जुमे की नमाज की फजीलत,
या
जुमे का अहतमाम,
जुमे की नमाज़ सही होने के लिए सात शर्ते है :
1- जहाँ जुमे की नमाज़ होती है उस जगह का शहर की तरह वड़ा होना ।
2- खुत्वा ( तहरीरी तकरीर ) का पढ़ना ।
3- नमाज़ पहले खुत्वा पढ़ना ।
4- जुमे की नमाज़ के लिए जुहर का वक़्त होना ।
5- जमाअत का मौजूद होना । ( वो ये के इतने लोगों का होना के जमाअत वन सके [ मुसलमानों का इकट्टा होना ] जुमे की नमाज़ जमाअत से पढ़ने के लिए ) इमामे आज़म और इमाम मोहम्मद ' रहमतुल्लाह अलैहि तआला ने इमाम के लिए फरमाया के वो ऐसा शख़्स हो जो ( वालिग़ हो और अकलमंद हो , कम से कम वहाँ पर तीन लोग हो और इमाम अबू यूसुफ ' रहमतुल्लाह अलैहि तआला ' के मुताबिक इस नवंर में दो लोगों के साथ इमाम भी शामिल है | तराफैन का कौल ज़रूरी है । ( इमाम आज़म अबू हनीफी और उनके नवाज़े गए शार्गिद इमाम मुहम्मद को ' तराफैन ' कहा जाता है ।
6 - सवको अज़ादी होना जुमे की नमाज़ में शरीक होने की । फत्वे की किताव हिन्दिया में इर्शाद है : “ जुमे की नमाज़ आज़ाद वालिग समझदार सेहतमंद और मुकीम ( जो सफर में न हो ) मर्दों पर फज़ है | इसी तरह मुसाफिरों ( लम्बी यात्रा करने वाले ) , नावालिगों और औरतों पर जुमे की नमाज़ फर्ज़ नहीं है । उन आदमियों पर भी ये फर्ज़ नहीं है जो
ख़तरनाक बारिश में फँसने के डर से बाहर न निकलें या सरकारी अफसरों से पकड़े जाने के डर से | हाक्मि या आला अफसर अपने नीचे काम करने वालों को जुमे की नमाज़ पढ़ने से नहीं रोक सकते । वो उनकी रोज़ की आमदनी में से पैसा काट सकते है | अगर जो इमाम जुमे की नमाज़ पढ़ा रहा है वो फ़ासिक [ फासिक उसे कहते है जो खुले तौर पर हराम काम करे जैसे के शराब पीना , ज़िना करना आदि । ] है और उसको नमाज़ पढ़ाने से रोकने में नाकाम है तो उल्माए दीन की यही हिदायत है के जुमे की नमाज़ छोड़ने के बजाए उसके पीछे नमाज़ पढ़ लो | किसी और वक़्त में ( मिसाल के तौर पर रोज़ाना की पाँच नमाज़ें ) तुम बजाए इसके के तुम किसी फासिक इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ो तुम्हे चाहिए के किसी ऐसी मस्जिद में जाकर नमाज़ पढ़ो जहाँ सुल्हा इमाम जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ा रहे हों । एक औरत का जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ने के सबब मस्जिद में जाना मकरूह है । चाहे वो कोई भी औरत हो और कोई सी भी नमाज़ उसे पढ़नी हो |
इमाम मुहम्मद ' रहमतुल्लाह तआला ' के मुताबिक अगर एक शख़्स जुमे की नमाज़ की दूसरी रकाअत के रूकू में इमाम के साथ शामिल हो जाता है तो वो ( दिन की ) दोपहर की नमाज़ अदा कर लेता है । इमाम - आज़म और इमाम अबू यूसुफ ‘ रहमतुल्लाह तआला ' के मुताबिक वो जुमे की नमाज़ पढ़ लेता है चाहे वो ( इमाम के साथ देर से ) शामिल हुआ हो या आखिरी कअदा ( बैठकर ) तशहहुद पढ़ा हो । अगर एक शख़्स नफीले ( जुमे से पहले या