कुरआन और इमाम हुसैन की फजीलत पर बयान

कुरआन और इमाम हुसैन
की फजीलत पर
 बयान

                  

                        रम्ज़े कुराँ इज़ हुसैन आमू ख़ातीम 
                    ज़ आतिश ऊ , शोला हा अंदो ख़तीम 
                                                                   ( इक़बाल ) 
इमामुलंबिया रसूले सादिक व अमीन सल्लल लाहु अलिहि व सल्लम ने उम्मत को मुखातिब करके फ़रमाया : - हम तुम्हारे दरम्यान दो चीजें छोड़ रहे हैं , एक तो कुरआन है और दूसरी मेरी अहले बैयत । अगर तुम इन दोनों का दामन थाम रखोगे तो कभी गुमराह नहीं होगे । कुरआन और मेरी अहले बैयत हमेशा साथ रहेंगे और उनका रास्ता कभी अलग अलग नहीं होगा हत्ताकि यह दोनों हौज़े कौसर पर हमसे मुलाकात करेंगे । 
सरकारे दो आलम सल्लल लाहु अलिहि व सल्लम के इस फ़रमाने आलीशान में एक लतीफ नुक्ता की निशानदही होती है । एक ख़ासुल ख़ास राज से पर्दा उठता है । कयामत के दिन इमामुलंबिया सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम की पूरे मैदाने हश्र में जलवागिरी होगी ।

 मुकाम महमूद पर आप तशरीफ़ फ़रमा होंगे । जन्नत के दरवाजों को आप खोलेंगे । अर्शे इलाही के सामन . लग पुलसिरात पर आप अपनी उम्मत को गुज़ार रहे होंगे । उल हम्द " खुदा की तारीफ़ का परचम आपक हाथों में होगा । अंबिया अलिहिस्सलाम की क़यादत आप फ़रमा रहें होंगे । खुदा तआला के हुजूर में उम्मत की सिफारिश व शिफाअत आप फ़रमा रहें होंगे । लोगों के आमाल वज़न करने के लिए मीज़ान पर आप होंगे । उम्मत के दोज़िखियों को आप जहन्नुम से निकाल रहे होंगे । उम्मत का जहन्नुम में दाखिला रोकने के लिए मालिक फ़रिश्ता ए दोज़ख़ से महू गुफ्तगू आप होंगे । अला हिज़ल क़यास महशर को कोई मुकाम भी तो ऐसा नहीं होगा , जहाँ महबूबे खुदा से सल्लल लाहू अलिहि व सल्ल्म की लामतनाही कूव्वतों का ज़हूर होगा ।. 
तो फिर क्या वजह थी कि आपने अहले बैयत और कुरआन लिए फ़रमाया कि यह दोनों हौज़े कौसर पर हमसे मुलाकात करेंगे । इसमें कौन सी ख़ास हिकमत थी बावजूद पूरे मैदाने महशर कूव्वते मुस्तफ़ाई का जुहूर होने के आपने कुरआन व अहले बैयत से मुलाकात के लिए हौज़ को मख़्तूस फ़रमाया । 
      इसमें राज् यह था कि रसूले गैबदान शहादते हुसैन की पेशगोइयां फरमा चुके थे । आप जानते थे कि करवला के तपते हुए सहरा में वानाने अहले वैयत के साथ मेरे हुसैन को प्यासा शहीद कर दिया जाएगा । शिद्दत की गरमी में तीन दिन की प्यास से अली अकबर के होंठ खुश्क हो चुके होंगे । नन्हें अली असगर का हलक सूखकर कांटा हो चुका होगा । औन व मौहम्मद की रूहें पानी के एक घूँट के लिए तरस रही होंगी । कासिम व अब्बास और फरजान्दाने अकील व जाफ़र व अली पानी की सख्त जरूरत होगी । 
