फरिश्तों का बयान .png)
सवाल फ़रिश्ते किसे कहते हैं ?
जवाब - फ़रिश्ते लतीफ जिस्म रखते हैं , नूर से पैदा किये गऐ हैं उनको अल्लाह तआला ने यह कुदरत दी है कि जो शक्ल चाहें इख्तियार कर लें । ( तकमीलुल ईमान पेज 9 )
सवाल - फ़रिश्ते मर्द हैं या औरत ?
जवाब - न मर्द हैं न औरत । - ( तकमीलुल ईमान पेज 9 )
सवाल क्या फ़रिश्तों की पैदाइश आदमियों की तरह है ?
जवाब - नहीं बल्कि फ़रिश्ते लफ़्ज़े “ कुन " से पैदा किये गऐ हैं ।
( आलहिदायतुल मुबारकह पेज 4 )
सवाल - फ़रिश्तों की तादाद कितनी है ?
जवाब सही तादाद तो अल्लाह व रसूल जानें अलबत्ता हदीस शरीफ़ में है कि आसमान व ज़मीन में कोई एक बालिश्त जगह खाली नहीं जहाँ फ़रिश्तों ने सजदे में पेशानी न रखी हो ज़मीन से सिदरतुल मुन्तहा तक पचास हज़ार साल की राह है उसके आगे मुस्तवी उसकी दूरी ख़ुदा जाने , इससे आगे अर आज़म के सत्तर परदे हैं हर हिजाब ( परदे ) से दूसरे हिजाब तक पाँच सौ बरस का फासला है और उससे आगे अर्श इन तमाम वुस्अतों ( खाली मक़ाम ) में फ़रिश्ते भरे हैं ।
( मवाहिब लदुन्निया 2 पेज 26 , अलमलफूज 4 पेज 9 )
सवाल - सारी मखलूकात में किस की तादाद ज़्यादा है ?
जवाब - फ़रिश्तों की ताताद ज़्यादा है हदीस शरीफ़ में है कि अगर सारी मख़लूक़ात को दस हिस्सों में तक़सीम किया जाऐ तो नौ हिस्से फ़रिश्तों के हैं और एक हिस्सा सारी मख़लूकात का।
( तक़मीलुल ईमान पेज 9 , तफ़सीर जुमले 4 पेज 534 )
सवाल - क्या सब फ़रिश्ते एक ही बार में पैदा हो गये ? या उनकी पैदाइश का सिलसिला जारी है ?
जवाब - पैदाइश का सिलसिला जारी है । हदीस शरीफ़ में है कि अर्श की दाहनी तरफ़ नूर की एक नहर है , सातों आसमान और सातों ज़मीन और सातों समुन्द्रों के बराबर , इसमें हर सुबह हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम नहाते है । जिससे उनके नूर पर नूर और जमाल पर जमाल बढ़ता है , फिर पर झाड़ते हैं तो जो बूंद गिरती है तो अल्लाह तआला उस से उतने - उतने हज़ार फ़रिश्ते बनाता है । दूसरी हदीस में है कि चौथे आसमान में एक नहर है । जिसे नहरे हयात कहते हैं , हज़रत जिब्राईल हर रोज़ उसमें नहाकर पर झाड़ते हैं जिससे सत्तर हज़ार क़तरे झड़ते हैं और अल्लाह तआला हर कतरे से एक - एक फ़रिश्ता पैदा करता है ।
( मवाहिब लदुन्निया 2 पेज 26 , अलहिदायतुल मुबारका पेज 9 )
सवाल क्या इसके इलावह कोई ओर भी सूरत है जिससे फ़रिश्ते पैदा होते हैं ?