उसके बाद की इबादतें ) अदा करता है जबकि ख़तीब ( पढ़ता है या किरअत करता है ) खुत्वा वयान कर रहा है तो उसने सिर्फ दो रकाअतें ही अदा की है उससे ज़्यादा नहीं | अगर वो जो नमाज़ पढ़ रहा है वो ( शुरू की ) जुमे की इबादत की सुन्नत है उसके लिए उलेमाओं की कोई सामूहिक राए या शहादत नहीं है के दो रकाअतें पढ़नी है और उसके बाद सलाम फेरना चाहिए या फिर चारों रकाअतें पढ़नी है । हालांकि ये ज़रूरी है के वो चारों रकाअतें अदा करे ।
जुमे में पाँच वाजिवात का ध्यान रखना चाहिए :
1- आज़ान के वक़्त सारे काम धंधे रोक देने चाहिए । ( दोपहर की नमाज़ के लिए )
2- नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिद में चलकर जाना इसे ' सई ' ( यानी , हज में सफा और मरवा के दरमियान चलने के वरावर है ) कहते है । ( इसे सआदते अबदिया के पाँचवे गुन्चे के सातवें बाव में खुलकर बताया गया है । )
3- जब इमाम यानी ख़तीव खुत्वा वयान कर रहे हों उस वक़्त नफिल नमाज़ न पढ़ी जाए ।
* 4 दुनियावी वातों से बचना |
5- खामोश रहना ।
जुमे में छ मुस्तहवात का ध्यान रखनाः
1- रहीय्या - ए - तैय्येवा ( जिसका मतलब है इत्र लगाना या छिड़कना )
2- मिस्वाक का इस्तेमाल करना ( जो के इरक पेड़ की डाली सेन है । ) [ बराए मेहरवानी सआदत अबदिया के चौथे हिस्से के दूसरे बाव के तेरह पैरा को बुज़ू के आदाव के मज़मून में देखें या गुगल में जाईए और मिस्वाक लफ्ज़ को लिखिए और देखिए किस तरह इस्लाम हमें पढ़ाता है , चौदह सौ साल पहले , किस तरह अपने दांतों , मुँह और खाने की नली की सफाई रखते थे । ]
3- साफ कपड़े पहनना ।
4- तवकीर [ जिसका मतलब है जुमे की इवादत के लिए मस्जिद जल्दी जाना । उस वक्त ( सदी में ) जिसे ' जमाना - ए - आदत ' ( यानी जो
इंसानियत का सबसे अच्छा दौर था , जिसमें हमारे रसूलुल्लाह ' सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' और आपके चार सबसे अव्वल ख़लीफा हज़रत अबू बकर और हज़रत उमर और हज़रत उस्मान और हज़रत अली ' रज़ि - अल्लाहु तआला अन्हुम अजमाईन ’ रहते थे ) सहावा ' रज़ि - अल्लाहु तआला अन्हुम अज्मईन ' सुवह ( जुमे वाले दिन ) की नमाज़ पढ़कर जाया नहीं करते थे , वो जुमे की नमाज़ पढ़ने के बाद ही जाते थे । पहले जो इस उम्मत ( यानी मुसलमानों ) ने भूल की थी वो था उनका वरताव जोके सुन्नत है और जिसे तवकीर कहते है।
5- गुस्ल करना , ( सआदते अबदिया के चौथे गुन्चे के चौथे वाव में इसको समझाया गया है । )
6- अल्लाह की नयमतों यानी सलवात का ज़िक्र करना ( जो हमारे पाक नवी ' सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ' पर इर्शाद हुआ और जो इस तरह पढ़ा जाता है : “ अल्ला हुम - म सल्लि अला सय्यैदिन मुहम्मदिन व अला [ आलिही व असहाबीही ] अज्मईन । ” )
जुमे में पाँच मकरूहात से वचना :
