हज़रत मुहम्मद ' सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ’ आखिरी नवी है वो भी काफिर हो जाता है । 

जैसा कि इस्लामी आलिमों के ज़रिये वयान है कि अगर एक इन्सान कहता है । अगर नवी ' अलैहिस्सलातु वस्सलाम ' ने जो कहा है वो सच है तो इस निजात पा चुके है । " तो वो काफिर हो जाता है ।
 विरगिवी ' रहमतुल्लाहि फरमाया । अगर वा इन्सान इसको शक के नज़रिये या भाव से कहता है तो वो काफिर हो जाता है । पर अगर वो इसे इलज़ाम के भाव से कहता है तो काफिर नहीं होता ।

 यह इस्लाम के उलेमाओं की तरफ से वयान है कि अगर एक शख्स को साथ में नमाज़ पढ़ने की दावत दी जाये और वो जवाव दे कि वो नहीं पढ़ेगा तो वो काफिर हो जाता है । पर वो काफिर नहीं होगा अगर उसके कहने का मतलव है : “ मैं आपकी सलाह पर नमाज़ नहीं पढूँगा | मैं ऐसा करूँगा क्योंकि अल्लाहु तआला ने ऐसा हुक्म दिया है । 

" अगर लोग किसी ख़ास शख़्स पर कहते है : “ एक हाथ की मुठठी से छोटी दाढ़ी मत उगाओं या उसे इतना छोटा करो कि वो एक हाथ की मुठठी में आ जाये या अपने नाख़ून काटो क्योंकि यह हमारे रसूलुल्लाह ' सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' की सुन्नत है , ” और अगर वो शख़्स कहता है कि , “ नहीं मैं वो नहीं करूँगा जो तुम कहते हो । ” तो वो काफिर हो जाता है | यही चीज़ दूसरी सुन्नतों के मुताल्लिक भी लागू होती है , पर यह सुन्नत आम हो आम तौर पर सुनी हुई हो और तवस्सुर के तरीके से कि सवाल में काम भी एक सुन्नत है । इसकी एक मिसाल ( दाँतों का साफ करना ) मिसवाक ( पहले या वुज़ू के दौरान ) है | हज़रत विरगिवी [ ज़ैनुल मुहम्मद विरगिवी अफेन्दी ' रहमतुल्लाहि ताला अलैहि [ 928 ( 1521 A.D. ) ] , वलिकेसिर ' 981 [ 1573 ] , विरगी व ] ने इस मुद्दे पर कुछ जोड़ा है : “ अगर वो सुन्नत को नकारते हुए कुछ कहे तो वो कुफ़ होगा । पर यह कुफ्र नहीं होगा अगर वो कहे : " में सिर्फ ऐसा तुम्हारे कहने से नहीं करूंगा क्योंकि यह तुमने कहा है । पर मैं इसे इसलिए करूँगा क्योंकि रसूलुल्लाहकीसुन्नत है।