जवाब- हाँ एक फ़रिश्ता और है जिसका नाम रुह है यह फ़रिश्ता आसमान और ज़मीन और पहाड़ों से बड़ा है , क़यामत के दिन तमाम फ़रिश्ते एक सफ़ में खड़े होंगे और यह फ़रिश्ता तनहा एक सफ़ में खड़ा होगा तो इन सब के बराबर होगा । यह फ़रिश्ता चौथे आसमान में हर रोज़ बारह हज़ार तसबीहें पढ़ता है और हर तसबीह से एक फरिश्ता बनता है , दूसरी हदीस में है कि रुह एक फरिश्ता है जिसके सत्तर हज़ार सर हैं और हर सर में सत्तर हज़ार चहरे और हर चहरे में सत्तर हज़ार मुँह और हर मुँह में सत्तर हज़ार जुबानें और हर जुबान में सत्तर हज़ार लुग़त यह उन सब लुग़तों से अल्लाह की तसबीह करता है और हर तसबीह से अल्लाह तआला एक फरिश्ता पैदा करता है । इसी तरह हदीस में है कि हमारे आका सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया जो मुझ पर मेरे हक़ की ताज़ीम के लिये दुरुद भेजे अल्लाह तआला उस दुरुद से एक फ़रिश्ता पैदा करता है जिसका एक पर पूरब और एक पश्चिम में होता है अल्लाह तआला उससे फ़रमाता है दुरुद भेज मेरे बन्दे पर जैसे उसने मेरे नबी पर दुरुद भेजी । पस वह फ़रिश्ता क़यामत तक उस पर दुरुद भेजता रहेगा । इसी तरह नेक कलाम , अच्छा काम फ़रिश्ता बनकर आसमान की तरफ़ बुलन्द होता है ।
( ख़ाज़िन व मआलिम 4 पेज 148 , जिल्द 7 पेज 169 उम्दतुलकारी जिल्द 9 पेज 16 अलहिदायतुल मुबारकह पेज 6 ता 11 )
सवाल क्या सारे फ़रिश्तों का मरतबा बराबर है ?
जवाब- नहीं , बल्कि उनमें भी इन्सानों की तरह अवाम और ख्वास हैं और ख्वास फ़रिश्ते रुतबे में अवाम फ़रिश्तों से अफ़ज़ल हैं ।
( मवाहिब लदुन्निया 2 पेज 45 ता 46 )
सवाल - ख्वास फ़रिश्ते कौन - कौन हैं ?
जवाब- हज़रत जिब्राईल , हज़रत मीकाईल , हज़रत इसराफ़ील हज़रत इज़राईल , अर्श उठाने वाले , मुकर्रबीन , कर्रोबीन रुहानिय्यीन । ( मवाहिब लदुन्निया 2 पेज 45 )
सवाल क्या इन ख़ास फरिश्तों में भी कुछ को कुछ पर फ़ज़ीलत है ?
जवाब - हाँ यह चार फ़रिश्ते हज़रत जिब्राईल , हज़रत मीकाईल , हज़रत इसराफ़ील , हज़रत इज़राईल बाक़ी तमाम फ़रिश्तों से अफ़ज़ल हैं
( मवाहिब लदुन्निया 2 पेज 45 , तकमीलुल ईमान पेज 9 )
सवाल - इन चार फ़रिश्तों में कौन अफ़ज़ल हैं ?
जवाब - हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम ।
( मवाहिब लदुन्निया 2 पेज 45 )
सवाल - इन्सान फ़रिश्तों से अफ़ज़ल है या फ़रिश्ते इन्सान से अफ़ज़ल हैं ?
जवाब - जमहूर एहले सुन्नत के नज़दीक ख्वास इन्सान यानी नबी , रसूल ख्वास फ़रिश्तों से अफ़ज़ल हैं और आम इनसान यानी औलियाऐ किराम आम फ़रिश्तों से अफ़ज़ल हैं और ख़ास फ़रिश्ते आम इन्सानों से अफ़ज़ल हैं ।
( मवाहिब लदुन्निया 2 पेज 45 , तफ़सीर कबीर 4 पेज 84 )
सवाल - क्या फ़रिश्तों के पर होते हैं ?
जवाब - हाँ दो - दो तीन - तीन चार - चार और बाज़ फ़रिश्तों के तो इससे भी ज़्यादा होते हैं । जैसा कि हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम के बारे में है कि उनके छः सौ पर हैं । ( तकमीलुलईमान पेज 9 )
सवाल क्या फ़रिश्तों को लौहे महफूज़ का इल्म होता है ? -
जवाब - हाँ ख्वास फ़रिश्ते लौहे महफूज़ पर मुत्तलअ हैं और आम फ़रिश्ते अपने ख्वास के ज़रीऐ लौहे महफूज़ की कुछ बातों पर मुत्तल होते हैं । ( तफ़सीर अज़ीज़ी सूरऐ बकर पेज 307 )
सवाल - क्या फ़रिश्ते अंबियाऐ किराम से ज़्यादा इल्म रखते हैं ?
जवाब नहीं अंबियाए किराम उनसे ज़्यादा इल्म रखते हैं , इल्म ही ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को फ़रिश्तों से सजदा कराने का शर्फ बख़्शा ।
( ख़ाज़िन 1 पेज 40-277 )
सवाल - अल्लाह तआला ने फरिश्तों को किस क़दर ताकृत व कुव्वत अता फरमाई है ?