खंजरे जफ़ा की धार के नीचे जुहर की नमाज़ तयमूम से अदा करने वाले हुसैन को असर की नमाज़ की अदायगी के लिए वजू करने के लिए पानी की जरूरत होगी । इन हालात में ज़रूरी था कि करबला के प्यासे शहीदों को इस्तिकबाल कौसर व सलसबील के जाम हाथ में लेकर किया जाता । यही वजह थी कि आपने इर्शाद फरमाया : 

अहले बैयत को सबसे पहले हौज़ कौसर पर आना था और कुरआन को अहले बैयत के साथ आना था । इस लिए रसूले - सादिक का फरमान है कि मेरी अहले बैयत और कुरआन हमेशा साथ रहेंगे और फिर इकट्ठे हो हौज कौसर पर मुलाकात करेंगे । 
    हुसैन कुरआन के साथ थे कुरआन हुसैन के साथ था , हुसैन और कुरआन का चोली दामन का साथ है । 
     करबला ए मुअल्ला में दो कुरआन दोश बदोश थे । एक कुरआन खामोश था एक कुरआन नातिक था । हुसैन भी कुरआन थे और कुरआन भी कुरआन । एक कुरआन ने इमामुलंबिया सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम पर नजूल फुरमाया और एक कुरआन दोशें रसूल का राकिव  बना 
                    ईमाँ हुसैन मरकजे ईमाँ हुसैन हैं 
                दोशे नबी की रिहल का कुरआँ हुसैन हैं । 

हुसैन को अज़मत का ऐलान कुरआन ने किया और कुरआन की अज़मत का अलम हुसैन ने बुलंद किया । 
       हुसैन का एहतराम कुरआन ने बताया और कुरआन का एहतराम करके हुसैन ने दिखाया ।
         नामूसे हुसैन की गवाही कुरआन ने दी और नामूसे कुरआन का तहफ्फुज़ हुसैन ने किया । 
       हुसैन से मौहब्बत व मोअद्द्त करने का एलान कुरआन ने किया और कुरआन से मौहब्बत करने का सलीका हुसैन ने सिखाया । 
       हुसैन की शान कुरआन ने बयान की और कुरआन की शान हुसैन ने बयान की । 
     हुसैन की अब्दी जिंदगी और सरमीद हयात की गवाही कुरआन ने दी और कुरआन की हिफ़ाज़त अल्लाह तआला के जिम्मा है ।             कुरआन ने इमामुलंबिया की ज़बान से ऐलान किया ऐ मेरे उम्मतियों  हम तुझसे अपनी तब्लीग का सिर्फ यह बदला माँगते हैं कि हमारी अहले बैयत से मौहब्बत व मोअद्द्त करो ।
      हुसैन ने तीरों तलवारों की बारिश में यह खुत्बा इर्शाद फ़रमाया कि जान जाती है तो जाए कुरआन के कुवानीन का एहतराम करो । कुरआन ने एलान किया कि हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु रसूले हाश्मी के नवासे ही नहीं बेटे भी हैं 
    ( हुसैन ने खुत्वा दिया , कुरआन किसी मख़्लूक का कलाम नहीं • यह खालिक का कलाम है । खुदा का कानून है और कानूने खुदावंदी को तब्दील करने की इजाजत नहीं दी जाएगी । 
        कुरआन ने कहा : -हुसैन जिंदा हैं । हुसैन अब्दी हयात के मालिक हैं । अल्लाह तआला के यहां रिज़्क दिये जाते हैं 
    और वह लोग जो अल्लाह की राह में शहीद किये गए उनको