[ यूसुफ करदवी अपनी किताव अल हलाल वल हराम फिल इस्लाम के चौथे एडिशन के इक्यासिवे सफहे पर लिखते है कि किताव हदीस शरीफ या जामी सहीह [ मुहम्मद विन इग्माईल बुखारी ' रहमतुल्लाहि तआला अलैहि ' ( 194 [ 810 A.D. ] , बुखारा -256 ( 870 ) , समरकन्द के ज़रिये इकठ्ठा की गई ] में बयान है " मुशरिकों से उल्टे बरताव करो ! अपनी दाढ़ी बढ़ाओ अपनी मूंछे काटो ! " यह हदीस शरीफ अपनी दाढ़ी काटने से रोकती है और उसे एक मुठठी से छोटा रखने को कहती है । आग की इबादत करने वालों ने अपनी दाढ़ी काट दी । और कुछ ने अपनी दाढ़ी ही हटा दी । यह हदीस शरीफ हमें उनके रिवाज़ के वरअक्स करने का हुक्म देती है । कुछ फिक के आलिम यह भी कहते है कि इस हदीस शरीफ के मुताबिक दाढ़ी उगाना वाजिव है और दाढ़ी पूरी कटवाना हराम है । उनमें से एक इञे तैमिया दाढ़ी पूरी कटवाने के ख़िलाफ बड़ी सख़्ती से लिखते है | दूसरी तरफ कुछ इस्लामी आलिमों के मुताविक यह एक रिवायती चीज़ है , न कि इवादती । किताव फतह - कोट - इयाद में वयान है कि किसी को दाढ़ी कटवाना मकरूह है । यह इस मामले की सच्चाई है | यह हदीस शरीफ इस मामले के लिये नहीं दिखाई जा सकती जिसमें दाढ़ी उगाना वाजिव है । इसलिए हदीस शरीफ में वयान है : “ यहूदी और ईसाई नहीं रंगवाते ( वाल और दाढ़ी ) , जो वो करते है उसके बरअक्स करो । ” दूसरे लफ्ज़ों में हदीस शरीफ वाल और दाढ़ी रंगवाने को कहती है । पर यह हदीस शरीफ यह नहीं कहती कि किसी के वाल या दाढ़ी रंगवाना वाजिव है । यह वताती है कि ऐसा करना मुस्तहव है | कुछ असहावे अकरम ने अपने वाल और दाढ़ी भी रंगवाऐ थे | पर ज़्यादातर ने ऐसा नहीं किया था । अगर यह सब के सव करते तो ऐसा करना वाजिव हो जाता । तो हदीस शरीफ का दाढ़ी के मुताल्लिक भी मामला ऐसा ही है यह दिखाता है कि दाढ़ी उगाना मुस्तहव है वाजिव नहीं | हमारे किसी इस्लामी आलिम ने दाढ़ी को कटवाने की रिवायत नहीं दी । उनके ज़माने में दाढ़ी उगाना रिवायती था । [ ये मुसलमानों के रिवायती कामों की न पैरवी करके वदनामी झेलना है । यह मकरूह है । अगर इससे फितन फैले तो यह हराम भी है । ] यहाँ हम करदवी का तर्जुमा ख़त्म करते है । अपनी किताव के इफतिताह में करदवी लिखते है कि उन्होने चारों मज़हवों के फिक के इल्म को मिलाया है और किसी को एक मज़हव इख़्तियार करना मुनासिव नहीं माना | इसलिए वो अहले सुन्नत के आलिमों के बताये गये रास्ते से भटक गये | अहले सुन्नत के आलिमों ने फरमाया है कि एक शख़्स को चार में से किसी एक मज़हब की पैरवी करनी है पर वो शख़्स जो इन्हे मिलाता है वो ला मज़हवी जिन्दीक हो जाता है । 

