फातमा के लगते जिगर दो फूल (हसन, हुसैन)

 दो मोती बाग ए रिसलात के दो फूल (हसन, हुसैन)


नाना हों सय्यदुलंबिया , नानी हों ख़दीजातुल कुबरा , बाप हों सय्यदुल औलिया , माँ हों सय्यदतुन्निसा तो बेटे पैदा होते हैं सय्यदुश्शहुदा । नबी का नूर , अली का ख़ून फ़ातिमा का दूध एक जगह मिल जाए तो बनते हैं हसन और हुसैन । आयत ए करीमा मरजुल बहरैन की तफ्सीर में लिखा कि इन दोनों दरियाओं से मुराद अली और फ़ातिमा हैं और इन दो दरियाओं से जो मोती मूँगा पैदा होते हैं वह हसन व हुसैन हैं । 
 - दो दरिया अली व फ़ातिमा हैं । बरज़ख़ हुजूर और मोती हसन व हुसैन हैं । बहरे नबूवत फ़ातिमा बहरे नबूवत , बहरे फ़तूत अली और दरम्यान में बरज़ख़ या ख़िजाब तक़वा इन से जो मोती और मरजान पैदा हुए वह हसन व हुसैन हैं । उन शहजादगान ए आली वकार के इज्ज़त व एहतराम और अजमत व शान का कौन अंदाजा कर सकता है जिन की वालिदा मोहतरमा का नाम फ़तिमा जोहरा हो जिसकी शान बतूल और लकब ख़ातून ए जन्नत और ख़ातून ए क़यामत | 

 कौन ख़ातून ए क़यामत

 ! जिसका लकब जोहरा और ज़ाहिरा है । जोहरा कली को भी कहते हैं और जिया को भी । रसूले मौअज्ज़म फ़रमाते थे : -मेरी बेटी से जन्नत की खुश्बू आती है । आप जन्नत की इस कली को सूँघा करते थे । 

कौन ख़ातून ए क़यामत 

! जिस को सवारी मैदान ए हश्र में आएगी तो मुनादी कर दी जाएगी कि ए अहले महशर अपनी निगाहें नीची कर लो कि मौहम्मद की बेटी की सवारी गुजरने वाली है  कौन ख़ातून ए क़यामत ! जिस की सवारी सत्तर हजार हूरों के झुरमट में पुलसिरात से ऐसे गुज़र जाएगी जैसे बिजली कौंद जाती है । 

 कौन ख़ातून ए क़यामत ! 

जो अपने बाप सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम के बाद सबसे पहले जन्नत में तशरीफ ले जाएंगी । 

 ख़ातून ए क़यामत ! 

जो जन्नत की तमाम औरतों की सरदार हैं । फ़ातिमा सय्यदुतन्निसा अहलिल जन्नत । 

कौन ख़ातून ए क़यामत !

 जिनके अपने और शौहर के मुस्कराने से जन्नत ऐसे रौशन हो जाएगी जैसे आफ़ताब तुलुअ हो जाता है ।

कौन खातून ए कयामत !

 जिनकी औलाद पर खुदा तआला ने जहन्नम हराम फरमा दिया है।

कौन खातून ए कयामत

 जिसके हुबदारों को जन्नत के टिकट अता किये जाएंगे । आप की शादी के बबूत रिजवान ने तूबा को हिलाया तो पोडिब्बाने अहले बैयत की तादाद के मुताबिक पहले गिरे । रिकाआ नागद गोहब्ध आहले बैयति और वही कयामत के दिन जन्नत के टिकट बन जाएगे J 

कौन ख़ातून ए कयामत !

 जो जन्नतुल फिरदौस में मय अपने शौहर और औलाद के उसी मुकाम और इसी महल में कृयाम फरमाएंगे ● जहां उनके अब्बाजान होंगे ।  आं हज़रत बाफातिमा ख़िताब कर्द । मन व तू व अली व हसन व हुसैन दरेक मुकाम व मकान ख़्वाहीम बूद । ( अशअतुल इलमात)

 कौन खातून ए कयामत ।

 जिसे इमामुलंबिया सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम ने ईसानी दूर फरमाया । 

कौन खातून ए कयामत 

जिसका लकब बतूल है और बतल उसको कहते हैं जिसने औरतों के किसी मर्ज को न देखा हो । जो हैज व निफास की आलुदगियों से मुनज्जा और पाक हो । तय्यबा और ताहिरा हो ।

 कौन ख़ातून ए क़यामत !

