मशकूर की शहादत ( हज़रत मुस्लिम के बच्चों की शहादत )

                    मशकूर की शहादत



उधर सुबह होते ही इब्ने ज़ियाद को ख़बर मिल जाती है कि हज़रत मुस्लिम के बच्चे जेल में नहीं हैं । इब्ने ज़ियाद ने दरोगा जेल मशकूर को हाज़िर होने का हुक्म दे दिया । थोड़ी देर के बाद मशकूर , इब्ने ज़ियाद से फ़िरऔनी दरबार में पहुँच जाते हैं ।

 इब्ने ज़ियादः -

 मुस्लिम बच्चों के मुताल्लिक मुझे इत्तिला मिली है । कि वह जेल में नहीं हैं । क्या यह दुरूस्त है ? 

मशकूरः -

 हाँ , यह इत्तिला दुरूस्त है । 

इब्ने ज़ियादः

क्या तुम ने उनका किसी और जगह ठहराया है । 

मशकूरः

नहीं ! बल्कि मैंने उन्हें ख़ुदा तआला की रज़ा हासिल करने के लिए रात ही को आज़ाद कर दिया था । 

इब्ने ज़ियादः

क्या तुम्हें मेरा डर नहीं था ?

 मशकूरः

जिसे अल्लाह का डर हो वह किसी दूसरे से नहीं डरता । इब्ने ज़ियाद तू भी खुदा से डर ! तूने मज़लूम बच्चों के बाप को बेगुनाह शहीद कर दिया है । अब दो बेगुनाह यतीम मजुलम और परदेसी शहज़ादों को कैद व जिंदान डालकर तुम कहरे इलाही को आवाज़ देना चाहते हो । मैंने सय्यदुल कौनेन इमामुलंबिया सल्लल लाहु अलिहि व सल्लम की खुशनूदी हासिल करने के लिए उनको रिहा कर दिया है । 

इब्ने ज़ियदः

मशकूर जानते हो तुम किस के साथ गुफ्तगू कर रहे हो ? क्या तुम्हें मालूम नहीं कि मैं इस अंदाज़ से गुफ़्तगू करने वालों की ज़बानें खींच लेता हूँ ।

 मशकूरः

जानता हूँ , लेकिन याद रख ! एक वक्त ऐसा भी आने वाला है कि तुम मौत को आवाज़ देते फिरोगे , लेकिन मौत तुम से दूर भागेगी । तुम जिस कुसरे इमारत में अपनी फ़िरऔनियत का मुजाहिरा कर रहे हो । यहीं तुम एड़ियां रगड़ रगड़ कर फ़ना हो जाओगे । मैं हैरान हूँ कि जिस रसूल की क़यामत के दिन शिफाअत की उम्मीद रखे हुए हो । उसके बेगुनाह बच्चों को इस बेदर्दी के साथ शहीद कर रहे हो नमरूद व शद्दाद की रूहें काँप जाती हैं ।

 इब्ने ज़ियादः

आग बगूला होकर । मशकूर ख़ामोश हो जाओ ।

वर्ना मैं तुम्हारी जुबान काट दूँगा । 

मशकरः

मुझे जवान के कट जाने का कुछ अफसोस नहीं होगा । एक बयान करते हुए अगर जुबान कटती है तो कट जाए । 

.   मशकर की हकगोई ने इब्ने ज़ियाद के तन बदन में आग लगा दी । जल्लाद को बुलाकर कहने लगा कि उसका सिर कलम कर दो ।               जल्लाद तलवार उठाकर चिल्लाने लगा । तो इब्ने नियाद ने कहा- ठहर जाओ । पहले इसके जिस्म पर पांच सौ दुई लगाओ और फिर इसका सिर कलम कर देना । 

.        रूहे इंसानियत तड़प उठी । वहशत व बरबरियत की इंतिहा हो गई । शैतान ने अपने मकरूह दांत निकाल कर खिला खिला उठा । दरिंदगी को सकून हासिल हो गया ।

         जल्लाद ने पहला चाबुक चलाया , मशकूर ने कहा- बिस्मिल्लाह हिर्रहमानिर्रहीम 

.   शाएं की आवाज़ से दूसरा चाबुक पड़ा । मशकूर ने कहा - या अल्लाह मुझे सबर अता फरमा ।

       तीसरा बार हुआ । मशकूर ने कहा - या अल्लाह मेरी दस्तगीरी फ़रमा । 

.     चौथा चाबुक आया । आवाज़ आई - मुझे फुरजंदाने रसूल की मौहब्बत अता कर ।

.  पांचवा चाबुक पड़ता है । मशकूर ने कहा - या अल्लाह मुझे अहले बैयते मुस्तफा के दामन में जगह देना । फिर चाबुक पर चाबुक पड़ता है लेकिन मशकूर ख़ामोश रहते हैं । इसी तरह पांच सौ दुर्रे पूरे हो जाते हैं । मशकूर ने कराहते हुए पानी तलब किया । इब्ने ज़ियाद ने कहा - इसे पानी मत देना ।

