कर्बला की मट्टी का बयान (शहादते हुसैन)

       कर्बला की मट्टी का बयान (शहादते हुसैन)



                        शहादते - हुसैन की पेशगोईयां
 शहजादा - ए - गिलगों क़बा जिगर - गोशा ए मुस्तफ़ा नूरे मुर्तजा , अमीने अमानते - खुदा , नय्यरे - बुर्जे सफा , जलवा ए शम्सुदुहा , नक्शा ए बदरूद्दुदुजा , पैकरे - सबर व रज़ा , शहज़ादा ए कौनेन , जनाव जोहरा क नूरे - एैन , हज़रत जनाम इमाम हुसैन रज़ियल्लाहू अन्हू की शहादते- अकदस को हरगिज़ इत्तिफ़ाकी हादसा क़रार नहीं दिया जा सकता । शहादते - हुसैन मशियते इज़्दी के बनाए हुए बाकायदा प्रोग्राम के तहत जहूर में आई है । जिसकी मुख़्तलिफ़ वजूहात आप इस blog में कई मुकामात पर मुलाहिजा फ़रमा चुके हैं । शहादते हुसैन वह शहादते- अज़ीम है जिसकी शहादत रसूले- हाशमी सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम ने अपनी ज़बान फ़ैज़े - तर्जुमान से दी । शहादते - हुसैन वह शहादते - मुक़द्दस है जिसकी गवाही जिब्राइल ने दी जिसका नक्शा रसूले पाक ने बयान फ़रमाया । जिसका ऐलान खुद खुदा वंदे कुद्दूस दो जहान ने फ़रमाया । यह वह शहादते मौअज्जम है जिसका चर्चा इमाम आली मुकाम की विलादत मुबारिका के साथा ही शुरू हो गया था और फिर इसका बार बार ऐलान होता रहा । चंद मोअतबिर रिवायात मुलाहिजा है कि यह इत्तिफ़ाकी हादसा नहीं । जैसा कि यज़ीद नवाजों का गुमान है । बल्कि तारीख़े - इस्लाम का इंतिहाई गैर - मामूली और ख़ासुल - ख़ास वाकिआ है ।

 पेशगाई न : 1 (पहली बार मिट्टी का रंग)

हज़रत उम्मुल फज़ल बिन्ते हारिस फ़रमाती - हैं कि मैं हुजूर सल्लल लाहू अलिहिव व सल्लम की ख़िदमत में हुसैन को लेकर गई और आप की गोद में दे लिया तो मैंने देखा कि रसूलल्लाह सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम की आँखों से लगातार आँसू बह रहे हैं ( इसी हालत में ) आपने मुझसे फरमाया कि जिब्राइल ने ख़बर दी है कि मेरे इस बेटे को मेरी उम्मत शहीद करेगी । फिर जिब्राइल ने मुझे इस की शहादतगाह की सुर्ख मिट्टी दी । 

पेशगोई नंबर : 2 (दूसरी बार मिट्टी का रंग)

हज़रत अनस रज़ियल्लाह अन्हू फ़रमाते है कि बारिश बरसाने वाले फ़रिश्ते ने हुजूर सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िरी देने के लिए रव तआला से इजाज़त तलब की इजाज़त मिलने पर जब बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुए तो उस वक्त हज़रत हुसैन नबी सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम के मुबारक कंधों पर झूम झूम कर खेल रहे थे । 
उस फ़रिश्ते ने रसूलल्लह सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम की ख़िदमत में अर्जु की : - क्या आप हुसैन से प्यार करते है । तो हुजूर सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम ने फरमाया हाँ ! उसने कहा कि -आपकी उम्मत इस को शहीद कर देगी और अगर आप चाहें तो मैं इनकी  शहादतगाह आप को दिखा दूँ । फिर उसे अपना हाथ ज़मीन पर मारा और हुजूर सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम को सुर्ख मिट्टी दिखाई । उस मिट्टी को हज़रत उम्मे सलमा ने कपड़े में बाँध लिया । अनस कहते हैं कि हम सुना करते थे कि हुसैन करबला में शहीद होंगे । 

 पशगाई : 3  (तीसरी बार मिट्टी का रंग)