जो नूर से पैदा हुई और जिसने पैदाभी नूर ही किया । 
            तू है ऐन नूर तेरा सब घराना नूर का 
            तेरी नस्ल ए पाक में है बच्चा बच्चा है नूर का
                                                 ( आला हज़रत बरेलवी ) 

कौन ख़ातून ए क़यामत !

 जिस का नाम ए अकदस फ़ातिमा उसको कहते हैं जो निजात दिलाने वाली हो और जो जहन्नुम से अपने गुलामों को आज़ाद कराने वाली हो । 

 कौन ख़ातून ए क़यामत ! 

जिनके पर्दे का एहतराम करते हुए मल्कुल मौत उनकी रूह कब्ज़ करने पर राज़ी न हुआ । और फिर खुद अल्लाह तआला ने अपने दस्ते कुदरत से उनकी रूह कब्ज़ फ़रमाई । 
उस बतूल ए जिगर  पारा ए मुस्तफा हुज्ला आराए इफ्फत  पे लाखो सलाम 
जिसका आचल  न देखा मह व मेहर ने , उस रिदाए नजाहत पर लाखों सलाम
आबे तत्हीर मे जिसके पौदे जमे , उस रियाजे निजात पे लाखों सलाम।   

            सय्यदा जाहिरा , तय्यबा , ताहिरा 
           जाने अहमद  की राहत पे लाखो सलाम 

 

कौन ख़ातून ए क़यामत ! 

जिसके हुजूर में अल्लामा इक़बाल अकीदत के फूल इस तरह पेश करते हैं : 
                मरियम इज़ यक निस्बते ईसा अज़ीज़
                 इज़सा निस्बते हज़रते जोहरा अज़ीज़
                   नूर चश्मे रहमतुल आलिमीन 
                   आँ इमाम अव्वलीन व आख़िरीन 
          बानोवे आँ ताजदारे हल अता
           मुर्तज़ा , मुश्किलकुशा , शेरे ख़ुदा
           मादर ए आँ मरकज परकार ए इश्क
           मादर ए आँ काफिला सालार ए इश्क 

ख़ातून ए क़यामत !

 जिसने अपनी रिदाए मुबारक फरोख्त करके सायल का सवाल पूरा कर दिया । जो चक्की भी पीस रही होती और तिलावते कुरआन भी फ़रमा रही होती । हूरें और मलायका जिसके फ़रमान के मुंतज़िर थे मगर उसने अपनी रज़ा को रजा़ाए शौहर में गुम कर दिया था । 

कौन ख़ातून ए क़यामत ! 

जो नमाज़ पढ़ती तो आँखों से अश्क जारी होते ।

कौन ख़ातून ए क़यामत ! 

जिसके आँसुओं को जिब्राइल माँतियों की तरह चुनकर शबनम की।   तरह अर्श ए बरी पर बिखेर देता था ।  

                बहरे मोहताजे देश आँ गोना सोख्त 
                बायहूदे चादरे खादरा पुरोख़्त
                नूूरी दहम आतिशी पुरमाँ बशं 
                गुम रज़ाईश दर रजा़ाए शौहरश
               आँ अदब पर दर दाअह सबर व रज़ा 
               आसिया गर्दान व लब कुरआँ सरा 
                गरया हाए ऊ ज़बाल बेनियाज
               गौहर अफशान्दे बदामान ए नमाज़ 
               अश्क ऊ बर चीर जिब्राइल इज़ ज़मीन 
                हमचू शबनम रीख़्त बर अशं बरी
 इसके बाद इक़बाल कहते है कि मेरे पांवों में कानून ए खुदावंदी की जंजीर है और रसूल ए करीम सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम के हुक्म का पास है वर्ना मैं सय्यदा फातिमा जोहरा ख़ातून ए क्यामत मज़ार ए अकदस का तवाफ करता और आपकी कबर ए अनवर पर सज्दे करता ।

                रिश्ता आईन हक जंजीर पा अस्त
                पास ए फ़रमाने जनाब मुस्तफा अस्त 
                वर्ना गुर्दे तुरे तबिश गरदीदमे
                 सज्दा हा बर खाक ए ऊ पा शैदमे 

कौन ख़ातून ए क़यामत !