चूंकि करदवी के लिखे हुए बयान जोकि दाढ़ी बढ़ाने से मुताल्लिक थे वो हनफी मज़हब के इल्म के मुताविक थे , पढ़ने वाले से इल्तिजा की जाती है कि वो सबूतों पर यकीन करे । हज़रत अब्दुल हक़ देहलवी ' रहमतुल्लाहि तआला ' ( 958 [ 1551 A.D. ] 1052 [ 1642 ] , दिल्ली ) ऐश्यातुल लेमियात के तीसरे एडिशन में फरमाते है कि , “ इस्लामी आलिम जो उस वक़्त में रहते थे जिसके बाल और दाढ़ी रंगवाये जाते थे । तो यह दिखाता है कि किसी ख़ास जगह की रिवायत को नहीं अपनाना चाहिए । जोकि मकरूह । मुहम्मद बिन मुस्तफा हादिमी ' रहमतुल्लाहि तआला ' ( d . 1176 [ 1762 A.D. ] हादिम , कोनया , तुर्कीह अपनी किताब बरीका में फरमाते है : हदीस शरीफ में बयान है कि : ‘ अपनी मुंछे छोटी और दाढ़ी बड़ी बढ़ाओ । ' इसलिए किसी की दाढ़ी काटना या उसे हाथ की मुठठी से छोटा उगाना मना है । एक मुठठी के वरावर दाढ़ी उगाना सुन्नत है । जब वो मुठठी से बढ़े हो जाए तो उसे काटना भी सुन्नत है । ” निचले होठ से लेके हाथ की बड़ी उगली से छोटी उगंली तक की मुठठी एक हाथ की मुठठी है । अगर कोई सुल्तान किसी सुन्नत को करने का हुक्म देता है हत्ता कि वो मुवाह हो पर उसे करना वाजिव हो जाता है । यह मुल्तान का कहना है और मुसलमानों के लिए हुक्म । कई जगहो पर दाढ़ी की मुठठी से ज़्यादा बढ़ाना भी वाजिव है । इसे न बढ़ाना या काटना वाजिव के खिलाफ जाना है । यह मकरूह तहरीमी है । ऐसा करने वाले इन्सान पर मस्जिद में जमाअत का इमाम वनना ( नमाज़ के लिए ) जायज़ नहीं । पर दारूल हर्व में दाढ़ी काटना जायज़ है क्योंकि ऐसा न करने से वो शख़्स अपना काम खो सकता है और अपनी गुज़र करता रहे और इस्लाम के लिए खिदमत " करता रहे । बिना किसी उज़र के इसे छोटा करना या काटना मकरूह है । एक मुट्ठी से छोटी दाढ़ी बढ़ाना विद्दत है यह सोचके कि वो सुन्नत कर रहे है | इसका मतलब सुन्नत को बदलना है । बिद्दत का काम करना कत्ल से बड़ा कबीरा गुनाह है । ] 

मसलन एक लड़की और लड़का बालिग़पन की उम्र तक पहुँच गये थे और उन्होने निकाह कर लिया , और फिर भी ईमान के अरकानों के बारे में किये गये सवालों के जवाब देने में नाकाम रहे , इसका मतलब यह हुआ कि वो मुसलमान नहीं । उनका निकाह तभी सहीह होगा जब उन्हें ईमान के अरकान सिखाये जाए और उनका निकाह दुबारा कराया जाये | 54 फर्जो से मुताल्लिक बाब देखे । 

अगर कोई शख़्स अपनी मूँछें काटता है और दूसरा शख़्स उसे कहे , “ यह अच्छा नहीं है ” , तो दूसरे शख़्स के ईमान खोने का डर रहता है | क्योंकि मूँछों को काटना सुन्नत है और दूसरे शख़्स ने सुन्नत को मज़ाक में लिया |

 अगर कोई शख़्स अपने पूरे जिस्म पर रेशम के कपड़े पहनता है और दूसरा शख़्स उसे देख के कहता है , “ तुम्हे ये मुबारक साबित हो ” , तो दूसरे शख़्स के ईमान खोने का डर है । 

अगर कोई शख़्स मकरूह काम करता है , किवले की तरफ पैर करके लेटना और किबले की तरफ थूकना या पेशाब करना , और बाकी लोग उसे रोके मकरूह करने से और के झिड़क कर कहे , “ काश हमारे सारे गुनाह ऐसे ही माफ करने लायक होते ” , तो उसके ईमान खोने का डर है | क्योंकि उसने मकरूह के बारे में इस तरह बात की है जैसे वो कोई गैर अहमयती मामला हो ।