जवाब - इसकी पूरी हक़ीक़त तो ख़ुदा जाने अलबत्ता एक रिवायत में है कि एक फ़रिश्ता दुनिया वालों को हलाक करने के लिये काफी है । ( शरह शिफा 1 पेज 735 )
सवाल - क्या फ़रिश्ते भी हुजूर सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम की उम्मत हैं ?
जवाब - हाँ उम्मत हैं आप उनकी तरफ़ भी रसूल बनाकर भेजे गऐ ।
( ज़रक़ानी 1 पेज 165 ) सावी 4 पेज 68)
सवाल - फ़रिश्तों ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को किस दिन सज्दा किया ?
जवाब - जुमे के दिन ज़वाल से लेकर असर तक ।
( मवाहिबलदुन्निया 1 पेज 10 )
सवाल - सबसे पहले किस फ़रिश्ते ने सज्दा किया ?
जवाब हज़रत जिब्राईल ने फिर मीकाईल फिर इसराफ़ील फिर इज़राईल फिर मलाएका मुकर्रबीन ने ।
( मवाहिबलदुन्निया जिल्द 1 पेज 1 न 10 )
सवाल - क्या फ़रिश्तों के पीर होते हैं जिस तरह इन्सान और जिन्नात के लिये पीरो मुरशिद होते हैं ?
जवाब- हाँ हुजूर गौसे आज़म फरमाते हैं कि मैं आदमियों और जिन्नों और फ़रिश्तों सब का पीर हूँ ।
( बहजतुल असरार पेज 23 , फुतावा रिज़विया 9 पेज 141 )
सवाल- क्या फ़रिश्तों को देखना मुमकिन है ?
जवाब - हाँ देखना मुमकिन है ।
( फतावा हदीसिया पेज 145 )
सवाल - क्या किसी ने देखा भी है ?
जवाब - हाँ अंबिया ए किराम , सहाबए इज़ाम और औलियाए किराम अपनी बेदारी में फरिश्तों को देखते हैं । लेकिन उनकी असली सूरत में नहीं ।
( ज़रकानी 1 पेज 425 , तफ़सीर अज़ीज़ी सूरऐ बक़र पेज 143 )
सवाल- हज़रत जिब्राईल , हज़रत मीकाईल , हज़रत इसराफ़ील , हज़रत इज़राईल का अस्ल नाम क्या है और कुन्नियत क्या है ?
जवाब- हज़रत जिब्राईल का अस्ल नाम अब्दुल्लाह है लेकिन इमाम सुहैली फ़रमाते हैं कि जिब्राईल सुरयानी जुबान का लफ़्ज़ है जिसके माना अब्दुर्रहमान या अब्दुल अज़ीज़ के हैं । एक कौल यह है कि अस्ल नाम अब्दुल जलील और कुन्नियत अबुलफ़तह है । हज़रत मीकाईल का अस्ल नाम अब्दुर्रज़्ज़ाक और कुन्नियत अबुल ग़नाइम है । हज़रत इस्राफील का अस्ल नाम अब्दुल खालिक और कुन्नियत अबुलमनाफ़िख हैं और हज़रत इज़राईल का अस्ल नाम अब्दुल जब्बार और कुन्नियत अबु यहया है ।
( उम्दतुलकारी 1 पेज 45 , 84 )
सवाल -क्या हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम को उनकी असली सूरत पर देखना मुमकिन है ?
जवाब - हाँ देखना मुमकिन है लेकिन सिर्फ हुजूर सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम ने दो मरतबा देखा एक बार ग़ारे हिरा में , दूसरी बार सिदरतुल मुन्तहा पर ।
( सावी 2 पेज 5 , ज़रक़ानी 1 पेज 57 )
सवाल-क्या नबी सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम के सिवा किसी ने न देखा ?
जवाब - हाँ हुजूर सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम के सिवा किसी नबी ने उनको असली सूरत में नहीं देखा ।
( सावी 4 पेज 115 , सीरत हलबी 2 पेज 294 )
सवाल- हजुरत जिफाईल अलैहिस्सलाम किन बातों पर मामूर है ?
जवाब- हवा चलाने , तस्करों को फतह व शिकस्त देने आजब नाजित करने , काफ़िर और सरकरा बादशाहों को हलाक करने , अल्लाह की बारगाह में हाजतें पेश करने , अम्बियाए किराम की बारगाहों में हाज़िर होने वही और अल्लाह के हुक्मों के पहुँचाने पर मानूर है ।
( दाङ्सीर अजीजी सूरसे मकुर पेज 103 )
सवाल – हजुरजजिब्राईल अलैहिस्सलाम को अस्लो सूरत क्या है ?