हरगिज़ मुर्दा ख्याल न करना बल्किं वह जिंदा हैं और अपने परवरदिगार से रोज़ी पाते हैं । 
   हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने कुरआन के इस दावा को दलील बनाकर दिखाया । आपका सरे - मुबारक जस्दे - अतहर से अलैहिदा होकर भी कुरआन मुक़द्दस का साथ नहीं छोड़ सकता । इसलिए कि हुसैन के नाना का फरमान था कि हुसैन और कुरआन अलिहदा अलिहदा नहीं होंगे । हत्ताकि हौज़े कौसर पर इकट्ठे ही आकर हमसे मुलाकात करेंगे ।
     कुरआन ने हुसैन की तहारत व पाकीज़गी की गवाही इन अल्फाज़ में दी :
  ऐ नबी के घर वालों ! अल्लाह तो यही चाहता है कि तुम से हर आलूदगी को दूर रखे और तुमको खूब पाकीज़ा कर दे । 
      हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने ऐलान फ़रमाया : -कुरआन पाक तय्यब व ताहिर है । इसके पाक और मुक़द्दस मन्शूर को बदलने नहीं दूँगा । इसके तय्यब व ताहिर दस्तूर में यजीद पलीद के क़वानीन की आमीज़श नहीं होने दूंगा । 
      सरज़मीने करबला पर इमाम आली मुकाम मुख़्तलिफ़ खुत्बाते आलिया का माहासिल यही था कि कुरआन के ख़िलाफ़ कोई आईन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा । आईन होगा सिर्फ कुरआन का , दस्तूर होगा तो कुरआन का , हुकूमत होगी तो कुरआन की , क़ानून होगा तो कुरआन का ।
     फ़ातिमा के लाल पर तीरों , तलवारों और पत्थरों की बारिश हो रही थी । लेकिन हर कीमत पर कुरआन का तहफ्फुज़ करना चाहते थे ।  
        छाए थे बादल जुल्म व तशहुद के आल पर
             पत्थर बरस रहे थे मौहम्मद के लाल पर
 इमाम आली मुकाम पर यह जबर व तशद्दुद और जुल्म व सितम सिर्फ इसलिए ढहाया गया था कि आपने कुरआनी अहकाम को तोड़ने वाली हुकूमत को ख़िलाफ़ते इलाहिया तस्लीम करने से इंकार कर दिया था । 
       कुरआन हुसैन के सीने के साथ लगा हुआ लरज़ रहा था । लेकिन मुहाफ़िजे कुरआन इस्तिकलाल व इसितकामत की चट्टान बनकर युरआन की तरफ़ आने वाला हर तीर अपने जिस्मे नाज़नीन पर रोक रहा था और यह सदाकृते निशान खुत्वा इर्शाद फुरमा रहा था : - “ ऐ लोगों ! हुसैन ने तुम्हें दावते इलल हक देने का फ़रीजा अदा कर दिया । अब तुम्हारी मर्जी हैं इसे क़बूल करो या न क़बूल करो । "
       मैंने तुम्हें बता दिया है कि बातिल क्या है और हक क्या है और अच्छी तरह वजाहत कर दी है कि हक़ का दूसरा नाम मुकम्मिल तौर पर निज़ामे मुस्तफ़ा का निफ़ाज़ है और निज़ामे मुस्तफ़ा का दूसरा नाम आईने कुरआन है । 
     मुसलमान कहलाना है तो निज़ामे मुस्तफ़ा और आईने कुरआन से रदगिरानी न करो ।
                      हस्ती मुस्लिम ज़ आईन अस्त व बस
                          बातिने दीन बनी ईं अस्त व बस
     तोहमी दानी कि आईने तो चेस्त ? 