 जिसके नक्शे कदम पर चल कर हो औरत , औरत बन सकती है । जिसके उस्वा ए हस्ना को मशाले राह बनाकर ही मुसलमान औरतें अपना सही मुकाम हासिल कर सकती हैं जिसकी सीरत से सबक हासिल करके ही मुसलमान माऐं मुजाहिद पैदा कर सकती हैं । इसलिए कि बेटों की सीरत मां की सीरत से बनती है । माँ बेपर्दा हो तो औलाद बेहया होती है । माँ का किरदार बुलंद हो तो औलाद का किरदार बुलंद होता है । माँ इबादत गुज़ार हो तो बेटे वली पैदा होते हैं । माँ सिनेमा में हो तो बेटे एक्टर पैदा होते हैं ।

       सीरते फरज दहा इज् उम्माहात
          जो हर सिद्क व सफा इज़ उम्माहात
                 मज़रऐ तस्लीम रा हासिल बतूल 
                 मादराँ उस्वाए कामिल बतूल 
होशियार इज़ दस्तबुर्द रोज़गार 
गीर फरज़ंदाने खुद रा दरकिनार 
               फितरत तो जज़्बा हा दारद बुलंद 
                चश्मे होश इज़ उस्वा जोहरा मब्नद 
     तो हुसैन शाखा तू बार आदर्द 
      मौसमे पेशीं बगुलज़ार आवरद 
                                 अगर पिंदे ज़ददीशे पज़ीरी
                                  हज़ार उम्मत बमीरद तू न मेरी
         बतूले बाश व पन्हा शूइज़ीं असर 
        कि दर आगोश शब्बीरे बगीरी

 इक़बाल 

इस्लाम की बेटी जब तक शहजादी ए इस्लाम मल्लिका ए सल्तनत इफ्फत व अस्मत सय्यदा फातिमा जोहरा ख़ातून ए कयामत की होती जाएगी । औरतों की रहबर हयात तैयबा व ताहिरा को निशाने मंजिल नहीं बनाएगी । मंजिल से दूर रहबर व रहनुमा है तो ख़ातून ए क़यामत , पैकर ए शर्म व हया है तो ख़ातून ए क़यामत , पैकर ए इफ्फ़त व अस्मत है तो ख़ातून ए क़यामत 

कौन ख़ातून ए क़यामत ! 

जो ज़ोहरा भी और ज़ाहिरा भी , तैयबा भी और ताहिरा भी । नय्यरा भी और मुनव्वराह भी है और मुत्तहिरा भी । अकीकाह भी हैं और सिद्दीका भी , अफीफा भी है और मुनीफा भी , • आलिमा भी और फ़ाज़िला भी , आबिदा भी है और जाहिदा भी , साजिदा भी है और राकिआ भी , कामिला भी है और अकमला भी , अकीला भी और आकिला भी , अमीना भी है और आमना भी , साबिरा भी है और शाकिरा भी , नासिराा भी है और मंसूराह भी , सईदा भी हैं और सादिका भी , राहिमा भी है और राशिदा भी ।
 हाँ हाँ वहीं ख़ातून ए कयामत ! जो मासूमा भी और मख़दूमा भी , जो सायमा भी है और आसिमा भी , जो शफ़ीका भी , अजीमा भ और आज़िमा भी , मोसिना भी और अकरमा भी , मोहतरमा भी है और
 मुकर्रमा भी , आमिला भी और मोअल्लिमा भी , राजिया भी है और मरजिया भी , हाश्मिया भी है और कुरैशिया भी , वसीला भी और कफ़ीला भी , नासिहा भी है और कासिमा भी । कौन ख़ातून ए क़यामत ! जिसकी तारीफ का हक़ न कोई अदा कर सका है और न ही क़यामत तक कोई अदा कर सकता है ।

                   रंग बहारे बाग रिसालत हैं फातिमा 
                   सर चश्मा रियाज़ विलायत हैं फातिमा 
                  उम्मीदगाह हश्र व कयामत हैं फातिमा
                  दुनिया में वजह आयते रहमत हैं फ़ातिमा
 रूहे रवाने पंजतन व जाने मुस्तफा 
आले अबा की दूसरी आयत हैं फातिमा
 मासूमियत प जिन की है हूर व मलक को नाज़
 नकद व मताअ ए अहदे नबूवत हैं फातिमा 