जवाब - अस्ली सूरत यह है कि नूरी जिस्म है , उनके जिस्म में छ : सौ पर हैं और हर पर इस कदर फैला हुआ है कि उससे आसमान का किनारा छुप जारे , और उन सब परों पर ज़बुर जद व यकृत व मोती जड़े हुऐ हैं । एक मर्तबा हुजूर सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम ने उनको देखा कि सर आसमान में है और पाँव ज़मीन में और मारेरक व मगरिब का फ़ासिला उस से पुर हो गया है ।
( तासीर आजीची कुएं पर 308 ) खाजिन व मआलिम जिल्द 7 पेज 179 )
सवाल- अल्लाह तआला ने हज़रत जिब्राईल को किस कुदर ताकृत दी है ?
जवाब – अल्लाह तआला ने उन्हें इतनी ताकृत व कुव्वत अता फ़रमाई है कि आसमान से ज़मीन तक बावजूद इस कुदर फासले के पलक मारने की देर में उतर भी आते हैं और चढ़ भी जाते है।
( खाजिन बमआलिम 7 पेज 179 )
सवाल- हज़रत जिब्राईल अमीन किस नबी की बारगाह में कितनी बार हाज़िर हुऐ ?
जवाब- हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की बारगाह में बारह मर्तबा , हजरत इदरीस अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में चार बार हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की खिदमत में पचास मर्तबा , हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में बयालीस मर्तबा , हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में चार बार , हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में तीन मर्तबा हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में चार सौ मर्तबा , हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में दस बार और हमारे नबी अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में चौबीस हज़ार सल्लल्लाहु मर्तबा हाज़िर हुऐ ।
( मवाहिब लदुन्निया 1 पेज 234 , ज़रक़ानी 1 पेज 234 )
सवाल-क्या अब भी हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम ज़मीन सवाल - के ऊपर आते हैं ?
जवाब : हाँ हदीस शरीफ में है कि हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम उस बन्दऐ मौमिन की मौत के वक़्त हाज़िर होते हैं जिसकी मौत पाकी पर हो । -
( फतावा हदीसिया पेज 129 )
सवाल-हज़रत इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम किन बातों पर सवाल मामूर हैं ?
जवाब - सूर फूकनें , इन्सानों और जानवरों में रुह फूकने और लौहे महफूज़ पर मामूर ( मुकर्रर ) हैं । और हज़रत जिब्राईल व मीकाईल और इज़राईल अलैहिमुस्सलाम को अल्लाह के हुक्म भी पहुँचाते हैं । कुछ रिवायतों में है कि रात की बारह घड़ियों में बारह अज़ाने कहते हैं । हर घड़ी की अज़ान अलग है , उनकी अज़ानों को इन्सान और जिन्नों के इलावा सातों आसमानों और सातों ज़मीनों के तामाम फ़रिश्ते सुनते हैं ।
( तफ़सीर अज़ीज़ी सूरऐ वक़र पेज 310 पारा 30 पेज 26 )
सवाल- क्या हज़रत इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम लौहे महफूज़ की बातों को भी जानते हैं ?
जवाब – हाँ हज़रत इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम को लौहे महफूज़
की पोशीदा बातों पर भी इत्तेलाअ है । वह साहिबे लौह कहलाते हैं । उनके मुतअल्लिक यह फ़ज़ीलत आई है कि जब ज़मीन और आसमान में किसी चीज़ के मुतअल्लिक अल्लाह का इरादा होता है , तो लौहे महफूज़ खुद बुलन्द होकर उनके सामने हो जाती है यह उस वक्त उसमें नज़र करते हैं और उस मुकद्दर ( लिखी हुई ) बात में गौर करते हैं अगर वह आमाल की जिन्स ( किस्म ) से होती है तो हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम को उसका हुक्म फ़रमाते हैं और अगर वह हज़रत मीकाईल अलैहिस्सलाम के कामों से तअल्लुक रखती है तो उसपर हज़रत मीकाईल अलैहिस्सलाम को मामुर कर देते हैं और अगर हज़रत इज़राईल अलैहिस्सलाम की ख़िदमत से तअल्लुक रखती है तो हज़रत इज़राईल अलैहिस्सलाम को उसपर बाख़बर कर देते हैं । ( तफ़सीर अज़ीज़ी सूरए बक़र पेज 307 )
सवाल - हज़रत इस्राफील अलैहिस्सलाम की लम्बाई चौड़ाई कितनी है ?