      पांच सौ दुर्रे लग जाने के बाद जिंदगी और मौत में क्या फासिला बाकी रह जाता है । लेकिन उमर बिन अलहारिस ने सिफारिश की कि अब इस कृत्ल न किया जाए और मुझे इजाज़त दी जाए कि मैं इसे अपने घर ले जाऊँ ।

     इब्ने ज़ियाद ने किसी मसलेहत की बिना पर उसकी बात मान ली । इब्ने हारिस मशकूर को अपने घर ले आया । पानी पेश किया । आप न कहा- यह पानी में नहीं पियूँगा । मेरे लिए हुसैन के नाना कौसर का जाम लिए खड़े हैं । यह कहते ही कल्मा शहादत की गवाही दी और राही मुल्के बक़ा हो गए ।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलिहि राजेऊन 

हज़ार हज़ार सलाम हों अहले बैयत के उस सच्चे खादिम और वफादार पर जिसने जान तो दे दी मगर इब्ने ज़ियाद जैसे जाबिर व ज़ालिम के सामने कल्मा ए हक कहने से बाज़ न रहा । यही हुसैनियत हैं और यही पैग़ामे हुसैन है कि दार व रसन की परवाह किये बगै़र कल्मा ए हक़ कहत रहो-

 दिल में हक़ व हुर्रियत का नूर होना चाहिए

 जज़्बा ए मशकूर का मशकूर होना चाहिए

                                    ( सायम चिश्ती )

 इधर मशकूर जिन मजुलूम यतीमों को बचाने के लिए जामे शहादत नोश फ़रमाए हैं वह चशमे के किनारे बैठे हुए छुपने की जगह तलाश करते फिरते हैं । ऊपर देखते हैं तो चशमे के किनारे वाले दरख्त के मोटे तने में काफी खिला है ।

 यह काफी सोबत था जो भी समझ में आया कर दिया । दोनों ही दरख़्त की खोह मे दुबक कर बैठ गए ।

                 हब्शिया कनीज़ का आना 

थोड़ा ही अरसा गुज़रा कि एक औरत हाथ में बर्तन लिए चशमे पर आई । जब उसने चश्मा से पानी लेना चाहा तो दरख़्त के साथ उसे शहज़ादों का अक्स भी नज़र आ गया । यों मालूम होता था जैस दो चांद बयक वक्त पानी की तह से तुलूअ हो रहे हों । वह नूर की तस्वीरें हैं जिनके गुलाब के फूलों जैसे चेहरे खून के आँसुओं में भीग कर गुले - लाला बन चुके हों । 

                   दो गुल इज् गुलशने दमदा 

                     दो सरो इज़ बागे खूबे कद कशीदा

 दो माह अज़ बुर्ज आबे रूख नमूदा 

ज् दीदा चश्मा ए बारां कशूदा 

                    यके तावदा मेहरे अ अजु दिलरूबाए 

                     यके चूँ ! आबे ख़िज़र इज़ जाने फ़ज़ाए

                                    ( काशिफ़ी )

 वह औरत एक हारिस नामी शख्स की कनीज़ थी । उसने ऊपर नज़र उठाई । मुस्लिम के दोनों यतीम सुराणा दर्द की तस्वीर बनकर उसकी जानिब ही देख रहे थे । कनीज़ ने शहजादों की हालत देखी जा तड़प गई । वह सोचने लगी कि इतने खूबसूरत बच्चे इस कदर आलाम व गुम की तस्वीर क्यों बने हुए हैं । इन पर क्या मुसीबत नाज़िल हुई है जो इस तरह चेहरे सुते हुए हैं । आँखें सूजी हुई हैं , बाल बिखरे हुए और इतनी हसरत भरी निगाहों से मेरी तरफ देख रहे हैं ।.

       दिल को संभाल कर अर्ज़ करती है - अच्छे बच्चों तुम कौन हो ? तुम्हें किसका डर है जो इस तरह छुपे बैठे हो । तुम्हारे बाप का क्या नाम है ? 

         जवाब आया - बीबी ! हम से यह न पूछो कि हम किस के बच्चे हैं । बाप का नाम बताते वक्त हमारे सीने फट जात हैं । बस यह समझ लो दो यतीम हैं ।

            ख़ुदा रा ऐ रफ़ीक़ अज मंजिले जानां मिदा या दम

           के मन दर वादी ए हिज्रां जि हाले खुद बफर मा दम 

        कनीज़ के दिल में अचानक ख़्याल आ गया कि यह बच्चे कूफियों के मालूम नहीं होते । यह यकीनन हज़रत मुस्लिम के साहिबजादे हैं ।

         फिर ठंडी आह भर कर बच्चों से मुखातिब होती है - अगर मेरा ख्याल गुलत नहीं तो आप हज़रत मुस्लिम के दिलबंद हैं । बड़े शहजादे ने तड़प कर कहा-