 साथ ही , अगर कोई नौकर अपने मालिक के कमरे में घुसता है और अपने मालिक को कहता है , “ अस्सलामु अलैकुम , सर , ” और कोई तीसरा शख़्य जो मार्लिक के साथ कमरे में मौजूट हो , नौकर को डांटते हुए कहता है , “ चुप रह , वेअदव इंसान ! कोई अपने मालिक को इस तरह सलाम नहीं को सकता ” , तो वो तीसरा इन्सान काफिर हो जाता है । अगर उसका मतलब औ और अच्छे से समझाने का था तो वो काफिर नहीं होगा । अगर कोई किसी की पीठ पीछे चुगली करता है और कहता है , “ मैंने कुछ खास नहीं किया है , का मैने किया है ” , वो काफिर हो जाता है , आलिमों के मुताबिक | क्योंकि उसने एक हराम काम किया है । 

अगर कोई शख़्स कहता है , “ अगर अल्लाह तआला मुझे जन्नत है , फिर भी मैं तुम्हारे विना जन्नत में दाखिल नहीं होऊँगा ” या “ अगर मुझे किसी और के साथ जन्नत में दाखिल होने का हुक्म हो तो मैं नहीं होऊँगा ” या “ अगर अल्लाह तआला मुझे जन्नत दे तो मैं उससे ज़्यादा अल्लाह का दीदार करना पसन्द करूँगा ” आलिमों के मुताविक ये बातें कुफ का सबब बनती है | आलिमों के मुताविक यह कहना कि ईमान घटता व बढ़ता है भी कुछ है | विरगिवी के मुताविक मुमिनुन बिह के साथ ईमान का बढ़ना व घटना कहना कुफ्र है । पर यकीन व कुव्वते - ए - सिटक के हिमाव से कहना कुफ नहीं है | ईमान की कमी और बढ़ोतरी पर कई मुजतहिदों के वयान है ।

 आलिमों ने कहा है कि यह कहना कुफ है कि “ किवले दो है एक कावा और एक जेरूस्लम में । ” विरगिवी के मुताविक , दो किवले अभी मौजूद है कहना कुफ़ है | पर यह कहना कुफ्र नहीं कि “ वैत मुकद्दस एक किवला था पर वाद में कावा किवला वना । अगर कोई शख़्य वेवजह किसी मज़हवी आलिम की कसम खाता है तो उसके ईमान खोने का डर रहता है ।

 इस्लाम से अलग ईवादतों या काफिरों के इस्लाम से अलग वातों पर यकीन और पसन्द करना भी कुफ्र है । 

आलिमों के मुताविक अगर कोई कहता है कि मजूसियों का एक अच्छा तरीका खाते वक़्त वात न करना या यह मजूसियों का अच्छा काम यह है कि महावारी या हैज़ के दौरान वीवी से हमविस्तरी न करना | तो वो काफिर हो जाता है । 

अगर कोई शख़्स किसी से पूछता है कि क्या वो ईमान वाला है और दूसरा कहता है , “ इन्शाअल्लाह ... " इसकी वज़ाहत न कर पाना कुफ़ है ।

 अगर कोई शख़्स किसी के वेटे से मुखातिव होते हुए कहता है कि “ अल्लाह के लिए तुम्हारा वेटा ज़रूरी है । ” वो काफिर हो जाता है ।

 अगर कोई औरत अपनी कमर पर काला रस्सा वांघती है और पूछने पर कहे कि यह जुन्नार है , वो काफिर हो जाती है और अपने शौहर के लिये हराम । 

अगर कोई शख़्स हराम चीज़ को खाने से पहले " विस्मिल्लाह " कहता है तो वो काफिर हो जाता है । हज़रत विरगिवी ने फरमाया “ जितना यह फकीर जानता है , हराम लीयानिही खाने वाला शख्स काफिर हो जाता है । [ यानि , शराव , गंदा गोश्त ] यह तभी है जब वो शख़्स जानता हो कि जो वो खा रहा है हराम - ए - लीयानिही ( यानि वो खाना जिसकी इस्लाम में मनाही है । ) यह करते हुए उसने अल्लाह के नाम को हल्के में लिया । उसके लिए वो चीज़ें हराम हो जाती है | इमामों से रिवायत है कि फिरौती के पैसों से ख़रीदा हुआ खाना हराम नहीं पर फिरौती के पैसे हराम है । [ इस मसले को जानने के लिये सआदते अवदिया के छठे एडिशन का पहला वाव पढ़े । जोकि हकीकत किताववी , फातिह , इस्तानवुल तुर्की में मौजूद है । ] अगर कोई शख़्स दूसरे को कहता है कि , “ काश अल्लाह तेरी रूह को कुफ़ में ले जाये ” , इस्लामी आलिम इसपे एक राय नहीं कि वो काफिर वन जायेगा । एक सच्चाई से , इस्लामी आलिम इस बात 