     जैरे गरदूँ , सिरे तम्कीन तो चेस्त 
                         आँ किताबे जिंदा कुरआने हकीम ,
                      हिकमते ऊला यजाल अस्त व कदीम
     नुस्खा । इसरार तकवीने हयात
     ब सब्त इज कव्वतिश गेरू सबात 
                                  हने ऊ रा रेब ने तब्दील ने
                             आया अश शरमिंदा तावील ने
      पुख़्ता तर सोदाए ख़ाम इज़ ज़ोरे ऊ 
        दरफ़तद बासिंग जाम अज़ ज़ोरे ऊ
                               नोए इंसाँ रा प्यामे आख़िारी 
                         हामिले रहमतुल लिल आलिमीन 
      रहजनाँ अज़ हिफ्ज़ ऊ रहबर शुरंद
         इज़ किताबे साहिबे दफ्तर शुदन्द
                            गरतूमी ख़्वाही मुसलमाँ ज़ैस्तीन 
                         नेस्त मुमकिन जुज़ बुकराँ ज़ैस्तीन
                                                          ( इक़बाल )
 हुसैन ने आईने कुरआन की हिफ़ाज़त करने का दावा इलल ऐलान किया था । कुरआन ने कहा हुसैन तुम्हें अब्दी हयात की बिशारत देने वालो खुदा तुम्हें आज़माना चाहता है । तेरा ईमान मांगता है , तेरे दावे की दलील तलब करता है ।
               हुसैन ने कहा मैं हाज़िर हूँ । कुरआन ने कहा भूख और प्यास बर्दाश्त करना पड़ेगी । हुसैन ने कहा हाज़िर हूँ । कुरआन ने कहा माल से हाथ धोना पड़ेंगे । हुसैन ने कहा हाज़िर हूँ । कुरआन ने कहा जान देना पड़ेगी । हुसैन ने कहा : - हाज़िर हूँ ।
 कुरआन ने कहा फल छोड़ने पड़ेंगे । हुसैन ने कहा : -हाज़िर हूँ ।
         और ज़रूर हम तुम्हें आज़माएंगे कुछ डर और भूख से , कुछ मालों और जानों और फलों की कमी से और बतूल के चाँद ने जब कोहे रज़ा और पैकरे - सबर व इस्तिकुलाल बनकर इम्तिहान दिया तो कुरआन पुकार उठा।
  और खुशखबरी दो उन सबर वालों को कि जब उन पर कोई मुसीबत आ जाए तो कहते हैं कि हम अल्लाह के हैं और हम को उसी की तरफ फेरना है । यह वह लोग हैं जिन पर अल्लाह के दरूद और रहमतें हैं और यही लोग राह पर हैं । 
            कुरआन ने कहाः - हुसैन ! तुम अमीन व सादिक रसूल के नवासे हो और खुदा की अमानतों के अमीन हो । खुदा तुम से अपनी अमानतें वापिस मांगता है । इन्नल लाहा यामुरूकुम अन तुअहुल अमानाति इला आहलिहा । बेशक तुम्हें अल्लाह हुक्म देता है कि जिनकी अमानतें हैं उन्हें वापिस कर दो । 
              हुसैन ने कहा : - मैं हाज़िर हूँ और फिर अमीने सादिक ने हर अमानत को बारगाहे खुदावंदी में इस तरह वापिस कर दिया कि जबीने अकदस पर बल न आया । पूरा ख़ानदान खुदा की राह में नज़र कर दिया । जो चलकर मैदान में नहीं जा सकता था उसे हाथों में उठाकर बारगाहे रब्बे जलील में पेश कर दिया । सदाए सरोश आई । हुसैन ! तुम अमीन सादिक हो तुम्हारी अमानत व दियानत का क़यामत तक डंका बजता रहेगा । और फिर अहले बैयत के एक एक फ़र्द को पूरे खुलूस व नियाज़मंदी के साथ बारगाहे इज़्दी में पेश करने वाले इमाम आली मुकाम जब अपनी जान की अमानत भी पेश कर देने के लिए मुक़तल को जाने लगे तो सय्यदा जैनब ने रोक लिया । आप मुक़द्दस हमशीरा की बात सुनने के लिए रूक गए । 