         बीबी तुम ठीक कहती हो । मगर अब हमें मुस्लिम के दिलबंद न कहो । हमें मुस्लिम के यतीम कहो । गुरीबुल वतन परदेसी कह कर पुकारो ।

                       हो तूर जिन का छुप गया , हम वह कलीम ह

                         दिलबंद किस के रह गए ! अब तो यतीम हैं 

        बीबी हमें अब याद के तोहफे न दीजिए

         हम बे वतन मुसाफिरों पे रहम कीजिए

                                              ( सायम चिश्ती

          कनीज़ दर्द भरी गुफ्तगू सुनकर तड़प ही तो गई । फिर अर्ज़ करती है - अच्छे शहजादों अल्लाह तुम्हें सबर दे । मुस्लिम के यतीमों , अल्लाह तुम पर रहम फ़रमाए । मैं एक बीबी की कनीज़ हूँ । मैं भी ख़ानदाने मुस्तफ़ा की गुलाम हूँ और मेरी मालिका को भी अहले बैयत रसूले से इश्क है । मैं अभी जाकर उसे तुम्हारे मुताल्लिक बताती हूँ । तुम किसी किस्म का फिक्र न करना । मैं अभी आती हूँ शहजादों । 

         कनीज़ चली गई तो बड़े शहजादे मौहम्मद ने छोटे शहजादे को मुखातिब करके फरमाया- भाई इब्राहीम , कहीं हम फिर किसी जाल में न फँस जाएं ।

इब्राहीम : - 

         भाईजान अब तो जो भी तकदीर दिखाएगी देखना पड़ेगा ।  

मौहम्मदः -

        मुझे तो इस हब्शी कनीज़ की बातों में सच्चाई मालूम होती है ।

 इब्राहीम : - 

     हाँ , भाईजान ! स्याहफाम हन्शिया के चेहरे पर अकीदत की सच्चाई का नूर साफ़ ज़ाहिर था ।

     मौहम्मदः - 

          खुदा करे कि उसके दिल में भी सच्चाई का नूर हो । इधर शहज़ादे इस तरह की सोच और फिक्र में महू हैं उधर उस कनीज़ ने जाकर अपनी मालिका को सब हालात से आगाह कर दियां मालिका ने जब हज़रत मुस्लिम के यतीम शहज़ादों का हाल सुना तो तड़प कर रह गई और फिर वालिहाना अंदाज़ में बाहर को दौड़ी , कनीज़ भी साथ थी । दरवाज़े के पास पहुँच कर रूक गई । कनीज़ भी रूक गई । मालिका ने अपने सिर का दोपट्टा उतारा और कनीज़ के सिर पे देकर कहने लगी आज से तुम मेरी लौंडी नहीं बल्कि मेरी बहन हो । तूने मुझे बहुत बड़ी खुशख़बरी सुनाई है । मैं इसके सिला में तुम्हें अपने माल के हिस्सा से आज़ाद करती हूँ ।

         और फिर नंगे सिर ही वालिहाना दौड़ती हुई चश्मे पर आ गई । शहज़ादे उसी तरह दरख्त की खोह में दुबके पड़े थे । यह आलम देखकर बीबी की चीख निकल गई । करीब पहुँच कर निहायत शफक्कत से बोली : -  

    गुलिस्ताने मौहम्मद के नौनिहालों ! नीचे तशरीफ ले आओ । डरो नहीं , प्यारे शहजादों ! मैं आपकी ख़ादिमा हूँ , मैं अहले बैयते मौहम्मद की गुलाम हूँ । मैं ख़ानदाने नबूवत की लौंडी हूँ , मेरे चाँद ! मुझे अपनी कनीज़ समझो । 

           दोनों भाई डरे डरे सहमे सहमे नीचे उतर आए । उतरना तो था ही ख्वाह कुछ भी सलूक होता । मगर वह बीबी तो जो कुछ कह रही थी दिल की गहराइयों से कह रही थी । शहजादों को गोद में लेकर बेइख़्तियार रोती रही । कभी एक का मुँह चूमती कभी दूसरे को गले लगाती । कभी दोनों को गले लगाकर फूट फूट कर रोती और फिर एक भाई को अपनी गोद में उठाया और दूसरे को आजाद शुदा कनीज़ ने उठाया और घर के अंदर ले आई । 

         जल्दी जल्द पानी गरम किया । एक ने बच्चों के कपड़े धोकर सुखाने शुरू कर दिये । दूसरी ने नहलाया धुलाया , कपड़े पहनाए , बिस्तर बिछाया , ऊपर बिठाया और खाना आगे रख दिया । 

           मजलूमों को कुछ तसल्ली हुई । थोड़ा बहुत खाना तनावल फ़रमाया । फिर वह दूध लाई ।

           बच्चों ने इंकार किया , जमीन पर बैठकर खुशामद करने लगी । प्यारे शहजादों थोड़ा से पी लो । आप बहुत थके हुए हैं गरम गरम दूध पीने से राहत मिलेगी । 