पहला फूल खिलता है 

इस शहज़ादी मुल्के इफ्फ़त व इस्मत सय्यदा फातिमा जोहरा के गुलशन ए तत्हीर में पहला फूल खिलता है । रमज़ानुल मुबारक की पंद्रह तारीख़ और हिजरत का तीसरा साल है । 
 जिब्राइल अलिहिस्सलाम दरबारे - रिसालत हाज़िर हुए सलाम अर्ज़ कियाः - खुदावंदे कुद्दूस की तरफ से मुबारकबाद पेश की और एक रेश्मी कपड़े का मन्कुश टुकड़ा आप के सामने पेश किया ।

 जन्नत के उस टुकड़े पर एक तस्वीर थी निहायत खूबसूरत बच्चे की तस्वीर । ऐसी प्यारी तस्वीर जैसे सरकार दो आलम सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम के बचपन की अपनी तस्वीर हो । आप तस्वीर देखने में महू थे और जिब्राईल अर्ज़ कर रहे थे : -जिनकी यह तस्वीर है वह बिन्ते रसूल की गोद में तरशरीफ ला चुके हैं । गुलिस्ताने ज़ोहरा में पहला गुले अकदस खिल चुका है । खुदावंदे कद्रूस ने उनका नाम भी तज्वीज़ फ़रमा दिया है । हज़रत हारून के बेटे के नाम पर उनके बेटों के नाम शब्बर व शब्बीर थे , इनका नाम शब्बर है । उसके मायने हसन भी होते हैं । ताजदारे - दोआलम ने यह बिशारत सुनी तो आप बेहद खुश हुए । आप के लबों पर मुस्कराहट खेलने लगी । रूहे - कायनात मुस्कराई तो कायनात
 वज्द में आ गई । कौनेन में मुसर्रत की लहर दौड़ गई । जन्नत में खुशियों के चशमे उबलने लगे । हूरे एक दूसरी को मुबारकबाद देने लगीं । तमाम आलम कैफ व शहर में डूब गया । यूँ मालूम होता था जैसे मदीना गुनन्दराह की गली गली जगमगा उठी कूचा कूचा तबस्सुम रेज़ हो गया हो और हर मकान मुस्करा रहा हो । 

इसी आलम ए वन्द व कैफ में सरकारे - दोआलम सल्लल लाहु अलिहि व सल्लम अपनी बेटी के घर तशरीफ ले गए । जाके देखा तो हुन्य बतूल में एक नन्हा चांद तुलूअ हो चुका है । इमामुलंबिया की अपनी तस्वीर वही नक्श व निगार , वही नाक नक्शा , वही मतलाअलफ्जर पेशानी , वही बद्दुहा रूंख्सार , वही माज़ाग नरगसी आँखें वही हुन व राअनाई वही नूर व निगहत , वही नुजहत व लताकृत । जनाब आमना होतीं तो उन्हें हुजूर की तश्रीफ आवरी का वक्त याद आता 
 आमना के चाँद ने फातिमा के चाँद को गोद में उठा लिया । दोनों चाँद मुस्करा रहे थे । दोनों की निगाहें मिली हुई थीं । फ़ातिमा का चाँद बार बार मुँह खोल रहे है । जैसे नानाजान से कुछ माँग रहा हो । हुजूर ने अपना लुआबे दहन नवासा के मुँह में डाल दिया । जैसे नेअमत मिल गई हो । इमामुलंबिया ने नवासा कान में अजान व
तक्वीर की आवाज़ पहुँचाई । हसन नाम तज्वीज़ फ़रमाया और बेटी की गोद में दे दिया । सात रोज बाद अकीका किया , ख़त्ना किया , सिर के बाल उतरवाए और उनके साथ चाँदी वज़न करके ख़ैरात कर दी । इमाम हसन रज़ियल्लाहू अन्हु की जिंदगी के हालात से आगाही के लिए हमारी जैरे - तरतीब किताब " अल - हसन अल - माअरूफ शहीदे ज़हर " का मुलालिआ करें । 

" दूसरा फूल खिलता 

सुबह का वक्त है सरकारे - दोआलम सल्लल लाहू अलिहि व सल्ल्म मस्जिदे नबवी में तश्रीफ फरमा हैं । हज़रत उम्मुल फज़ल जोजा ए अब्बास बिन अब्दुल मुतलिब रज़ियल्लाहू अन्हुम निहायत परेशानी के आलम में दरबारे रिसालत में आती हैं , आप ने परेशानी का सबब पूछा । 
 अर्ज़ किया या रसूलल्लाह मैंने रात को बड़ा परेशानकुन ख़्वाब देखा है । 

काल ! मा हुआ ? 