1- सलाम करना ( यानी इस्लामी तरीके से स्वागत करना ) जबकि ख़तीब खुतवा वयान कर रहा हो । ( इस्लाम के स्वागत करने के तरीके सआदते अवदिया के तीसरे गुन्चे के वासठवें बाव में खोलकर बताया गया है । )
2- कुरआन मजीद ( पढ़ना ) की तिलावत करना ( जबके इमाम खुतवा कह रहे हो । )
3- जब किसी शख़्स को छींक आए तो . “ यारहमुकल्लाह " कहना ( और उसके बाद , अल्हमदुलिल्लाह ) कहना जबके इमाम खुतबा पढ़ रहे हों ।
4- खाना पीना करना जुमे की नमाज़ और खुत्वे के वक़्त
5- ऐसा काम करना जो मकरूह हो । [ इस समय मकरूह वाली बात ये भी है के ख़तीब खुत्वे के नाम पर ज़रूरत से ज़्यादा लम्बी तकरीर कर दें । ]
जुमे की पहली अज़ान के बाद , जो मिनार पर पढ़ी जाए ( जो मस्जिद के बाहर हो ) ख़तीव जुमे की इबादत की पहली सुन्नत मिम्वर के पास अदा करेगा । उसके बाद वो मिम्बर के सामने आ जाएगा और छोटा सा खुत्वा पढ़ेगा किवले की तरफ खड़ा होकर , मिम्बर पर वैठे , जमाअत की तरफ मुंह करके वैठे और दूसरी आज़ान सुने । उसके बाद वो खड़ा होकर खुत्वा पढ़े । [ लोग कहते है के वहाबी अहले सुन्नत के मज़हब के नहीं है । उनका कोई पक्का मज़हब नहीं है | उनको वहाबी या नजदीस कहा जाता है । अंग्रेजों की साजिशों से वहाबी मस्लक वजूद में आया । उन्होंने इसको कायम करने में अब्दुल बहाव के बेटे जिसका नाम मुहम्मद था जोके मज़हव में विलकुल अनजान था उसका इस्तेमाल किया | वो अपनी किताबों में गैर वहावी मुसलमानों को काफिर कह कर बुलाते है | वो लिखते है के गैर वहावियों को कत्ल करना और उनकी विवियों और बेटियों को माले गनीमत वनाने की उनकी इजाज़त है । खुले तौर पर वो अनजान गैर मज़हबी लोगों को रिश्वत देते है ताकि वो मज़हव में फिर जाए और उनको वहावी मस्लक में शामिल करके उनको वहावी मरकज भेजते है , जिनको राबीता - त - उल - आलम - इल - इस्लामी कहते है और जो दुनिया के कई देशों में क़ायम है | उलेमाए इस्लाम ने एकजुट होकर जो ‘ फतवे ’ जारी किए है उनको उन्होंने दूसरी ज़वान में इस्लाम मुखालिफ इशायत के ज़रिये सारे मुस्लिम देशों में भेजा | और हज के दौरान मुफ्त में हाजियों ( मुस्लिम तीर्थ यात्री ) को भी वाँटते है | उनमे से एक में उन्होंने लिखा है : “ औरतों पर जुमे की नमाज़ फर्ज़ है । ” वो ज़बरदस्ती औरतों को जुमे की नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिदों में भेजते है | वहाँ वो मिले जुले ग्रुप में जहाँ मर्द और औरत जमाअत में एक साथ
नमाज़ पढ़ते है | उनकी दूसरी इशाअत में कहा गया है के . " जुम और ईट का खुत्वा ( मुसलमान बना सकते है ) जमाअत की जवान के मुताविक पदा जाए । उसको अरवी में नहीं पढ़ना चाहिए । ” मुसलमान देशों के सही उलेमा दीन ने उसका सही हिस्सा सबूत के साथ आगे भेजा और उनके फतवा को ख़ारिज किया । उनमें से कुछ सही तहरीरें वो फतवे है जो अहल - ह - सुलत के आलिमों ने भारत के कई हिस्सों ( जगहों ) में जारी किए । मिसाल के तौर पर अल्लामा हिवर - उन - नीहरीर - वा - ई - फेहम्मा साहिब - उल - तकरीर व वर्षल , मौलाना मुहम्मद तेमीमी विन मुहम्मद मदरसी नव्वर अल्लाहु मरक्ज , मदरसे के दि फरमाया :