पर एकमत है कि अपना कुफ़ मंज़ूर करना भी कुफ़ है । किसी दूसरे के कुफ़ की मंजूरी पर दूसरे इस्लामी आलिम कहते है कि यह कुफ्र होगा जब ख़ुद कुफ्र इसको मंजूर करेगा । पर यह कुफ़ नहीं होगा कि उसके कुफ्र की मंजूरी की विना फिस्क ( गुनाह ) है- उसका अज़ाव शदीद और हमेशा रहने वाला होगा । बिरगिवी ‘ रहीमाहुल्लाहु तआला ' फरमाते है : “ हम इस कौल को अहम जानते है । हज़रत मूसा ‘ अलैहिस्सलाम ' की सच्ची कहानी कुरान करीम में इसका सबूत देती है । ”

 अगर कोई शख़्स कहता है , “ अल्लाहु तआला जानता है कि मैने ऐसा काम नहीं किया ” , पर वो ख़ुद जानता है कि वो उसने किया है , वो काफिर हो जाता है । ऐसा कहके वो हक तआला शानहु की हिकमत की आड़ में जहालत की बात की है । 

अगर कोई शख्स किसी औरत से बगैर गवाह निकाह करता है और फिर दोनों कहते हैं कि अल्लाह तआला और नबी हमारे निकाह के गवाह हैं , दोनों काफ़िर हो जाएंगे । हमारे नबी ‘ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' को अल्लाह का अताई इल्मे गैब था और अल्लाह का जाति इल्मे गैब है। 

अगर कोई शख़्स कहता है कि वो जानता है कि चोरी का माल या खोई हुई चीज़ कहाँ है , जो वो ख़ुद और जो उसपे यकीन करे काफिर हो जाते है । अगर वो कहता है कि उसे जिन ख़वर देते है तब भी वो काफिर हो जाता है । सिर्फ अल्लाह तआला गैव को जानता है या जिसे वो अता करे । 

आलिमों ने बयान किया है , कि एक शख़्स जो अल्लाह की कसम खाना चाहता है और दूसरा शख़्स कहता है , " में नहीं चाहता कि तुम अल्लाह की कसम खाओं वल्कि मुझे तलाक , इज्ज़त वगैरह की कसम चाहिए ” , तो दूसरा काफिर हो जाता है । 

अगर एक शख़्स दूसरे से कहता है कि , “ तुम्हारा चेहरा मुझे मौत के फरिशतें की याद दिलाता है ” , तो वो काफिर बन जाता है | क्योंकि मौत का फरिश्ता बहुत बड़ा फरिश्ता है । 

अगर कोई शख़्स कहता है कि , “ कितना अच्छा होता अगर नमाज़ न पढ़नी होती ” काफिर हो जाता है । जैसा कि मज़हबी आलिमों ने वयान किया है , अगर एक शख़्स दूसरे को कहता है , “ चलो नमाज़ पढ़ने ” , और दूसरा जवाब देता है , “ मेरे लिए नमाज़ पढ़ना मुश्किल है " , काफिर हो जाता है ।