आप ने फ़रमाया चचीजान बयान करो । कालत अंदेशा ! अर्ज़ किया हुजूर बड़ा शदीद ख़्वाब है । काल - मा हुआ ? फ़रमाया बयान तो करो । कालत रायत कान कृतअता मन जस्दिका कृतअत व वज़अत फ़ी हुजरी । अर्ज़ किया : - मैंने देखा कि आप के जिस्म को काट कर एक टुकड़ा अलिहिदा किया गया है और फिर वह टुकड़ा मेरी झोली में आ गया । 
रसूलल्लाह सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम ने फ़रमाया : -चचीजान आप ने बहुत अच्छा ख़्वाब देखा । इंशाल्लाह तआला मेरी बेटी के घर लड़का पैदा होगा और तू उसे गोद में उठाएगी । और फिर शहजादी मुस्तफा की गोद में 5 शाबानुल मौअज्ज़म हिजरी के चौथे साल हुसैन आ गए । 
मुमलिकत शहादत का ताजदार और गुलिस्ताने फातिमा का दूसरा फूल ताजदार मदीना के जिस्म का टुकड़ा । नानाजान ने शब्बीर और हुसैन नाम तज्वीज़ फ़रमाया । कान में तकबीर व अजान कही । हुसैन के मुँह में अपना मुबारक लुआबे - दहन डाला । सातवें दिन अकीका और ख़ला किया । सिर के बाल उतरवा कर चाँदी ' वजन की और सदका दी । 
सय्यदा फ़ातिमा जोहरा के घर में दो चाँद तुलुअ हो चुके हैं । गुलशने अली में दो फूल खिल चुके हैं , चश्मा ए नबूवत से जानी होने वाले दो दरियाओं के दो दरख़शन्दा मोती । 

                    सीरते हुसैन का ख़ाका 

सल्तनत रूहानियत के शहरयार इमाम हुसैन की सीरत तैयबा को अगर तफ्सील से बयान किया जा सकता है कि हुसैन अपने नाना की चलती फिरती तस्वीर थे । हुस्न व जमाले मुस्तफ़ाई का रौशन आईना थे । सीरते मुस्तफ़ा का मज़हरातम थे । आप का खुल्क खुल्के - रसूल था । आप की सीरत सीरते रसूल थी । आप का किरदार किरदारे रसूल था ।
आप का चलना - फिरना , उठना बैठना , खाना सेना , सताक्ल सब सय्यदुल मुरसलीन सल्लल लाहू अलिहि वसल्ल्या अ जमील और परवतत्रि तामा था । आप गुफ्तगू करमात तो की मालूम येत इमामुलंबिया की आवज आ रही है । आप हुन्जा ए बदल से बाहर आ तो ऐसा लगता जैसे फारान की चोटियों से आमन  का चांद  तुलूह  हो रहा है।
आप वह आईना ए नूर थे जिसमें जमाले मुस्ताद का मु मुशाहिदा किया जा सके । गुप्तार में वही हलावत कही सीधीनी , किश्वर में वही पुख्तगी , अनवार , चेहरे पर वही दूर और बडी तकदुस , हतार में वही अज़मत और वही बकार , सीने में बही खुलूस का मौजाजूने बहर बेकिनार , दिल में वही जज्बा ए रहम व सखावत , आँखों में ही सरमा ए माज़ागु की चमक , रुखसारों पर बही तजन्तिवात बहुझा , जुलखों में वही वल्लैल की स्याही , माँग में वही बन्नज्म की ताबानी ।
 अलगर्ज शहजादा ए कौनेन इमाम हुसैन सूरत में भी नकुला ए थे और सीरत में भी आप ही का जलवा ऐन बहुत थे । इत्तिबा ए रसूल का पैकर देखना हो तो इमाम हुसैन की देख लो । सुन्नते - मुस्तफा का पैकर देखना हो तो हुसैन को देख लो । आप जूदी अता और खैर व सखा के मुन्वन थे । यह नामुमकिन बात है कि सावल हुसैन के दरवाजे पर आकर खाली हाथ चला जाए उनके खुन्नात व इर्शाद में वह असर आफरीनी श्री कि सामईन के दिल हिल जाते और आँखें अश्कवार हो जाती । हुसैन तिलावत फरमाती तो की मालूम होता जैसे किताबे - मुकद्दस का नजूल हो रहा हो । आप के जूदोसखा , करम व  अता , इबादत व रियाजूत और इल्म व हलम के चंद बाकिआत मुलाहिजा करें । 