           शहजादों ने उस नेक बीबी का प्यार देखा तो माँ की याद आ गई । उसका दिल रखने के लिए दो दो घूँट तो पी लिया लेकिन अब माँ की याद दिल पर हथौड़े बरसाने लगी । आँसू भी अजीब चीजें हैं । इंसान दुखी हो तो जब भी आ जाते हैं । दुख के बाद राहत मिले तो दुखों को याद करके मचल जात हैं । यही हाल शहजादों का था । माँ जैसा प्यार आ करके आँसुओं को रोके रखा कि कहीं उस मोहसिन का दिल न टूट जाए । 

             फिर बीबी ने पिछले कमरे में बिस्तर लगा दिया और हाथ बाँध कर अर्ज़ किया , मदीना के शहजादों ! तुम बहुत थके हुए हो , दो रातों से जाग रहे हो थोड़ी देर आराम कर लो । शहजादे उठते हैं । बीबी गोद में लेने के लिए बाहें फैला देती है । 

           बड़े ने कहा- हम खुद चलकर जाएंगे , बीबी । अब हमारी थकन दूर हो गई है ।

       लेकिन बीबी आगे बढ़ी और एक को गोद में उठा लिया , कनीज़ ने दूसरे को आगोश में ले लिया और बिस्तर पर बिठा दिया । शहजादे थके हुए थे , फौरन ही नींद की आगोश में चले गए ।

          शहजादे सो रहे हैं और बीबी सिरहाने बैठी हुई ज़ियारत के मज़े ले रही है । कभी प्यार में जोश आ जाता है तो आहिस्ता आहिस्ता . गलियों से कभी एक की जुल्फों को संवारती है और कभी दूसरे के चेहरे पर आई हुई लट को ऊपर उठा देती है । कुछ याद आता है तो बाहर जाती है और फिर फौरन ही वापिस आकर सोए हुए शहजादों को देखना शुरू कर देती है । कितना मुनव्वर था उस बोबो का दिल । किस कुपर रौशन था उसका सोना । जिसमें सच्चा खलूस और सच्चा प्यार था , वफा की दमक थी . हिदायत को चमक थी , रहम का जज्बा था , इस्लाम को चाशनी थी , इलास का नूर था , इंसानियत की अज़मत थी , मोअद्दत की सरबुलंदियां थीं , ईमान की हरारत थी , सदाकृत की रौशनी श्री . शराफत की जिया थी , अहले बैयते रसूल को अकीदत थी , खानदाने नबूवत की मौहब्बत थी , बहनों का प्यार था और माँ की ममता थी ।

               उसके सोने में ख़लूस व प्यार की तन्वीर थी

              उस के दिल पर उत्कृते आले नबी तहरीर थी 

पैकरे मेहरो व वफा , आले मौहम्मद को गुलाम

 चलती फिरती मामता के प्यार की तस्वीर थी 

                                              ( सायम चिश्ती )

         शहजादे सोते रहे और वह वालिहाना चक्कर पर चक्कर लगाती रहो । उनके सदके वारी जाती रही । उनकी बलाएं लेती रही । आज वह इतनी खुश थी जैसे उसे दोनों जहान को दौलत मिल गई हो । कभी सोचती है कि काफी सो लिया है अब शहजादों को जगाकर उनसे बातें करूँ उनको खाना खिलाऊँ और फिर इस ख़्याल से इस इरादा को तोड़ देती है कि इनके लिए सोना ही बेहतर है । इन्हें आराम की सख्त जरूरत है । यह पूरी दो रातें जागते रहे हैं । हाए यह नन्हे से फूल किस मुसीबत गए । रात भर दौड़ते दौड़ते इनकी क्या हालत होती होगी और फिर सर्द आह खींचती और बेसाख्ता रोने लगती ।

         रात हो जाती है । आज़ाद की गई कनीज़ को बुलाया । प्यार से सीने लगा कर कहा- अच्छी बहनन मैं तुझे मुबारकबाद कहना भूल ही गई थी , शहजादों की आमद की खुशी में मुझे याद ही न रहा कि तुम्हें आजादी की मुबारक भी देना है । अब तुम कनीज़ नहीं मेरी बहन हो , मेरी माँ जाई बहन । 

        तुम्हारे वसीला से अल्लाह तआला ने मुझे बहुत बड़ी दौलत अता फ़रमाई है । मुझे अहले बैयते रसूलल्लाह सल्लल लाहु अलिहि व सल्लम की ख़िदमत का मौका मिला है । मुझे रसूले पाक की खुशनूदी हासिल करने की सआदत नसीब हुई है । अल्लाह तआला तुम्हें जजाए ख़ैर दे मेरी अच्छी बहन ।

         कनीज़ ने मालिका की यह बातें सुनी तो दिल भर आया । गले लगकर रोने लगी । फिर कहा : - यह आप की शफक्कत है बीबी जो मुझे यह एजाज़ बख़्शा । मैं अब भी आप की लौंडी बनकर ही रहूँगी । अब तो आप मेरी बहन हैं । मैं आजाद होकर भी बहन की गुलामी में रहना कहीं और जाने से बेहतर समझती हूँ । 