           यज़ीदियों की तरफ़ से आवाज़ आई :
 हुसैन ! अब मौत को सिर पर देख कर डर क्यों गए , मैदान में आओ । कुरआन ने कहा जा़ालिमों ! हुसैन को डरने का ताना मत दो । खुदा की राह में जान देने वालें को तमाम ख़ौफ़ व ख़तरात से बेनियाज़ कर दिया जाता है और इस पर मेरी गवाही है :
               ( शहीद ) शाद हैं उस पर जो अल्लाह तआला ने उन्हें अपने फ़ज़ल से किया और खुशियां मना रहे है । अपने फलों को जो अभी उनसे न मिले कि उनपर न कोई ख़ौफ़ है और न कुछ गम । कुरआन और हुसैन को अलिहदा किया ही नहीं जा सकता जा सकता । कुरआन का एक एक लफ़्ज़ , एक एक मायना और एक एक हुक्म हुसैन क बाल बाल में रच गया था । 
         शब्बीर दे लूँ लूँ विच सायम , कुरआन इन्ज रचिया हो यासी।           सिर नेज़े से चढ़िया हो या वी कुरआन दीकर तफ्सीर हो गया 
     
      कुरआन का नजूल हुसैन के नाना पर हुआ । कुरआन की तिलावत का हक हुसैन की माँ ने अदा किया और कुरआन के अहकाम को पूरे तौर पर मान लेने का हक शब्बीर ने अदा कर दिया । कुरआन का एक एक हुरूफ़ रूहे हुसैन में सरायत कर चुका था । क्यों न होता । हुसैन माँ की गोद में होते और हुसैन की माँ चक्की भी पीस रही होती और तिलावते कुरआन भी कर रही होती । चक्की से आटा निकालती तो कुरआन की तिलावत जारी होती । आटे के लिए पानी निकालती तो तिलावते कुरआन के साथ , आटे में पानी डालती तो तिलावते कुरआन के साथ , आटा गूँध रही होती तो तिलावते कुरआन जारी होती , रोटियां पका रही होती तो तिलावते कुरआन जारी होती । रोटी का एक एक लुक्मा तोड़कर बच्चों को खिला रही होती तो तिलावते कुरआन जारी होती । अब खुद ही अंदाज़ा लगा लो कि हुसैन के मुक़द्दस खून में कुरआन में किस तरह गर्दिश करता होगा । 
        अक्ल सवाल करती है । कुरआन अगर हुसैन के साथा था तो हुसैन के मुक़ाबला में आने वाले भी कुरआन पढ़ते थे । बल्कि उनमें बेश्तर लोग कुरआन के हाफ़िज़ थे । उनके सीनों में कुरआन महफूज़ था । फिर हुसैन के कुरआन में क्या खुसूसियत थी । कुरआन तो दानों फ़रीकों की तरफ था । फिर हुसैन के कुरआन को क्यों तरजीह दी जाती है । 
         हुसैन की तरफ से कुरआन ने जवाब दिया । कुरआन ने कहाः - हुसैन ! तेरी इस्मत की हिफाजत मेरे ज़िम्मा है । तेरी तरफ से मैं जवाब देता हूँ और फिर कुरआन ने खोल कर बता दिया कि मैं ज़ालिमों को कुछ फ़ायदा नहीं देता बल्कि उनका तो मैं खिसारा बढ़ाता हूँ । उनके ज़बान व नुक़सान को और ज्यादा करता हूँ । उनके घाटे में और इज़ाफ़ा करता हूँ मैं अगर शिफा और रहमत हूँ तो मोमिनों के लिए । 
     और हम कुरआन में जो हर चीज़ नाज़िल फरमाते हैं वह इमानदारों के लिए शिफ़ा और रहमत है और इससे जालिमों का नुकसान ही बढ़ता है । 