 सायल नवाजी :-

-आपके दरबार में एक सायल हाज़िर हुआ । आप के पास पाँच तोड़े अशर्फियां थीं , आपने सारी आशर्षिया उसे दो दी । शायरनवाज़ी : -आप की खिदमत में एक शायर ने दो शोअर लिखकर भेजे । चंद लम्हों बाद उसने दो शेअर और लिखकर भेज दिए , जिनमें अहले बैयत की सखावत और अपनी परेशानी का इजहार किया गया था ।आपने दस हजार दरहम अता कर के फरमाया कि अगर तुम जल्दी  न करते तो हम और भी अता करते । 

 गुलदस्ता की कीमत:-

आप की एक कनीज ने आप को गुले - रैहान का
गुलदस्ता पेश किया तो आप ने उसे आज़ाद कर दिया । हज़रत अनस ने कहा या इमाम , आपने एक गुलदस्ता के औज़ में कनीज़ को आज़ाद फ़रमा दिया है । आप फ़रमाया : - हाँ , अल्लाह तआला का फ़रमान है।
   जो तुम्हें दुआ दे , तुम भी उसे अच्छी दुआ दो ।

 ग़लती का बदला : -

इमाम आली मुक़ाम मेहमानों के साथ खाना खा रहे थे । गुलाम के हाथ से गरम शोरबा का प्याला गिरा और आप के सिर पर टूट गया । आपने तादीबन गुलाम को देखा तो उसने पढ़ दिया :
 वल काज़िमीनल गैज़ वल आफ़िमीन अनिन्नास वल्लाहुल यहिब्बुल मोहसीनीन । 
आपने फ़रमाया हमने तुम्हारी ग़लती भी माफ़ कर दी औ आज़ाद भी कर दिया और तुम्हारे इख़ाजात भी हमारे ज़िम्मा हैं । 

ख़ल्काहुल कुरआन : -

 आप चार सद सहाबा के जलू में तश्रीफ ले जा रहे थे । एक आअराबी ने पूछा आप अबू तालिब के पोते हैं ? आपने फ़रमाया : - हाँ । तो उसने हज़रत अली की शान में नाजिबा कल्मात कहे । सहाबा - ए - कराम ने कहा उसकी जुबान बंद कर दें । लेकिन इमाम आली मुकाम ने उन्हें रोक दिया । 

हुस्ने इबादत : -

इमाम जैनुल आबिदीन से किसी ने पूछा : - आप के वालिद की औलाद क्यों क़लील है । आप ने फरमाया जितनी है , उसे गनीमत समझो । मेरे वालिदे - गिरामी को दुनिया की तरफ रगबत ही कब थी और वह तीन हज़ार नफ़िल हर दिन रात में अदा फ़रमाते थे ।

 लाजवाबी का ईनाम : - 

एक शख्स ने इमाम की ख़िदमत में अर्ज़ किया मैंने रसूले - करीम से सुना है कि अरबी शरीफ़ हामिले - कुरआन खूबसूरत और करीमे - मौला के सामने अपनी हाजत बयान करो । आप में यह तमाम सिफ्फ़ात मौजूद हैं । आपने फ़रमाया अपनी हाजत बयान करो । उसने ज़मीन पर तहरीर कर दिया । आप ने फ़रमाया : - तुम ज़हीन आदमी . हो , मेरे तीन सवाल हैं । अगर एक का जवाब दोगे , मेरे पास यह थैली है इसमें से तीसरा हिस्सा तुम्हारा । दो का जवाब दोगे , तो दो हिस्से । तीनों का जवाब दोगे , तो सारी थैली तुम्हारी । उसने दो सवालों का
 जवाब में दिया तो आप ने तीसरा सवाल किया कि इंसान को कौन सी चीज़ आरास्ता करती है । उसने कहा इल्म बशर्त कि बुर्दबारी के साथ हो । फरमाया : - अगर यह निकल जाए ? आराबी ने कहा : -माल , जिसके साथ करम हो । आप ने फरमाया : अगर यह भी निकल जाए ? तो आराबी ने बेबसी के साथ झुंझला कर कहा कि फिर उसे बिजली जला दें । आपने उसकी बेबसी देखी तो हँस पड़े और पूरी थैली उसको अता कर दी ।

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