जवाब – उसकी हक़ीक़त तो खुदा जाने , अल्बत्ता बाज़ रिवायतों से इस क़दर साबित होता है कि उनका एक पर पूरब के किनारे में और एक पश्चिम के किनारे में और अर्शे आज़म उनके काँधे पर है लेकिन कभी अल्लाह की अज़मत की तजल्ली से इतने सिमट जाते हैं कि छोटी चिड़या की मानिन्द हो जाते हैं ।
( तफ़सीर अज़ीज़ी सूरऐ वर्कर पेज 309 )
सवाल - क्या हज़रत इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम भी किसी नबी की ख़िदमत में हाज़िर हुऐ ?
जवाब - नबी - ए - करीम सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम के इलावा किसी नवी की ख़िदमत में हाज़िर नहीं हुऐ और न होंगे ।
( मवाहिव लदुन्निया 1 पेज 405 )
सवाल – हज़रत इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम किस जगह से सूर फूकेंगे ?
जवाब - बैतुल मुक़द्दस की एक चट्टान पर खड़े होकर सूर फूकेंगे।
( सावी 3 पेज 54 )
सवाल - हज़रत मीकाईल अलैहिस्सलाम किन बातों पर मुक़र्रर हैं ?
जवाब – बारिश बरसाने , ज़मीन से हरयाली उगाने , हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम की मदद करने और मख़लूक का रिज़्क ( रोज़ी ) मुअय्यन करने पर मामूर हैं ।
( तफ़सीर अज़ीज़ी सूरऐ बकर पेज 308 ) तकमीलुल ईमान पेज 9)
सवाल - हज़रत मीकाईल अलैहिस्सलाम के फ़ज़ाइल क्या हैं ?
जवाब - हदीस शरीफ़ में है कि बैते मामूर जो ख़ान - ए - काबा के ऊपर सातवें आसमान में फ़रिश्तों का क़िबला है आसमान के फ़रिश्ते उसमें जमा होकर जमाअत का इन्तेज़ार करते हैं । हज़रत मीकाईल अलैहिस्सलाम इमाम बनते हैं और सब फ़रिश्तों को नमाज़ पढ़ाते हैं । ( तफ़सीर अज़ीज़ी सूरऐ बक़र पेज 310 )
सवाल - हज़रत इज़राईलअलैहिस्सलाम किन बातों पर मुकर्रर हैं ?
जवाब - रुहों को खीचने और बीमारियों और आफ़तों पर मुक़र्रर हैं । ( तफ़सीर अज़ीज़ी पारा 30 पेज 26 , तकमीलुल ईमान पेज 10 )
सवाल क्या हज़रत इज़राईल अलैहिस्सलाम तन्हा रूहों को कब्ज़ करते यानी खींचते हैं ?
जवाब - कुछ की रुह तनहा खींचते हैं , लेकिन ज़्यादातर अपने मातहत फ़रिश्तों के साथ मिलकर रूह क़ब्ज़ करते हैं । उनके मातहत बहुत से फ़रिश्ते हैं यह उनके सरदार हैं । ( शरहुस्सुदूर पेज 23 )
सवाल- हज़रत इज़राईल अलैहिस्साम एक ही आन और घड़ी में कितनी रूहें क़ब्ज़ फ़रमा सकते हैं ?
जवाब एक लाख रुहें क़ब्ज़ कर लेते हैं , हज़रत मलकुल मौत की ताकृत व कुदरत तमाम पूरब वालों और पश्चिम वालों और तमाम दरयाओं और हवाओं के रहने वालों पर ऐसी है जैसे किसी शख़्स के सामने दस्तर ख़्वान हो अब वह जो चाहे उठाले । ख्वाह मरने वाला पूरब में हो या पश्चिम में हो । ओर इतनी रुहें क़ब्ज़ करने के बावजूद अल्लाह की इबादत में भी मश्गूल रहते हैं ।
( शरहुस्सुदूर पेज 19 , मवाहिब लदुन्निया 2 पेज 389 )
सवाल - क्या हज़रत मलकुल मौत रुह क़ब्ज़ करने के बाद खुद लेकर जाते हैं या दूसरे फ़रिश्तों के हवाले कर देते हैं ?
जवाब - मोमिन की रुह रहमत के फ़रिश्ते ओर काफ़िर की रुह अज़ाब के फ़रिश्ते के हवाले कर देते हैं ।
( सावी 2 पेज 19 )
सवाल – हज़रत मलकुल मौत के साथ कितने फ़रिश्ते होते हैं ?
जवाब – चौदह फ़रिश्ते होते है , सात रहमत के और सात अज़ाब के और कुछ के नज़दीक पाँच सौ होते हैं ।
( सावी 2 पेज 19 ) ( शरहुस्सुदूर पेज 23 )
सवाल-क्या हज़रत मलकुल मौत सिर्फ इन्सानों की रुह कब्ज़ करते हैं या हर जानदार की ?