       बीबी दुआ करो , अल्लाह तआला ऐसा बंदोबस्त फुरमा दे कि शहजादे ख़ैरियत के साथ अपने घर वालों तक पहुँच जाएं ।

     बीबी : -इसी लिए तुम्हें बुलाया है मेरी बहन । तुम्हें भी एक काम करना है ।

 कनीज : -हुक्म फरमाइये , मैं आपके हर इर्शाद की तामील करूँगी ।          बीबी : -काम यह है कि तुम मेरे शैहर हारिस की आदत को जानती हो ।

      कनीज़ : -हाँ बीवी ! मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि वह हुकूमत के मुलाजिम हैं । 

।       बीबी : - सिर्फ हुकूमत के मुलाजिम नहीं , बल्कि वह लालची भी है । मैंने सुना है कि हुकूमत ने शहजादों को पेश करने वाले के लिए काफ़ी ईनाम मुकर्रर कर रखा है । मुझे डर है कि कहीं मेरा शौहर हारिस ईनाम के लालच में मुझसे यह दौलत न छीन लें । 

         कनीज़ : -तो फिर क्या करें , बीबी । यह तो बड़ी मुसीबत बन जाएगी। 

      बीबी : -अब यही करना है कि इतिहाई राज़दारी से काम लिया जाए । उसको बिल्कुल पता न लग सके कि शहजादे यहाँ आए हुए हैं । सिवाए तुम्हारे और मेरे कोई इस राज से वाक़िफ़ नहीं । जब हारिस आए तो उसे जल्द ही खाना पेश कर दिया जाए । खाना खाने के बाद वह जल्द सो जाने का आदी है ।

        कनीज़ः - बहुत बेहतर बीबी । मैं पूरी राज़दारी से काम लूँगी । आप बिल्कुल फिक्र न करें । और आप भी यह एहतियात करें कि जब मालिक घर आ जाएं तो शहजादों के कमरे की तरफ़ जाना तर्क कर दे  ।

        बीबी : - ऐसा ही करुँगी । हारिस को अब मालिक न कहा करो , बल्कि अपना भाई समझो । क्योंकि तुम मेरी कनीज़ थीं मैंने तुम्हें आज़ाद कर दिया है । 

         काफ़ी रात गुजर जाने के बाद हारिस घर आता है और खाना खा कर लेट जाता है और मुँह ही मुँह में कुछ देर बड़बड़ाता है । बीबी उसकी आवाज़ पर कान लगा देती है । वह अपने आप से बातें कर रहा था ।

           हमारी ऐसी किस्मत कहाँ है । सुबह से बच्चों को तलाश करते करते जिस्म चकना चूर हो गया है । अच्छा सुबह को फिर किस्मत आजमाई करुँगा ।  

           शौहर की लरजाखैज गुफ्तगू सुनकर बीवी का दिल दहल जाता है । दिल ही दिल में अल्लाह तआला के हुजूर में फरियाद करती है : -ऐ मेरे ख़ुदा मुझ पर रहम फ़रमा । कहीं मेरी सब मेहनत अकारत ही न हो जाए । कहीं मुझे रसूलल्लाह की खुशनूदी हासिल करते करते उनकी तरफ से शर्मिंदगी न उठाना पड़े । मेरे खुदा तू मेरे हाले - ज़ार को जानता है।

       या अल्लाह ! हज़रत मुस्लिम के शहजादों की हिफाज़त फ़रमा । या अल्लाह ! बच्चों ने मुझ पर भरोसा किया हुआ है , उनके सामने मुझे जलील न करना ।

          मेरे अल्लाह ! हारिस को हिदायत दे दे । या अल्लाह ! यह सुबह ही सुबह कहीं चला जाए , तो मैं बच्चों को भेजने का बंदोबस्त कर  लूंगी। 

        खुदावंदा ! हारिस बड़ खुदगर्ज है । तू उसके दिल को फेर दे । या अल्लाह ! तू ही ग़रीबों का फ़रियाद रस है ।

                इलाही लाज रख लेना मेरी इन इल्तिजाओं की

               हिफ़ाज़त आप फ़रमाना , यतीमों बे नवाओं की

                                                        ( सायम चिश्ती ) 

                यतीम बच्चे ज़िबह होते हैं

         हारिस को भी नींद नहीं आती और बीबी भी जाग रही है । हारिस सोच रहा है सुबह मुँह अंधेरे ही घर से चला जाऊँगा । किस्मत आज़माई करने में क्या हर्ज है । मुमकिन है कल किस्मत साथ दे ही जाए और मुस्लिम के बच्चे कहीं छुपत छुपाते मिल जाएं और फिर शाही ईनाम मेरी झोली में होगा । ऐश ही ऐश हो जाएंगे । नेक बीबी सोच रही है : - या अल्लाह अहले बैयत के साथ मेरी मौहब्बत दागुदार न हो जाए । बच्चे समझेंगे मैंने उनके साथ धोका किया है । मज़लूम शहजादों के दिल टूट जाएंगे , यतीमों की आह निकल जाएगी । 