अरवी ज़वान के सिवा खुत्वे को वयान करना ( यानी पढ़ना , किरात करना या कहना ) या फिर दोनों यानी अरबी या उसकी तर्जुन की हुई ज़वान में पढ़ना मकरूह है । पूरे खुत्वे को अरखी जवान में पढ़ना वाजिद है क्योंकि हमारे रसूलुल्लाह ' सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सारे स्टुले अरती के कहे थे । बहर - उर - राज़िक नाम वाली किताब में ईद की नमाज कान है . “ तरावीह और कुसूफ की नमाज़ों को छोड़कर बाकी सारी नदिले और मुअक्किदा नमाज़ें जमाअत में नहीं पढ़ी जाती । क्योंकि ईद की नमाज हमेशा जमाअत के साथ पढ़ी जाती है , वो वाजिव है नफिल नहीं । " ये देखा गया है । के जो इवादत के काम रसूलुल्लाह ' सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमेशा दिए , वो वाजिव है | अल्लामा ज़ेवीदी ' रहमतुल्लाहु तआला ' इहया - उल - उलूम में नजर किया है : जो काम रसूलुल्लाह ' सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' ने पाबंदी के साथ किए है वो सब वाजिब है । ये ज़रूरी नहीं है के वो फर्ज काम हो । अल्लामा मुफती अवू सुऊद ईफेन्टी ' रहमतुल्लाह तआला ' ने अपनी किताब जिसका नाम फतेह - उल्लाह - इल - मूईन है में इर्शाद फरमाया : “ रसूलुल्लाह ‘ सत्तातल्लाहु अलैहि वसल्लम ' ने जो इवादत के काम लगातार किए है वो सब वाजिव है । इन्हें आविददीन ' रहमतुल्लाह तआला ' ने अपनी ' बुज़ू की सुन्नत ' के मजमून में इर्शाद फरमायाः “
किसी भी इवादत के काम को अगर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' ने विना छोड़े लगातार किया हो तो वो मुन्नत मुअक्किदा है | अगर आपने न सिर्फ नज़रअदाज़ नहीं किया लेकिन अगर किसी को छोड़ते हुए देखा तो उसके विचार को बदला तो वो वाजिव बन गया । विचार न बदलने के लिए ( एक शख़्स इसे छोड़ने से ) उसका मतलब ये लगाया के उसे छोड़ने की रज़ामंदी मिल गई । इस मसले के लिए अबू मुऊद इफेन्टी ने फरमाया के जिन इवादतों कामों को हमारे नवाज़े गए नवी ने विना छोड़े पावंदी के साथ किया वो सव वाजिव है । ” मकरूहात - ए - नमाज़ के आखिरी हिस्से में ये समझाया गया है के दोनों में से किसी एक को भी छोड़ना मकरूह तहरीमी है | रसूलुल्लाह ' सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' ने हमेशा अपने खुत्वे अरवी ज़वान में दिए ये इस सच्चाई की निशानदही करते है के खुत्वे को अरवी ज़वान में अदा करना वाजिव है | तव से खुत्वे को अरवी ज़वान के अलावा किसी दूसरी ज़वान में या अरबी और उसका तर्जुमा दोनों चीज़े मकरूह तहरीमी है | पहले वाली हालत में , के खुत्वा अरवी में होना चाहिए इस उमूल को तोड़ा जाता है । और वाद की हालत में के खुत्वा सिर्फ अरवी ज़वान में होना चाहिए उस उसूल को तोड़ा जाता है । दोनों हालतों रसूलुल्लाह ‘ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' ने जो काम लगातार अदा किए उनसे इंकार किया गया । उसी तरह , तक़्वीर कहना ( इफतिताह की यानी “ अल्लाहु अकवर ” ) अग्वी ज़वान में जव नमाज़ शुरू करने के लिए हो और वीच में “ अल्लाहु अकवर ” कहना दोनों अलग चीज़ें है दोनों में से कोई एक भी छोड़ना मकरूह तहरीमी है । इसलिए ये वाजिव हो गया है क्योंकि रमूलुल्लाह ' सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' हमेशा “ अल्लाहु अकवर ” कहते थे और इसी वजह से ऐसा न करना मकरूह तहरीमी वन गया । इब्जे आविददीन ' रहमतुल्लाह तआला ' ने रसूल - उल - मुअत्तर में इर्शाद फरमाया : “ मकरूह का मतलव ऐसी चीज़ ( उदाहरण काम या वरताव ) जिसके करने या न करने से वाजिव या सुन्नत से इंकार किया जाए । पहले ( यानी उस
चीज़ से इंकार करना जो वाजिव है ) वाला मकरूह तहरीमी है और वाद वाला ( यानी सुन्नत से इंकार करना ) ( मकरूह ) तन्जीही ( या तन्ज़ीही ) है । ” हलाबी कबीर [ इवराहीम विन मुहम्मद हल्लावी ( 866 , हालेव [ अलिप्पो ] 956 [ 1549 A.D. ] में इस किताब में मंदरजाज़ेल लिखा हुआ है : “ किसी सुन्नत को छोड़ना ( या इन्कार ) करना मकरूह तन्जीही है । जो चीज़ वाजिब है उसको छोड़ना मकरूह तहरीमी है | ” फत्व - ए - सिराजिया ( जिसे अली उसी विन उस्मान ' रहमतुल्लाह तआला अलैहि ' ( d . 575 [ 1180 A.D. ] ने लिखा है ) में लिखा हुआ है के “ खुत्वे को फारसी ( परशीयन ) ज़वान में अदा करने की इजाज़त है | ” ये वातिल ( वेअसर ) हो जाता है विना किसी सबूत के इस बयान को शामिल करना और इस फत्वे पर वहस करना के अरवी ज़वान के अ किसी दूसरी ज़वान में खुत्वा देना सही है और ये के न तो ये मकरूह है और न ही तहरीमी न ही तन्ज़ीही । सिराजिया में इस वयान का मतलव है के ये सही ( ज़रूरी ) है |
इसका मतलब ये नहीं के ये “ मकरूह नहीं " है । इब्ने आविददीन ‘ रहमतुल्लाह तआला ’ ने रसूल - उल - मोहतर में इर्शाद फरमाया : “ उनका ( यानी अली उशिस ) कहना के ये सही है ये इस बात को नहीं दिखलाता है के ये मकरूह नहीं है । ” मुहम्मद अब्दुल हई लकनवी ' रहीमा- हुल्लाहु तआला ' ने अपनी किताव उम्मत - उर - रिआया में फरमाया : " ये इर्शाद के अरवी जवान में खुत्वा कहना कोई शर्त नहीं है जोके पूरी की जाए ( जुमे की नमाज़ सही होने के लिए ) खुत्वे को फारसी में या किसी और ज़वान में अदा करने की इजाज़त है , इसमें ये ज़ाहिर होता है के ( जुमे ) की नमाज़ अदा करने की इजाज़त है । दूसरे लफ्ज़ों में जुमे की नमाज़ के सही होने के लिए खुत्वे की शर्त को पूरा करना चाहिए | इससे ये ज़ाहिर नहीं होता के जो खुत्वा अदा किया वो विला कराहत ( यानी ऐसी चीज़ जो इसे मकरूह वनाए ) जायज़ है । क्योंकि रसूलुल्लाह ' मल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' और सव सहावा ' रज़ि - अल्लाहु अन्हु ' ने हमेशा और हर जगह खुत्वा सिर्फ अरवी ज़वान दिया । उनकी बात के ख़िलाफ जाना मकरूह तहरीमी है ।