जवाब - हक़ीकृत तो खुदा को मालूम अलबत्ता हदीस शरीफ़ में है कि जानवरों और कीड़ों मकोड़ों की रुहें तसबीह में हैं । जब उनकी तसबीह ख़त्म हो जाती है तो उनपर मौत तारी हो जाती है । उनकी मौत मलकुल मौत के क़ब्ज़े में नहीं । यानी अल्लाह तआला उन जानवरों की ज़िन्दगी बिला वास्ता मलकुल मौत ख़त्म कर देता है । बाज़ रिवायत में है कि मलकुल मौत सिर्फ इन्सानों की रुह क़ब्ज़ करते हैं । बाकी एक फ़रिश्ता जिन्नात की और एक फ़रिश्ता शैतानों की और एक फ़रिश्ता चरिन्दों , परिन्दों दरिन्दों , मछलियों , कीड़ों मकोड़ों की रुह क़ब्ज़ करने पर मुकर है । बाज़ रिवायत में है कि मलकुल मौत हर जानदार यानी इन्सान और जिन और तमाम जानवरों की रुहें कब्ज़ करते हैं ।
( शरहुस्सुदूर पेज 21 , फ़्तावा हदीसिया पेज 20 , जस्कानी 1 पेज 50 )
सवाल - क्या यह रिवायत सही है कि पहले मलकुल मौत लोगों के पास खुल्लम खुल्ला आते थे लेकिन जबसे हजुरत मूसा अलैस्सिलाम ने आपकी आँख फोड़ दी तब से पोशीदा तौर पर आने लगे ?
जवाब - हाँ यह दुरुस्त है ।
( शरहुस्सुदूर पेज 20 , अलइत्तेहाफ़ पेज 117 )
सवाल - हज़रत इज़राईल अलैहिस्सलाम को रुह कब्ज़ करने पर मुक़र्रर करने की क्या वजह है ?
जवाब - यह और फ़रिश्तों के ऐतेवार से ज़्यादा सख़्त हैं इसलिये - इन्हें रुह क़ब्ज़ करने पर मामूर किया गया ।
( खाजिन 1 पेज 39 )
सवाल - किरामन कातेबीन कौनसे फ़रिश्ते हैं ?
जवाब वह फ़रिश्ते हैं जो बनी आदम की बातों और काम और अच्छाई और बुराई लिखते हैं । बन्दा जब कोई नेकी करता है तो दाहनी तरफ़ का फ़रिश्ता फौरन दस गुना करके लिखता है और यह फ़रिश्ता बाईं तरफ के बुराई लिखने वाले फ़रिश्ते पर अमीन भी है । और जब कोई बुराई करता है तो दाहनी तरफ वाला फ़रिश्ता बाई तरफ़ वाले से कहता है अभी न लिख शायद कि वह बन्दा तौवा कर ले और अगर तौबा नहीं करता है तो बाईं तरफ वाला फरिश्ता उसके नाम - ए - आमाल में एक गुनाह लिख देता है ।
( खाजिन 2 पेज 117 , खजिन 6 पंज 196 , जुरकानी 6 पेज 52 )
सवाल-हर आदमी के साथ कितने फ़रिश्ते होते हैं ?
जवाब- चार फ़रिश्ते होते हैं , दो फ़रिश्ते दिन और दो फ़रिश्ते -
रात में रहते हैं और रात दिन के आमाल के दफ्तर भी अलग - अलग होते हैं ।
( तफसीर अजीजी पारा 30 पैज 88 )
सवाल-क्या यह फ़रिश्ते हर वक़्त आदमी के साथ रहते हैं ? या किसी वक़्त अलग भी हो जाते हैं ?
जवाब सही क़ौल यह है कि पेशाब , व पाखाना , और हमबिस्तरी यानी औरत से मिलते वक्त दूर हो जाते हैं ।
( रदुल महतार 1 पेज 370 , खाजिन वमअलिम 7 पेज 195 )
सवाल - क्या किरामन कार्तवीन हमारे साथ महरवानी करते हैं ?