हजरत उम्मे सलमा रज़ियल्लाहू अन्हू फ़रमाती है कि मेरे घर में हसन और हुसैन खेल रहे थे तो जिब्राइल अलिहिस्स्लाम ने आकर हुजूर की  , खिदमत में अर्ज़ किया : -आपके बाद आपके इस बेटे को आप की उम्मत शहीद कर देगी और जिब्राइल का 
इशारा हुसैन की तरफ़ था और आप की ख़िदमत में थोड़ी सी मिट्टी पेश की । आपने उस मिट्टी को सूँघ कर फ़रमाया : - इसमें से रंज व बला की बू आती है और मुझे बुलाकर फ़रमाया ऐ उम्मे सलमा जब यह मिट्टी खून बन -जाए तो समझ लेना कि मेरा शहीद हो गया । फिर मैंने उस मिट्टी को शीशी में बंद कर रखा ।  

पशगाई : 3 (चौथी बार मिट्टी का रंग)

अनस इब्ने हारिस फ़रमाते है कि मैंने रसूलल्लाह सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम को फ़रमाते हुए सुना कि यह मेरा बेटा ( हुसैन ) उस ज़मीन पर शहीद किया जाएगा जिसका नाम करबला है । तुम लोगों में से जो शख़्स भी वहां मौजूद हो उसकी मदद करे और फिर अनस बिन हारिस इमाम हुसैन के साथ ही करबला गए और आपके साथ ही शहीद हो गए। 

 पशगाई नबर : 5 (पांचवी बार मिट्टी का रंग)

 हजुरत उम्मे सलमा रज़ियल्लाहू अन्हू फ़रमाती हैं कि रसूलल्लाह सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम एक रोज़ करवट बदल कर सो रहे थे और फिर जब बेदार हुए तो आप ग़मगीन व गमजदा थे । आपके मुबारक हाथों में सुर्ख़ मिट्टी थी जिसे आप उलटते - पुलटते थे । मैंने अज किया : - या रसूलल्लाह यह मिट्टी कैसी है ? तो आपने फ़रमाया : - हमें जिब्राइल ने ख़बर दी है कि मेरा हुसैन सर ज़मीने ईराक़ में जाएगा और यह वहीं की मिट्टी है । शहीद कर कर दिया जाएगा ही करबला आपके साथ ही शहीद हो गए । 

 पेशगोई नंबर : 6 (छठी बार मिट्टी का रंग)

हज़रत आयशा रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत है रसूलल्लाह सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम ने इर्शाद फ़रमाया कि मुझे जिब्राइल अलिहिस्सलाम ने ख़बर दी । है कि मेरे बाद मेरा बेटा हुसैन अर्जे - तफ़ पर शहीद कर दिया जाएग और मेरे पास या वहां की यह मिट्टी भी जिब्राइल मेरे पास _1 , लाए हैं और मुझे कहा कि यह उनके लेटने की जगह है । 

पेशगोई नंबर : 7 (सातवे बार मिट्टी का रंग)

 और रिवायत बयान की इमाम अहमद ने कि रसूलल्लाह सल्लल लाहू अलिहि व • सल्लम ने इर्शाद फरमाया कि तहकीक हमारे घर में एक फ़रिश्ता आया जो इससे पहले मेरे पास कभी नहीं आया था । तो 15 उसने मुझसे कहा कि आप यह बेटा हुसैन शहीद होगा और आप पसंद फ़रमाएं तो मैं आपको उनकी शहादतगाह की मिट्टी दिखा दूँ और फिर थोड़ी सी सुर्खा मिट्टी निकाली । 

 पेशगोई नंबर : 8 (आठवी बार मिट्टी का रंग)

 हज़रत मौहम्मद बिन उमर बिन हसन रिवायत बयान करते हैं कि हम इमाम हुसैन के साथ करबला की नहर पर थे । फिर देखा इमाम हुसैन ने शिमर की तरफ़ और फ़रमाया कि सच्चे हैं अल्लाह तआला और उसका रसूल । रसूलल्लाह सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम ने फ़रमाया कि हम देख रहे हैं कि एक अबलक ( डब्बा ) कुत्ता मेरी -अहले बैयत का खून पी रहा है और वह था शिमर लईन बर्सजुदा ( कोढ़ी ) 