या अल्लाह ! मज़लूमों की आह से तो तेरा अर्श भी काँप उठता है । मुझे इस इम्तिहान में न डालना शहज़ादों की हिफ़ाज़त फ़रमाना । अपनी अपनी सोच है और अपना अपना रास्ता । यह फितरत की नीरंगियां हैं । एक घर में नूर भी है और नार भी , हिदायत भी है और गुमराहीं भी , रौशनी भ्ज्ञी है और तारीकी भी , मौहब्बत भी है और अदावत भी , बीवी बचाना चाहती है शौहर मारना चाहता है । बीवी अहले बैयत की खादिमा है शौहर अहले बैयत का दुश्मन । बीवी जिन के मिलने की खुशी में कनीज़ को आज़ाद कर देती है शौहर उन को ज़ायाअ करके ईनाम हासिल करना चाहता है । एक तरफ़ तिरयाक़ है और दूसरी तरफ़ ज़हर । एक तरफ हयात है और दूसरी तरफ़ मौत । एक तरफ पैक इंसानियत है और दूसरी तरफ तस्वीरे शैतनियत । एक ही घर में एक ही कमरा में अकीदत को भी नींद नहीं आती और बुग़ज़ को भी जाग रहा है । यही तो खुदा की शान है । यही तो इसरारे यही तो कुदरत के राज हैं । यही यही तो ख़ालिके अकबर इलाहिया हैं । भेद में जिन की कुहना तक अक़्ल व खिर्द की रिसाई नामुमकिन व महाल है ।

                       एक वाक़िआ 

एक कसाब ने अपना पेशा तर्क करने की वजह बताई कि मुझे अलल - सुबह किसी गाहक को गोश्त देना था । तड़के का वक्त है । सात आठ माह का बकरी का बच्चा है जिसे ज़िबह करना था वह टाँगें फैलाए पूरी मस्ती में सो रहा है । मेरे हाथ से छुरी गिर गई । उसके साने के अंदाज़ ने मेरा दिल तड़पा दिया । उसके बाद मैं किसी जानवर को ज़िबह करने के तसव्वुर से भी काँप जाता हूँ । यह दिल बदल जाने की बात है , वर्ना हलाल जानवरों को ज़िबह करना मना है

                    जन्नत का ख़्वाब

 दोनों शहज़ादे सो रहे हैं । थकन के बाद आराम की नींद मासूमियत की नींद । गुमज़दों की नींद ( गुम आने पर भी ज़्यादा नींद आती है ) । बड़ी ही मीठी नींद । प्यारी प्यारी ख़्वाबों की नींद । अब्बा से मुलाकात की नींद । बड़ी ही भोली भाली और राहत की नींद कि तक़दीर दोनों को झंझोड़ कर जगा देती है ।

         दोनों बेकस व यतीम दहाड़ें मार मार कर रोने लगते हैं । बच्चों की आवाज़ सुनकर बीबी की दबी दबी चीख निकल गई । बे इख़्तियार मुँह से निकला या अल्लाह ख़ैर हो । हारिंस ने भी रोने की आवाज़ सुन ली थी , लेकिन ख़ामोश रहा । 

      उधर बड़े शहजादे ने छोटे शहजादे को ज़ोर से सीने के साथ चिमटा लिया और फ़रमाया । इब्राहीम अब चलने की तैयारी करो ।

 इब्राहीम : -

कहाँ चलना है , इस वक्त भाईजान क्या फिर दौड़ना पड़ेगा । यहाँ भी हमारा कोई दुश्मन आ गया है । बाहर तो अभी रात है । भाईजान ! अंधेरा ही अंधेरा है । हाय इस अंधेरे में फिर भागना पड़ेगा । 

 मौहम्म्दः

नहीं प्यारे भाई ! अब हमें दौड़ना नहीं पड़ेगा । अब हमारी भागदौड़ ख़त्म हो चुकी है । अब हमारी मुसीबतें कटने वाली हैं । अब दागे - यतीमी धुलने वाला है । अब जुदाई की घड़ियां ख़त्म होने वाली हैं । मैंने एक बड़ा ही प्यारा ख्वाब है । 