जवाब- हाँ उनकी महरवानी और उनका करम यह है कि इन्सान के तमाम बुरे कामों और पोशीदा बातों पर आगाह और वाकिफ़ होते हैं लेकिन किसी के सामने जाहिर नहीं करते और न किसी को रुसवा करते हैं । इसी तरह अगर कोई एक नेकी करता है तो इसका सवाब दस गुना लिखते हैं और अगर कोई नेकी का इरादा करता है मगर किसी रुकावट की वजह से न कर सका तो उसके नामऐ आमाल में एक नेकी का सवाब लिख देते हैं और अगर कोई गुनाह का इरादा करता है लेकिन ख़ौफे खुदा से न किया तो उसको भी नेकी के हिसाब में शुमार करके एक नेकी का सवाब उसके हिसाब में लिखते हैं । इसी तरह अगर किसी से कोई गुनाह हो जाता है तो छः घण्टे तक मुहलत देते हैं , नामऐ आमाल में कुछ नहीं लिखते शायद कि वह बन्दा नदिम शर्मिन्दा होकर तौबा कर ले , या कोई ऐसा नेक काम कर लें जो उस गुनाह को मिटा दे । अगर इतनी देर तक भी बन्दा तौका नहीं करता और न ही कोई नेक काम करता है तो उसके नाम आमाल में एक गुनाह लिख देते हैं फिर जब कभी वह तौबा व इस्तिगुफ़ार करता है या कोई अच्छा काम बाजालाता है तो उस लिखे हुऐ गुनाह को मिटा देते हैं ।
( तफ़सीर अज़ीज़ी पारा 30 पेज 88 )
सवाल – इन्सान के मरने के बाद फिर वह किरामन कातिबीन कहाँ जाते हैं ?
जवाब - जब इन्सान मर जाता है तो किरामन कातेबीन अल्लाह की बारगाह में अर्ज़ करते हैं ऐ रब अब हमारा काम ख़त्म हो गया , तेरा बन्दा अमल करने की दुनिया से निकल गया , इजाज़त दे कि हम आसमान पर आऐं और तेरी इबादत करें । रब तआला फ़रमाता है कि मेरा आसमान मेरी इबादत करने वालों से भरा है तुम्हारी कुछ ज़रुरत नहीं फिर अर्ज़ करते हैं इलाही हमें ज़मीन में जगह दे , इरशाद होता है मेरी ज़मीन इबादत करने वालों से भरी हे तुम्हारी कुछ ज़रुरत नहीं , अर्ज करते हैं ऐ अल्लाह अब हम क्या करें । इरशाद होता है मेरे बन्दे की क़ब्र पर खड़े होकर क़यामत तक तसबीह व तहलील और तकबीर पढ़ो और उसका सवाब मेरे बन्दे के लिये लिखते रहो । और काफिर के फ़रिश्ते को हुक्म होता है कि उसकी क़ब्र पर वापस जाओ और क़यामत तक उस पर लानत करो ।
( रद्दुल मोहतार जिल्द 1 पेज 370 , शरहुस्सुदूर पेज 370 , अलहिदाया अलमुबारका पेज 17)
सवाल- हफ़ज़ह कौन से फ़रिश्ते हैं ?
जवाब - वह फ़रिश्ते हैं जो इन्सानों की जिसमानी बलाओं आफ़तों की हिफाज़त करते हैं और उनके रिज़्क और कामों की हिफ़ाज़त करते हैं । यह फ़रिश्ते दिन के अलग और रात के अलग होते हैं इनका इज्तेमाञ् ( यानी इकटठा ) नमाज़े फज्र व अस्र में होता है रात के फ़रिश्ते नमाज़े फज्र तक अपना काम करते हैं और बाद नमाज़े फज्र चले जाते हैं और दिन के फरिश्ते उस वक़्त से नमाज़े असर तक हिफाज़त व देखभाल करते हैं । और असर की नमाज़ के बाद रवाना हो जाते हैं । फिर रात के फ़रिश्ते उस वक़्त से नमाज़े फज्र तक निगह बानी करते हैं । जब यह फ़रिश्ते ऊपर जाते हैं तो अल्लाह तआला बवजूद अपने इल्मे ज़ाती के उन फ़रिश्तों से पूछता है कि तुम ने मेरे बन्दों को किस हाल में छोड़ा हे , फ़रिश्ते जवाब देते हैं ऐ परवरदिगार हमने उनको नमाज़ पढ़ते हुऐ छोड़ा है और जब हम उसके पास गऐ थे उस वक़्त भी वह नमाज़ में मशगूल थे ।
( ख़ाज़िन व मआलिम 4 पेज 6 , सावी 2 पेज 19 )
सवाल - हर बन्दे के साथ कितने होते हैं ?
जवाब - इस बारे में बहुत से क़ोल हैं दो , चार , पाँच , दस , एक सौ साठ तीन सौ साठ । ( रदुल मुहतार 1 पेज 370 , ज़रकानी 6 पेज 82 )
सवाल – इतने फ़रिश्ते किन - किन चीज़ों की हिफ़ाज़त करते हैं ?