 दूसरा अगर कोई शख़्स कहता है , “ अल्लाह तआला जन्नत में मेरा गवाह है " , वो काफिर हो जाता है क्योंकि अल्लाह तआला जगह से पाक है | [ साथ ही जो अल्लाह को ' वालिद ' कहता है काफिर हो जाता है । ] 

अगर कोई शख़्स कहता है , “ रसूलुल्लाह ‘ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ’ ने खाने के बाद अपनी मुबारक उंगली चाटी थी , ” और दूसरा शख़्स कहता है कि ऐसा करना अशिष्ट व्यवहार है तो दूसरा काफिर हो जाता है । 

अगर कोई कहता है कि , “ रिज़्क अल्लाह से आता है पर फिर भी वन्दे की हरकत ज़रूरी है , ” इसका बयान शिर्क होगा | चूंकि बन्दों की हरकत भी अल्लाह ही बनाता है | अगर कोई शख़्स कहता है कि यहूदी होने से अच्छा नसरानी होना है वो काफिर हो जाता है । कोई यह कह सकता है कि यहूदी नसरानियों से ज़्यादा बेहतर है । 

अगर कोई कहे कि खयानत के लिए काफिर होना अफज़ल है ,काफिर हो जाता है । 

अगर कोई शख़्स कहता है , “ इल्म से मेरा क्या लेना देना , ” या “ जैमा उलेमा ने कहा है वैसा कौन कर सकता है , " या एक लिखा हुआ फतवा ज़मीन पर फेक देता है और कहता है , “ मज़हवी लोगों के अलफाज़ अच्छे नहीं है , " वो काफिर हो जाते है ।

 अगर कोई शख़ा एक शख़्स से जिससे उसका झगड़ा हो गया हो , कहता है कि “ चलो इस्लामी अदालत चले , " और दूसरा कहता है , “ मैं जब तक नहीं जाऊँगा जब तक पुलिस मुझे न ले जाए , ” या “ में इस्लाम कैसे जानू , ” दूसरा काफिर हो जाता है ।

 अगर कोई शख़्ग कुछ कहता है जिससे कुफ्र आता है वो और जो उसपे हँसे काफिर हो जाता है । दूसरे की हँसी कुफ नहीं होगी अगर वो ज़रूरी हो तो ।

 अगर कोई शख़्स कहता है , " ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ अल्लाह न हो , ” या “ अल्लाह जन्नत में है ” वो इस्लामी आलिमों के मुताविक काफिर हो जाता है । 

कोई जो कहे की मैशायख़ की रूह हमेशा हाज़िर रहती है और जानती हैं तो वो काफिर हो जाता है । ऐसा कहना कुफ़ नहीं की वो हाज़िर होंगे । 

शख्य जो कहता है , " मैं इस्लाम नहीं जानता या नहीं जानना चाहता , " काफिर हो जाता है । 

अगर कोई शख़्स कहता है , “ अगर आदम ' अलैहिस्सलाम ' ने गेहूँ नहीं खाया होता तो हम शाकी नहीं वनते , " वो काफिर हो जाता है । इस्लामी आलिम इस बात पर एक राय नहीं है कि यह कुफ्र होगा या नहीं अगर वो कहे , “ .... हम आज जमीन पर नहीं होते । 

" अगर कोई कहे , आदम ' अलैहिस्सलाम ' ने कपड़े वुने थे और दूसरा कहे कि , " तो हम जुलाहे के वेटे है , " दूसरा काफिर हो जाता है ।

 अगर कोई शख़्स सगीरा गुनाह करता है और वो उस शख़्स को यह कहे जो उसे तौवा करने की राय दे की " मैने तौवा करने लायक कौनसा गुनाह किया है । " तो वो काफिर हो जाता है । 