        मैंने देखा एक बहुत ही खूबसूरत बाग है । उस में बड़ा ही प्यारा तख़्त बिछा हुआ है । उस पर रसूले पाक बैठे हुए हैं । मुझे अब्बा ने बताया था कि यह रसूले - पाक हैं ।. यह तुम्हारी दादी हैं , हज़रत फ़ातिमा जोहरा और भी बहुत सारे लोग थे सब की सूरते बड़ी ही प्यारी थीं मुझे रसूले पाक ने अपनी गोद में लेकर बहुत प्यार किया । फिर हमारे अब्बाजान को मुखातिब करके फ़रमायाः - मुस्लिम तुमने यह क्या किया , खुद आ गए और इन मज़लूम यतीमों को दुखों की दुनिया में छोड़ आए । अब्बाजान ने रसूले - पाक के क़दमों को बोसा देकर वादा किया । हुजूर यह सुबह होते ही आप के हुजूर में पहुँच जाएंगे । फिर वह प्यारा तख्त और खूबसूरत बाग गायब हो गया । मुझे यकीन हैं कि हम सुबह होते ही शहीद कर दिये जाएंगे और फिर अब्बाजान से मुलाकात करेंगे । प्यारे भाई , जब अब्बाजान ही पास नहीं तो इस जीने में रखा ही क्या है । हमें इस दुखों और मुसीबतों की दुनिया से क्या लेना है । छोटे ने भाई का ख़्वाब सुना तो चीख निकल गई । बड़े ने छोटे की यह हालत देखी तो वह भी ज़ारो - कतार रोने लगा । 

       हारिस इन दर्द में डूबी हुई आवाज़ों को बगौर सुनता रहा । उसे उसकी बीवी की तरफ़ से आने वाली सिसकियों और आहों की दबी दबी आवाज़ भी मुसलसल सुनाई देती रही । बीवी उठना चाहती थी लेकिन इस डर से न उठती थी कि कहीं हारिस को शक न हो जाए । अजीब करब की कैफियत में करवट पर करवट बदल रही है । इंसान की सोच अपनी जगह है और तकदीर का वार अपनी जगह । 

         हारिस पूछ लेता है कि यह रोने की आवाज़ हमारे ही घर से आ रही है । और यह तो बताओ कि तुम्हें नींद क्यों नहीं आ आती और तुम सिसकियां क्यों भरती हो । 

         हारिस की बीवी : - खुदा जाने बस नींद नहीं आ रही । जिस्म टूटता है , शायद बुख़ार हो गया है । 

      हारिस ख़ामोशी से उठकर बैठ जाता है और फिर उस कमरे की जानिब जाता है , जहाँ शहजादों के रोने की आवाज़ आ रही थी । उसकी बीवी भी बेक़रार होकर उसके पीछे दौड़ती है । हारिस को देखकर बच्चे सहम कर चुप हो गए । 

       बच्चों कौन हो ! हारिस ने पूछा : - बच्चों के बजाए उसकी बीवी ने जवाब दिया कि यह तो हज़रत मुस्लिम के शहजादे हैं । मैंने कहा सो रहे होंगे , तुम्हें सुबह मिलाऊँगी । 