जवाब - दो फ़रिश्ते तो आमाल की हिफाज़त करते हैं , जो किरामन कातेबीन कहलाते हैं जिनका बयान गुज़र चुका बाकी एक फ़रिश्ता आँखों की हिफ़ाज़त के लिये मुक़र्रर है कि आँखों को तकलीफ़ की चीज़ों से बचाता है और एक फ़रिश्ता पेशानी की निगरानी करता है कि वह अगर खुदा का ज़िक करे तो उसको बुलन्द करे और सरकशी करे तो उसको झुकाऐ और एक फ़रिश्ता मुँह की हिफ़ाज़त करता है कि उसमें कोई तकलीफ़ देने वाला जानवर दाख़िल नहीं और एक फ़रिश्ता बन्दे के सोने - जागने में जिन और इन्सान और हैवानात से हिफाज़त करता है और जो चीज़ तकलीफ देने के लिये आती है तो यह फ़रिश्ता उससे कहता है पीछे हट , और दो फ़रिश्ते दोनों होंटों पर मुक़र्रर हें कि जब इन्सान दुरुद शरीफ पढ़ता है तो उसकी हिफाज़त करते हैं ।
( तफ़सीर इब्न जरीर 3 पेज 77 ता 79 ) जरकानी 6 पेज 82 खाजिन व मआलिम 4 पेज 6)
सवाल – ज़बानिया कौनसे फ़रिश्ते हैं ?
जवाब – वह फ़रिश्ते हैं जिनको अल्लाह तआला ने दोज़खियों पर अज़ाब देने के लिये मुक़र्रर किया है यह निहायत सख़्त और ताकतवर हैं इनमें ख़ुदा ने नरमी ओर रहम पैदा ही नहीं किया उनमें से एक फ़रिश्ता सत्तर हज़ार दो जखियों को एक दफा जहन्नम में झोंक देगा , उनकी उन्नीस है और इन सब के सरदार मालिक हैं जो दोज़ख़ के ख़ाज़िन ( दरोगा ) हैं फिर हर एक के मातहत इतने फ़रिश्ते हैं जिनका शुमार अल्लाह ही जानता है ।
( ख़ाज़िन व मआलिम 7 पेज 101 , दकाइकुल अख़बार पेज 36 )
सवाल – कर्रो - बीन कौनसे फ़रिश्ते हैं ?
जवाब – यह ख़ास फ़रिश्तों में से है , अर्रो बरी के ईर्द - गिर्द सफ़ बनाए हुऐ तसबीह व तकबीर में मशगूल हैं । अर्शे आज़म के इर्द - गिर्द फ़रिश्तों की सत्तर हज़ार सर्फे हैं कुछ सफ़ आगे ओर कुछ सफ़ पीछे यह आर्श का तवाफ़ करते हैं , एक सफ आती है तो दूसरी जाती है जब आपस में बाज़ से बाज़ मिलते हैं तो एक सफ़ वाले “ लाइला - ह - इल्लल्लाह " तो दूसरी वाले अल्लाहु अकबर कहते हैं ।
( ख़ाज़िन वमाआलिम 6 पेज 75 )
सवाल-क्या कर्रो बीन और अर्शे आज़म को उठाने वाले फ़रिश्ते सिर्फ ज़िके इलाही करते हैं ?
जवाब – नहीं , उनके मुतआल्लिक यह भी आया है कि यह मुसलमानों के लिये इस्तिगफार चाहते हैं ( बख्शिश ) और यह दुआ माँगते हैं कि ऐ हमारे रब तेरी रहमत व इल्म में हर चीज़ समाई है तू उन्हें बख़्शदे जिन्होंने तौबा की और तेरी राह पर चले और उन्हें दोज़ख़ के अज़ाब से बचा और जन्नत में दाख़िल कर जिसका तूने उनसे वादा फ़रमाया है ।
( कुरान सूरए मोमिन , ख़ाज़िन वमआलिम 6 पेज 75 )
नोट
प्यारी नाजरीन वेलकम टू माय हिंदी इस्लामिक नॉलेज वेबसाइट पर आपको किसी भी हदीस से रिलेटेड कोई मसला चाहिए हमें कमेंट करके जरूर बताएं इंशा अल्लाह आपको तक जरूर पहुंचेंगे और आप बताएं आपको अगर इस फरिश्तों के सवाल-जवाब कोई डाउट हो तो आप कमेंट करके जरूर बता सकते हैं इसका भी जवाब हम जरूर देंगे इंशाल्लाह
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