पेशगोई नंबर : 9 (नावे बार मिट्टी का रंग)

हज़रत अली करमुल्लाहि वजहुल करीम से रिवायत है कि आप जब जंगे सफ्फ़ीन के मौका पर करबला से गुज़रे तो एक जगह हन्तल ( इन्द्रायन ) के बूटे थे । आपने पूछा कि इस जगह का क्या नाम है ? कहा : - करबला । तो आपने फ़रमाया करब J व बला । पस आप वहां उतरे और नमाज़ पढ़ी | फिर फरमाया कि यहां सहाब - कराम के अलावा वह लोग शहीद होंगे जो बगैर हिसाब के जन्नत में दाखिल होंगे । और आप ने एक जगह की तरफ़ इशारा किया जहां लोगों ने निशान लगा दिया year.gre चुनांचे जनाब हुसैन उसी मुकाम पर शहीद हुए।

 पेशगोई नंबर : 10 (दसवी बार मिट्टी का रंग)

 हज़रत असबग बिन बनाता से रिवायत है । कि हम हज़रत अली करमुल्लाहि वज्हुल करीम की माअय्यत में कुबरगाहे - हुसैन पर आए तो जनाब अली रज़ियल्लाहु अन्हू ने फ़रमाया कि यह शहीदों के ऊँट बिठाने की जगह है और इस जगह कजावे रखे जाएंगे और यह उनके खून के बहने मुकाम है । अहले बैयत मौहम्मद सल्लल का लाहू अलिहि व सल्लम के कितने ही -, जवान शहीद कर दिये जाएंगे और रोएंगे उनपर ज़मीन व आसमान । 

 पेशगोई नंबर : 11  (ग्यारह वी बार मिट्टी का रंग)

हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहू अन् फरमात है कि अल्लाह तबारक व तआला ने मौहम्मद रसूलल्लाह सल्लल  लाहू अलिहि व सल्लम पर वही नाज़िल  फरमाई कि हमने याहिया बिन जुकरिया के क़त्ल के औज़ सत्तर हज़ार लोगों को मारा और आपके बेटे के कत्ल के बदला में सत्तर हज़ार और सत्तर हज़ार यानि एक लाख चालीस हज़ार लोगों को मारेंगे । ( यह रिवायत जैनब बिन्ते हजश से भी मरवी है । 

 पेशगोई नंबर : 12 (बारह वी बार मिट्टी का रंग)

 उम्पुल मोमिनीन हज़रत उम्मे सलमा फरमाती है कि रसूलल्लाह सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम ने इर्शाद फरमाया कि मुझे जिब्राइल ने ख़बर दी है कि मेरी उम्मत के लोग इसे ( मेरे बेटै हुसैन को ) शहीद कर देंगे और उन लोगों पर अल्लाह तआला का शदीद कहर व गज़ब नाजिल होगा इसी कत्ल की वजह  से।

पेशगोई नंबर : 13 (तेरह वी बार मिट्टी का रंग)

 उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीका अपनी रिवायत में मजीद फ़रमाती है कि ग हुजूर फरमाया कि अल्लाह तआला 11. कातिल व मलऊन यजीद को बरकत न । दें । उसने मेरे प्यारे बेटे हुसैन  बगावत की और उन्हें शहीद हुसैन की तुरबत की मिट्टी मेरे पास लाई के साथ कराया । गई और मुझे उनका कातिल भी दिखाया गया और बताया गया कि जिनके रूबरू हुसैन कुत्ल किये जाएंगे , वह उनकी मदद नहीं करेंगे और इसी सबब से अल्लाह तआला ने उनपर एक अजाब मुसल्लत कर दिया है । इमाम आली मुकाम सय्यदना इमाम हुसैन रज़ियल्लाहू अन्हू की शहादत पाक चूँकि जहरी शहादत है । इसलिए इसके ऐलानात खुदा और की तरफ से से आपकी विलादते - मुबारिका के साथ ही शुरू हो गए । 
सरकारे- दो आलम रसूलल्लाह सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम की पेशगोइयों की सूरत में यह ऐलान इस क़द्र मशहूर और मतवातर है कि पहलों पर भी यह शहादत ए अज़मा इसी तरह जाहिर और रौशन थी कि जिस तरह बाद वालों में है । न सिर्फ यह कि इस शहादत ए ज़ाहिर से सिर्फ इंसान ही वाकिफ़ हैं बल्कि शहादत से पहले ही इसको मलाईका - कराम भी जानते थे । इन हालात में उन लोगों की अकलों पर मातम करने को जी चाहता है । जो कुदरत के इस बाकायदा प्राग्राम को इत्तिफ़ाकी हादसा और मामूली वाकिआ करार देते हैं ।
            मौहम्मद मुस्तफा ने था किया एलान मतवातिर
             शहादत . करबला में पाएगा इब्ने अली जाकर 
                   ख़ुदा ए पाक ने इसके थे खुद ऐलान
             शहादत के ख़बर लेकर फ़रिश्ते बार बार आए 