" इसी तरह तावईन और तावे तावईन ' रहिमा हुमुल्लाह तआला ' हमेशा और हर जगह खुत्वा अरवी जवान में अदा करते थे । यही नहीं के वो अरवी ज़वान के अलावा और किसी ज़वान में इसको अदा नहीं करते थे बल्कि उनमें से कोई भी अरवी जवान और उसका तर्जुमा ( दूसरी ज़वान में ) दोनों में से किसी में अदा नहीं करते थे । [ यही हालत एशिया और अफरीका के देशों में भी थी जहाँ पर लोग उनके खुत्वे सुनते थे लेकिन ये नहीं समझ पाते थे के वो अपने खुत्वों में क्या कह रहे है क्योंकि उन्हें अरबी नहीं आती थी । हालांकि ये उनके लिए ज़रूरी था के वो अपने खुत्वों का तर्जुमा उन्हें वताए ताकि नए मुसलमानों को इस्लाम के बारे में बता सकें वो ऐसा ख़्याल नहीं करते थे के खुत्वों के लिए अरवी ज़वान के अलावा किसी दूसरी जवान की इजाज़त है | खुत्वों के अलावा वो और दूसरे मौकों पर उन्हें इस्लाम के बारे में बताते थे | वो उनको मश्वरा देते थे के खुत्वों को समझने के लिए और इस्लाम को अच्छी तरह सीखने के लिए अरबी को सीखिए । इस सिलसिले में हम उन उलेमाओं का उदाहरण ले सकते है । ]
ये बिदअत है के उनके खिलाफ जाकर अरवी ज़वान के अलावा दूसरी जवानों में खुत्वे अदा करना । ऐसा करना मकरूह तहरीमी है । पहले वाली हालत को तहरीमी कहना और वाद वाली हालत को तन्ज़ीही कहना वातिल है । मकरूह तन्ज़ीही का मतलव है जो काम सुन्नत है उसे छोड़ना क्योंकि रसूलुल्लाह ‘ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ' हमेशा अपने खुत्वे सिर्फ अरवी ज़वान में अदा करते थे , पूरा खुत्वा अरवी ज़वान में पढ़ना वाजिव है । जो काम वाजिब है वो किस तरह छोड़ने से तन्ज़ीही वन सकता है ? जो चीज़ मकरूह तहरीमी है उसका इंकार करना वाजिव है । मौलाना वहर - उल - उलूम ‘ रहीमा हुल्लाहु तआला ' ने अरकान - उल - अरबा में ऐसे इर्शाद फरमाया है : “ ये वाजिव है के वो काम न किया जाए जो मकरूह तहरीमी है । उस मकरूह वाले काम को
करने का मतलब है के ( एहकाम जो कहे गए उनकी ) वाजिव की नाफरमानी " करना ।
एक शख़्य जो हमेशा ऐसा काम करता है जो मकरूह तहरीमी है वो एक आदिल मुसलमान नहीं है । इब्ने आविददीन ' रहीमा - हुल्लाहु तआला ' ने इने नजय्यम ' रहीमा - हुल्लाहु तआला ' के अधिकार पर ऐसे इर्शाद फरमाया जब उन्होंने अपनी किताव रसूल - उल - मोहतर में वुज़ू की सुन्नतों पर बातचीत शुरू की : “ ये एक मुआफी लायक गुनाह है अगर कोई काम ऐसा हो जाता है जो मकरूह तहरीमी है । इन मुआफी लायक गुनाहों को अगर करता रहे तो एक मुसलमान अपनी अदालत [ बराए मेहरवानी सआदते अवदिया के पाँचवे हिस्से का दूसरा बाब जाँचिए । ] को छीन लेता है ( दूसरे लफ्ज़ों में बहुत सारे मुआफी के लायक गुनाह अगर हो जाते है या कुछ मुआफी लायक गुनाह बहुत बार हो जाते है तो वो एक बहुत बड़ा गुनाह वन जाता है । और खुले तौर