           कुरआन ने यहाँ मोमिनों के मुकाबला में कुफ़्फ़ार का ज़िक्र नहीं फ़रमाया , बल्कि ज़ालिमों का जिक्र किया है । कुफ़्फ़ार को कुरआन से क्या नुकसान होता वह तो सिरे से कुरआन को मानते ही नहीं । घाटा तो उन लोगों के लिए है जो कुरआन को मानते हैं मगर नहीं मानते । कुरआन पाक अल्लाह की किताब होने का इकरार करते हैं लेकिन उसके अहकाम को तस्लीम नहीं करते । इमाम आली मुकाम के मुकाबला में आने वाले बिला शक व रैब ज़ालिम थे । उनके मुज़ालिम को साबित करने के लिए किसी दलील की ज़रूरत नहीं । उनके जुल्म व सितम की तो दास्तानें बन चुकी हैं । उनके जुल्म को जुल्म की इंतिहा कहा जा सकता है । उन्होंने कुरआन पढ़कर कुरआनी अहकाम की ख़िलाफ़वर्ज़ी की थी । कुवानीने खुदावंदी को तोड़ने वाले ज़लील हाकिम का साथ दिया था , हक़ के साथ मुकाबला किया था और बातिल को नवाज़ा था ।
      वह कुरआन पढ़ते थे लेकिन कुरआन उनके हलक से नीचे नहीं उतरता था ।
            कुरआन उनके सीनों में था मगर उनका ख़िसारा बढ़ाता था । कुरआनौं अगर शिफ़ा था तो हुसैन के लिए , रहमत था तो हुसैन के लिए , इसलिए कि हुसैन सरापा ईमान थे । कुरआन ईमानदारों के लिए शिफ़ा और रहमत है । यज़ीद के हाफ़िज़ व कारी जालिम थे । कुरआन उनके लिए ख़िसारे का बाइस बना । उन्होंने कुरआनी आयात को रजाए यज़ीद के लिए इस्तेमाल किया था और हुसैन ने कुरआन को रज़ाए हक के लिए तिलावत फ़रमाया था । कुरआन का सीनों में आ जाना बाइसे निजात नहीं हो सकता । सीने में आए हुए कुरआन का अहंतराम बाइसे निजात है । इमामुलंबिया सल्लल लाहु अलिहि व सल्लम फ़रमाते हैं : -क़यामत के दिन कुछ लोग मैदाने हशर में उकडूं बैठे होंगे , ज़मीन आग उगल रही होगी । आफ़ताब आग बरसा रहा होगा और उनके दिमाग खोलते होंगे । खुदावंद तआला उन पर सवाल करेगा कि तुम कौन हो ? वह कहेंगे : -या अल्लाह हम कुरआन के हाफ़िज़ हैं । अल्लाह तआला का इर्शाद होगा : -आज के दिन के लिए क्या लाए हो ? वह कहेंगे : - या अल्लाह हमने तेरी रज़ा हासिल करने के लिए कुरआन हिफ्ज़ किया और खुश आवाज़ी से लोगों को पढ़कर सुनाया । अल्लाह रब्बुल इज्जत का इर्शाद होगा तुम गलत कहते हो । तुम झूठे और कज्जाब हो । खुदा की आवाज़ के साथ फ़रिश्तों की आवाजें आएंगी : -तुम झूठे हो ।
              फिर अल्लाह तआला फ़रमाएगा : - तुम लोगों की ख़्वाहिश थी कि लोग तुम्हारा हाफ़िज़े कुरआन समझकर एहतराम करें और जब तुम्हें हाफ़िज़े कुरआन कहा जाता तो तुम्हारा नफ्स हिज़ हासिल करता था , तुम्हारी ख़्वाहिश के मुताबिक दुनिया में तुम्हें इसका बदला दे दिया गया । अब वह अमल पेश करो आज के दिन के लिए लाए हो । 
        यज़ीद के लश्कर में कई हाफ़िज़े कुरआन थे । लेकिन कुरआन उनके सीनों में ऐसे था जैसे ज़बरदस्ती महबूस कर दिया गया हो । उन्होंने कुरआन को कैद कर रखा था । कैदी किस तरह खुश रह सकता है । कुरआन तो उनके लिए बदुआ करता था और यही उनके लिए ख़िसारा था । कुरआन तय्यब व ताहिर और पाक था और उनके सीनों में हसद व बुग़ज़ की गिलाज़त भी थी और कीनातोज़ी की निजासत भी । फिर कुरआन से वह क्या फायदा उठा सकते थे । अंबर व कस्तूरी को अगर गिलाज़त के ढेर पर रख दिया जाए तो क्या हासिल होगा । इत्र की  शीशी अगर गंदगी और निजासत पर उंडेल दी जाए तो उस का क्या फायदा होगा । कुरआन हिफ्ज़ करने का मक़सद तो यह है कि कुरआन का एहतराम किया जाए । 