                मैदाने हथ और मुरक़्क़ए करबला

 क्यामत होगी जो महशर में करबला होगी 
बपा अदालत सुल्ताने किब्रिया होगी 
                 उधर जमाअत सुल्ताने अंबिया होगी
               इधर जमाअत अहबाबे अश्किया होगी 
ख़ुदा के हुक्म से लाएंगे जिबीले अमीन 
उठा के अशें मुअल्ला पे करबला की ज़मीन
               फुरात होगी वही होगा उसका जोश व खरोश
                       लबे फुरात पे शामी हज़ारों तेग बदोश 
दरे ख़ौय्याम पे कुछ बच्चे ज़ुअफ़ से खामोश
 पड़ा है झूले में शशमाह इक तरफ़ ख़ामोश
                  खड़ी है खेमा में इक बच्ची प्यास से बेचैन
                    चचा चचा की सदा है कभी हुसैन हुसैन
  पड़ा है दस्त बर दीदह कोई फुरात के पास
 अलम पड़ा है फरेरे पे लिखा है अब्बास 
                 न ज़ीस्त की है तमन्ना न ज़िन्दगी की आस
                  सूए ख़ौय्याम नज़र है कभी बहसरत व यास
  कमर को पकड़े हुए एक बुज़ुर्ग आता है
        उठा के दस्त बरीदा को बैठ जाता है 
              उठा के अपने अमामा से रुख को साफ किया
       फिर अपना रुख – रुखे गुलनार पे यह रख के कहा 
तुम्हारे बाद न अब लुत्फ़े जिन्दगी का रहा
   लो आज भाई को तुम भाई कह दो ऐ भैया
              सलाम को न उठा हाथ कह दिया भाई
        बस उसके बाद न बोले फिर ऐसी नींद आई
  बढ़े हुसैन उठाया पिसर को हाथों पर
 थी गोया छोटी हमाइल कुरआन के ऊपर
                किया पसन्द फिर ऐसा मक़ामे बाला तर 
                 जहां से सूरत बेशेर आए सब को नजर
   उठा के रुख से एबा फौज से ख़िताब किया 
    कि अज्र तुम ने ख़ुदा के नबी को ख़ूब दिया
          अजीब बात है कि तुम कलिमा जिसका पढ़ते हो
                रसूले हक़ की मुहब्बत का दम भी भरते हो
 उसी की आल पे ज़ुल्म व सितम भी करते हो
 न हक़ से डरते हो न हक़ के नबी से डरते हो
                      उसी रसूल का ऐ ज़ालिमो नवासा हूं
              मैं बेवतन भी हूं और तीन दिन का प्यासा हूं
 सूए नजर में तुम्हारे अगर मैं हूं खाकी 
यह जबां तो किसी दहन में नहीं आसी
 हैं ख़ुश्क होंठ दहन में जबान है प्यासी
          रही है चन्द ही लम्हों की जिन्दगी बाक़ी
 यह कह के बच्चा से फरमाया कि ख़िताब करो 
 इमाम जादे हो बेटा सवाले आब करो 
             यह सुनकर बच्चा ने मुंह से निकाली खुश्क ज़बां
                   लबों फेरा किया सोजिश दरों को अया
 हर एक संग से आने लगी सदाए फुगां 
जमीन लरज गई कांप उठी गर्दिशे दौरां
                  सियाह कल्ब कमीने का एक तीर चला 
        ज़बान थी होंठों पे बच्चा का छेद गया था गला 
हुसैन बच्चा को फिर लेकर चन्द गाम चले
 प्यासा लाए थे फिर लपके तिश्ना काम चले 
                लहू से तर गुले रुख , लेके लाला फाम चले
               संभल न सकते थे लेकर ख़ुदा का नाम चले
 कहा उठा के यह बच्चे को दोनों हाथों पर 
मैं खुश हूं बाज़ आ जा तुझे क़बूल हो कर 
          ज़मीन में दफन किया रुख सिवाए ख़ैय्याम किया 