पर वड़ा गुनाह करने की वजह से मुसलमान अपनी अदालत खो देता है इस कारण अव वो एक आदिल मुसलमान नहीं रह पाता । ) " इस मसले के लिए खातिव जो अपने तर्जुमे में खुत्वे देते है वो अपनी अदालत खो देते है और फासिक मुसलमान वन जाते है । ( एक फासिक मुसलमान वो मुसलमान है जो बड़े गुनाह खुले तौर पर करे । कवीरा गुनाह के कुछ उदाहरण है जैसे : बिना किसी उज़र इस्लाम के एहकामों में से किसी एक को अदा न करना या फिर खुले तौर पर जो काम ( हराम ) मना है उन्हें करना । ) ये मकरूह तहरीमी है , उन लोगों के पीछे नमाज़ पढ़ना ( यानी फासिक की जमाअत में शामिल होकर नमाज़ पढ़ना । ) नूर - उल - अज़ाह किताब में ये लिखा है ( जो अब्बुल इख़्लास हसन विन उम्मार शरनवलाली ' रहमतुल्लाह तआला अलैहि ' ने 994-1069 [ 1658 A.D. ] मिस्र में लिखी ) और इब्ने आविददीन ने “ ये मकरूह है गुलाम या गाँव वाले के लिए या नावालिग लड़के के लिए अगर वो जाहिल है और विदअती चाहे वो कितना ही आलिम क्यों न हों वो इमाम नहीं बन सकता ( और जमाअत में नमाज़ नहीं पढ़ा सकता ) ये बहुत गुनाह की बात है के उनको इमामत करने दी जाए ( और उनको उस जमाअत में नमाज़ अदा करने दी जाए । ) ” अल्लामा इब्राहिम हल्लावी ‘ रहीमा - हुल्लाहु तआला ' ने हल्लाबी - ए - कबीर में इर्शाद फरमाया : “ वो मुसलमान जो फासिक लोगों को इमाम वनने देते है ( और जमाअत में नमाज़ें पढ़ाने देते है ) वो एक गुनाह कर रहे है ( ऐसा करके ) । एक • फासिक शख़्स को इमाम वनाना मकरूह तहरीमी है । मैराक - इल - फल्लाह में लिखा है “ किसी फासिक शख़्स को इमाम वना देना मकरूह है ।
( और जमाअत में नमाज़ पढ़ाए ) चाहे वो आलिम ही क्यों न हो ( इस्लाम में ) इस्लाम को अपनाने में वो ढीला पढ़ चुका है । ये वाजिब है के उसको बेइज़्ज़त किया है जाए । उसको इमाम बनाए रखने का मतलव है उसकी इज्ज़त करना । अगर तुम उसको जमाअत की नमाज़ पढ़ाने से रोक नहीं सकते तो तुम जुमे की नमाज़ और सारी दूसरी नमाज़ें किसी और मस्जिद में जाकर पढ़ो । ” जैसा के अल्लामा तहतवी ' रहीमा - हुल्लाहु तआला ' ने इस तहरीर को समझाया है- उन्होंने कहाः “ ये मकरूह तहरीमी है ( मुसलमानों के लिए ) के एक फासिक आदमी को इमाम वनाया ( और उनकी नमाज़ों की जमाअत अदा कर रहा है । ) ” तुम ख़तीव को अरवी के अलावा किसी और ज़वान में खुत्वे पढ़ने का वाइस मत बनो । ये गुनाह का वाइस है | इ आविददीन ' रहीमा - हुल्लाहु तआला ' ने रसूल - उल मुऊतर में इर्शाद फरमाया : ( जमाअत में ) “ नमाज़ फासिक इमाम के पीछे नहीं पढ़नी चाहिए । तुम्हें ऐसे इमाम को देखना चाहिए जो फासिक न हो । जुमे की नमाज़ का अलग मसला है । हालांकि , फिर भी जुमे की नमाज़ फासिक इमाम के पीछे पढ़ना मकरूह है जवके वो शहर की कई और मस्जिदों में भी पढ़ाई जा रही हो । इस हालत में ये मुमकिन है के किसी दूसरे इमाम के पीछे नमाज़ अदा की जाए | फह - उल - कदीर [ इने