अगर कोई शख़्म दूसरे से कहता है , “ चलो साथ में मज़हवी आलिम के पास चलते है , ” या “ चलो इल्मे फिक और इल्मे हाल की किताबें पढ़कर सीखें , " और दूसरा जवाव दे की , “ इल्म से मेरा क्या लेना देना , ” दूसरा काफिर हो जाता है । इसका मतलव इल्म की तौहीन करना है | एक शख़्स जो फिक या तफसीर की किताबों की तौहीन करता है वो काफिर हो जाता है । काफिर जो चार में से एक मज़हव के उलेमाओं की कितावों पर हमला करने वाले काफिरों को शाम
 विज्ञानी या जिन्दीक कहते है । 

अगर कोई शख़्स नहीं जानता कि इन सवालों के जवाब कैसे देने है जैसे की “ तुम किस की औलाद हो ? ” , “ तुम किसकी मिल्लत में से हो ? ” “ इतिकाद में तुम्हारे मज़हव का इमाम कौन है ? ” और “ अमल के मज़हब में तुम्हारा इमाम कौन है ? " तो वो काफिर हो जाता है ।

 इस्लामी आलिमों के ज़रिए वयान किया गया है कि अगर एक शख़्स एक हराम - ए - कतिय्या ( जो ज़रूर हराम है ) -जैस सुअर और शराव , को ' हलाल ' कहते है या हलाल - ए - कतिय्या ( जो ज़रूर हलाल है ) , को ' हराम कहता है , वो काफिर वन जाता है । [ तम्बाकू को हराम कहना खतरनाक है । ]
 [ सआदते अबदिया के छठें ऐडिशन का चौथा बाव देखे जिसमें तम्बाकू में बताया गया है । ] 

यह करना कुफ़ है कि कोई हराम काम कांश हलाल होता , अगर वो काम हराम बनाया गया है सभी मज़हबों में और वो अगर हिकमत का विरोध में हो उस चीज़ के हलाल के लिए | इसकी मिसालें : ज़िना , गुदामैथुन , पेट भर जाने के बाद भी खाना , सूद लेना और देना | शराब के लिए सोचना की काश ये हलाल होती कुफ़ नहीं होती है । क्योंकि शराब पुराने नबियों की उम्मतों में हराम नहीं थी । कुरान करीम के बीच के लफ्ज़ लेके उनका मज़ाक बनाना कुफ़ है | अगर कोई इंसान कहता है किसी को जिसका नाम याहया है कि , “ या यहया ! हुज़ इल किताबा , ” के काफिर हो जाता है । यही कानून कुरान करीम की आयतों को संगीत , नाच या गाने के साथ पढ़ने पर भी है । 

यह कहना आफत है , “ मैं अभी पहुँचा हूँ , विस्मिल्लाह । ” अगर कोई शख़्स कहता है ' मा ख़लकल्लाह ' , किसी चीज़ को देखकर जिसका वो इरादा कर लेता है , अगर उसे इसके मायने नहीं पता तो वो काफिर हो जाता है ।

 यह कहना आफत है कि , “ मै अभी तुम्हारी क़सम नहीं खाऊँगा , क्योंकि उन्होंने कसम खाने को ' गुनाह ' कहा है । " यह कहना आफत है कि , “ तुम तो जिवराईल की तरह पूरी तरह से नंगे हो । ” इसका मतलब तुम उनका मज़ाक उड़ा रहे हो । 

अल्लाह तआला के अलावा किसी की कसम खाना हराम है । एक शख़्स हराम काम करने से मुरतद या काफिर नहीं वनता | पर वो हराम के वारे में हलाल वोलने से काफिर हो जाता है यानि मनसूसन अलैहि ( जिसे नाम में हराम करार दे दिया जा चुका है जोकि हदीस शरीफ और आयत करीमा में साफ अलफाज़ों में है । ) 
और साथ ही अगर कोई शख़्स अपने बेटे के सर या अपने सिर पर हाथ रख कर अल्लाह की कसम खाता है , यानि अगर वो कहता है , वल्लाहि मेरे बेटे के सर की क़सम , तो उसके कुफ्र में पढ़ने का डर है ।
नोट 
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