                      रुबाब ने रुखे गुलगुलों को गौर से देखा
 समझ गईं मगर अपनी ज़ुबां से कुछ न कहा 
जिगर के दाद को मां के हुसैन ने समझा
                          कहा अकेले में असगर हमें बुलाते हैं 
                 रुबाब तो ख़ुदा हाफ़िज़ कि हम भी जाते हैं
 हुजूमे यास था खेमे का पर्दा उठता था
 कोई लिपटता था क़दमों से कोई सर को मलता था
                   कोई चला यह मेरा भाई बीन करता था
                     कोई पड़ा हुआ बीमार आहें भरता था
 केर कोई लिपट के यह क़दमों से कर रही थी फुगां
            न जाने दूंगी मैं मक्तल में तुम को बाबा जां
 हुसैन खेमे से निकले तो फिर क्याम किया
 नबी की आल के पर्दे का इंतिजाम किया
          न निकले कोई यह खेमा से फिर कलाम किया
              उठा के पर्दे को फिर आखिरी सलाम किया
 फरस को जाबिने असहाब बावफ़ा लाए 
पिसर से मिल के बरादर की लाश पर आए 
                          हुसैन कहते थे मेरे बहादुरो उठो
                       हुसैन जाता है लड़ने दिलावरो उठो 
सफर करीब है मेरा मुसाफिरो उठो
 हुसैन हो गया बेयारो बेदियार उठो 
                    ख़ुदा के नाम पे अब जान देने जाता हूं 
                  न उठो अच्छा न उठो कि मैं ही आता हूं
 ख़्याल आया कि लड़ना नहीं है गो मन्जूर 
समझ न ले यह ज़माना हुसैन है मज्बू र 
                         अली के शेर ने दिखलाए जौहरे मस्तूर 
            पहाड़ जल उठे चमका जो इक शोअल - ए - तूर 
अजीब रंग है मुक़फ़्फ़ल है ज़ुलफ़िकारे अली
 नज़र यह कहती थी ख़बर में लड़ रहे हैं अली 
                         हुसैन ने वह शुजाअत के रंग दिखलाए
                          हजारों ल हुए भागे और टकराए 
ज़ुबां पे बुज़िंदले फरियादुल- अमां लाए 
ख़ुदा का वास्ता हर बार दे के चिल्लाए
                   उधर से आ गई खालिक की इरजई की सदा
                    इधर नियाम में साबिर ने तेग को रखा
 फरस को मोड़ के मक्तल में अश्क बार आए
 अदू के तीर सितम आए बेशुमार आए
                         चहार सिम्त से तेगें लिए सवार आए
                        प्यादे हाथों में पत्थर लिए हज़ार आए · 
खड़े थे नरग - ए - आदा में जख़म खाए हुए
 हुसैन ख़ून में सर ता कदम नहाए हुए
                       कि पुश्ते जीन पे इक बार डगमगाए हुसैन
                     ज़मीन पे आ गये सज्दे में सर झुकाए हुसैन
 न सज्दा से अभी सर को उठाने पाए हुसैन
 गले पे तेग़ थी और शश जेहत में आए हुसैन
                     बपा यह देख कर महशर में इक क्यामत थी
                    फलक ने भी जो न देखी वह यह शहादत थी
 हुआ यह हुक्मे ख़ुदा का यजीद को लाओ
 पिसरे ज़्याद को शिम्र व वलीद को लाओ
                      हर एक साबिक व लाहिक पलीद को लाओ
                          यजीद नजिस के हर इक मुरीद को लाओ
 उठा के डाल दो दोज़ख में उन कमीनों को
 सताया है मुझे और अर्श के मकीनों को 

नोट

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