हुमाम ' रहमतुल्लाह तआला अलैहि ' ( 730 - [ 1388 A.D. ] - 861 [ 1456 ] ने अपनी हिदाया की तफसीर में इसे लिखा था , जो पहले बुरहानऊददीन मरघीनानी ' रहमतुल्लाह तआला अलैहि ' ( 593 [ 1197 A.D. ] जिन्हे चंगेज़ खान के आदमियों ने शहीद कर दिया था ) ने लिखी थी ] किताव ने भी इसी बात पर जोर दिया है । " इसलिए तुम किसी ऐसे इमाम के पीछे नमाज़ मत पढ़ो जो खुत्वा सिर्फ अग्बी ज़वान में नहीं वल्कि उसका तर्जुमा दूसरी ज़वान में भी करे और तुम ऐसे इमाम को ढूँढी जो खुत्वा सिर्फ अरवी ज़वान में पढ़े और उसी इमाम के पीछे जुमे की नमाज़ पढ़ी ( यानी तुम वही नमाज़ पढ़ो जिसकी जमाअत की नमाज़ वो इमाम पढ़ा रहा हो । ) तफ़सील के लिए इत - तहकीकात - उस - सैनिय्या - फी - कराहत - इल खुत्वा - ती - बे गैरिल - अरबिया - व - किरआतिहा- वि - ल - अरबीयात - ए - मआ - तर्जिमातेहा - वे गैरिल - अरबीयाती | इस नाम की किताब को पढ़िए । यहाँ अल्लामा मुहम्मद तेमीमी मदरासी की तहरीरों से जो तर्जुमा हमने लिया वो ख़त्म होता है |
ऊपर जो तहरीर है जिसे 1349 [ 1931 A.D. ] में हिन्दुस्तान में अरवी में लिखा गया | जिसे हिन्दुस्तान के सबसे आला तेराह इस्लामी आलिमों ने माना और अपनी रज़ामंदी की मोहर ज़वत की । इस तारिखी फत्वे के साथ साथ देऊबंद और बाकीयात - उस - सुआलिहात और मदरास और हैदराबाद के हिन्दुस्तानी आलिमों के अरबी के फत्वे इस्तानबुल तुर्की में 1396 [ 1976 A.D. ] में छपे थे | दुनिया के हज़ारों मशहूर गहरी समझ बुझ रखने वाले उसमानिया के इस्लामी मौलवियों ने और शैख़ - उल - इस्लाम ' रहीमा - हुमुल्लाहु . तआला ' ने लोगों की मदद करने के लिए ऐसे बहुत से रास्ते ढूँढे ताकि जो खुत्वे वो सुन रहे है उनको समझ आ जाए । वो कोई भी ऐसा सबूत ढूँढने में नाकाम रहे जिससे तुर्की ज़वान में खुत्वों का खुलासा शामिल करने की इजाज़त हो | उन्होंने उसके लिए कोई इजाज़त नहीं दी । जमाअत के बारे में और ज़्यादा जानकारी का मकसद है ( मुसलमानों को बताने के लिए ) जुमे की तालिमात को जुमे की नमाज़ के बाद सव मस्जिदों बताकर हासिल किया गया और उन लोगों को छ : सौ साल से ' फत्वे ' के जो मकासिद थे उसके बारे में बताया गया और इस तरह इस्लाम की तालिमात की बाहरी सरहद की किसी भी नुकसान से हिफाज़त की गई । ]
ईद की नमाज़ मे ( यानी वो नमाज़ जो दोनों ईदों के पहले दिन सुवह पढ़ी जाती है ) में नौ ( तक्वीरें है जिन्हें कहा जाता है ) तक्वीर - ए - ज़वाएद है | उनमें से एक फर्ज है , दूसरी उसमें सुन्नत है । सात उसमें से वाजिव है । तक्वीर - ए- इफतिताह फर्ज है । पहले रुकू की तक्वीर मुन्नत है । ज़वाएट हैं की तक्वीरे वाजिव है । दूसरी रकअत की रुकू की तक्वीर वाजिव है जो एक ही वक्त में दूसरी वाजिव तक्वीर में मिल रही है । ( दूसरे लफ्ज़ों में ये है के एक ही समय में आखिर की सात तक्वीर - ए - ज़वाएट वाजिव है । )

टिप्पणियाँ