           कुरआन के तक़द्दुस की हिफाजत की जाए , कुरआन के अहकाम को माना जाए और कुरआन की हदों को सिदक़ दिल से तस्लीम किया जाए ।
            कुरआन को ढांपने के लिए तय्यब व ताहिर और पाक व साफ़ गिलाफ़ की ज़रूरत है । कुरआन को गंदे और ग़लीज़ ग़िलाफ़ में रखना कुरआन की खुली तौहीन है । और वह कुरआन की तौहीन कर रहे थे । 
        उन्होंने कुरआन को गंदे और नजस ग़िलाफ़ों में बंद करने का जुर्म किया था । उनके सीने गिलाफ़ इंतिहाई गलीज़ हो चुके थे । उनमें हसद और बुग़ज़ की बदबू पैदा हो चुकी थी । कीने और अदावत की तहे जम चुकी थीं । बेवफ़ाई और बदओहदी की निजासत से आलूदा हो चुके थे । उन्होंने कुरआन नातिक से बदओहदी की थी । किताबुल्लाह से बेवफ़ाई की थी । वह कुरआन के महज़ नाम के हाफिज़ थे , मुहाफिज़ को बुग़ज़ व बेवफ़ाई की निजासत व नहीं थे । उन्होंने तहारते कुरआ गिलाज़त से आलूदा कर रखा था और कुरआन उनके नापाक और नजस सीनों से निकल जाने के लिए  तड़प रहा था । 
   कुरआन उन्हें घाटे और ख़िसारे की वईद सुना रहा था । उनके सीनों में कुरआनी लफ़्ज़ों के जिस्म थे उनमें कुरआन की रूह नहीं थी । और दूसरी तरफ़ इमाम बरहक इमाम हुसैन रज़ियल्लाहू अन्हु ने कुरआन को तय्यब व ताहिर और नूर - दबीज़ ग़िलाफ़ों में लपेट रखा था । कुरआन के एक एक हर्फ़ को खुशबू ए रसूल में बसा रखा था ।
         हुसैन की तहारत व पाकीज़गी की शहादत खुद कुरआन ने आयते ततहीर में दे रखी थी । फिर कुरआन को रहने के लिए इससे ज्यादा पाकीज़ा जगह कहाँ हासिल होती । यही वजह थी कि कुरआन हुसैन के साथ था । और हुसैन कुरआन के साथ था । कुरआन भी तय्यब व ताहिर और हुसैन भी तय्यब व ताहिर हैं । कुरआन भे नूर है और हुसैन भी नूर हैं । कुरआन भी मरकज़े हिदायत है और हुसैन भी मरकज़े हिदायत हैं । कुरआन भी रौशनी की मीनार है और हुसैन भी रौशनी का मीनार हैं । कुरआन और हुसैन इसलिए इकट्ठे रहेंगे कि दोनों का मन्शाअ व मक़सूद एक है । दोनों की आवाज़ एक है , पैग़ाम एक है , मक़सद एक  है , मन्शूर एक है , आईन और दस्तूर एक है , मंज़िल एक है , रास्ता एक है , फ़राईज़ एक हैं और इमामुलंबिया से मुलाकात का मुकाम एक है , वक्ते विसाल एक है ।
             यज़ीदी फ़ौज अगर कुरआन के अहकाम को तस्लीम कर लेती तो शहजादा ए रसूल और बतूल के चाँद पर कभी तेगे जफ़ा न उठाती । कुरआन ने तो फ़रमाया था कि अहले बैयते रसूल से मोअद्दत और मौहब्बत करो । लेकिन वह अहले बैयते रसूल पर तीरों और तलवारों की बारिश बरसा रहे थे फिर कुरआन उनके साथ कैसे रह सकता था । 
    कुरआन तो हुसैन के साथ था जो अपने दादा जनाब इस्माईल ज़बीहुल्लाह अलिहिस्सलाम के हक में नाज़िल होने वाली आयात व फ़दैयना बिज़िब्हिन अज़ीम की तफ्सीर पेश कर रहा था ।
           है हाथ मे किताब ए खुदाए करीम की
            तकमील हो रही है बिज़िब्हिन अज़ीम 

नोट 
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