        हारिस : - हम पर ख़ुदा फ़ज़ल किया है कि अहले बैते मुस्तफा के शहज़ादे हमारे मेहमान हैं । एक दो रोज़ हम उनकी ख़िदमत करके अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम की खुशनूदी हासिल करेंगे । फिर इनको किसी तरह मदीना शरीफ़ पहुँचा देंगे । 
           प्यारे हारिस ! इनका आना हमारे लिए बाइसे रहमते खुदावंदी है । हमारे सब दुख दर्द दूर हो जाएंगे । पता नहीं यह क्यों रो रहे थे । देखों तो सही फूल से चेहरे रो रोकर मुरझाए हुए हैं । आगे बढ़ो , इनको प्यार करो और तसल्ली दो कि हम तुम्हें जल्दी ही मदीना पहुँचा देंगे । यह शायद इस लिए रो रहे हैं । 
         यतीमी को ताज़ा ताज़ा दाग लगा है । ज़ख्म अभी हरे हैं , ताज़ा ज़ख्म जल्दी दुख जाते हैं । आगे तो बढ़ो प्यारे हारिस तुम चुप क्यों हो । आगे बढ़कर इन से प्यार करो । तुम्हें अल्लाह तआला इसका बहुत बड़ा अजर देगा ।
      वहीं खड़े खड़े हारिस ने कहा सो जाओ । बच्चों रो रोकर हमारी नींद क्यों हराम करते हो । उसकी बीवी तसल्ली देने के लिए आगे बढ़ती है तो उसका हाथ खींच कर अपने कमरे में ले आ जाता है । कमरे में आकर हारिस ने बीवी को मुखातिब किया कि तुम ने मुझ से जान बूझकर पर्दा रखने की कोशिश की है जो अच्छी बीवी के लिए जायज़ नहीं । फिर भी मैं तुझे माफ़ करता हूँ । तुमने अपनी सब बातों में काम की सिर्फ एक बात की हैं कि इन बच्चों के आने से हमारे घर में रहमते खुदावंदी आ जाएगी । मैं तुम्हारी इस बात से इत्तिफ़ाक़ करता हूँ । तुमने वाकई सच कहा । सुबह को मैं इन बच्चों के सिर काट कर इब्ने ज़ियाद के दरबार में पेश करूँगा और वहाँ से इस कदर माल व दौलत हासिल करुँगा कि हमारे ऐश हो जाएंगे और मज़े से सारी जिंदगी गसर करेंगे । बस यही रहमते खुदावंदी है जो इन की आमद से हमारे घर में आएगी ।
     और यह भी हमारी खुश किस्मती की इंतिहा समझो कि मैं कल सारा दिन इन बच्चों को तलाश करता रहा बल्कि रात का काफी हिस्सा इन्हीं की जुस्तजू में भाग दौड़ करता रहा ।
       ख़ुदा किसी की मेहनत जायाअ नहीं करता । उसने मेरी मेहनत का यह सिला दिया कि इनको मेरे घर में भेज दिया । गोया शिकार खुद शिकारी के पास पहुँच गया ।
        शौहर की वहशतनाक और हवलनाक गुफ्तगू सुनकर बीवी का कलेजा हिल जाता है । रात का बाकी हिस्सा हर तरह से मिन्नत खुशामद करके उसे राहे रास्त पर लाने की कोशिश करती रही , लेकिन उधर तो दौलत का भूत सवार था । उस दौलत का जो कूफियों की बहुत बड़ी कमज़ोरी है । 
               ख़ुदा ही जानता है कि दूसरी तरफ़ मुस्लिम के बेकस व मजुलूम यतीमों ने किस तरह रात का बाकी हिस्सा बसर किया ।
            सुबह होते ही हारिस ने बच्चों को बाजूओं से पकड़ा और बाहर की तरफ़ जाने लगा । उसका शहज़ादों पकड़ने का अंदाज़ा ऐसा था जैसे कसाब दो बकरों को कानों से पकड़ रक ज़िबह ख़ाने की तरफ़ ले जाता है और कानों को ज़ोर से पकड़े रखता है कि ज़बीहे भाग न जाएं ।
           हारिस की औरत बच्चों को बचाने के लिए जो कुछ भी कर सकती थी कर गुज़री । उसने हर तरीका से उस खूनी दरिंदे से बच्चों को छुड़ाना चाहा लेकिन कामयाबी न हो सकी । आख़िर उसने फैसला कि कि बच्चों को बचाने के लिए जान की बाज़ी लगा दूँ । यह सोचकर वह आगे बढ़ी और हारिस को रोककर कहने लगी : - जालिम ! अगर तू इन बच्चों का कत्ल ही करना चाहता है तो पहले मुझे कुत्ल कर दे । मैं दुनिया से अपने साथ अहले बैयते मुस्तफा के साथ गुद्दारी के कलंक का टीका नहीं ले जाना चाहती । हारिस पर लालच का भूत सवार था । उस पर कोई हरबा कारगर साबित नहीं हो सकता । 
       लालच इंसान को अंधा कर देता है । पागल बना देता है । उसकी सोचने समझने की सलाहियतों को बेकार कर देता है । उसका दिमाग माउफ़ कर देता है । वह अपने पराए में तमीज़ करने से बेबहरा हो जाता है । वह अंधा हो जाता है । पागल हो जाता है । हारिस भी अंधा हो और पागल हो गया था । उसने शिद्दते ग़ैज़ से तलवार खींची और दुनिया की पाक बाज़ हूर और नेक फितरत बीबी पर वार कर दिया । तलवर सिर पर चलाई गई थी । बीबी का सिर चिर गया । माथे से खून का फव्वारा छूट पड़ा । चकरा कर गिरी । दोनों हाथों से फटे हुए सिर को थाम कर बच्चों से कहा : - शहजादों मुझे माफ़ कर देना , मैं बेकसूर हूँ । मैं तुम से शर्मिंदा हूँ , यतीमों । तुम मेरे घर से मकतल की तरफ जा रहे हो , काश मैं तुम्हें घर में ही न लाती । 
      सिर से खून के धारे वहते रहे । हारिस ने उसे पाँव की ठोकर मारी और बेकस यतीमों को जुल्फों से पकड़कर खींचता हुआ आग बढ़ गया । उस पाकबाज़ की दर्द में डूबी हुई आवाज़ आती रही । मौहम्मद अरबी के शहजादों मुझे माफ़ कर देना कुयामत के दिन मेरी शिकायत न करना , मैं बेक़सूर हूँ मरग नादिम हूँ । या अल्लाह मुझे माफ़ करदे । यह कहा और बेहोश हो गई । 
           मज़लूम बच्चों के सामने हारिस की बीवी पर वार हुआ था । उस वार ने उनके दिल भी चीर दिए । उनके दिलों से हूक उठी और हुब के साथ यह ख़्याल भी आया कि काश यह ज़ालिम हमें कुत्ल कर देता और उस पाकवाज़ बीबी को कुछ न होता । हमें तो कत्ल होना ही था वह बेचारी भी हमारी तकदीर की लपेट में आ गई । 
           अभी इन ख्यालों में ही थे कि नहर का किनारा आ गया । हारि ने बड़े शहजादे को कहा कि लेट जाओ । बड़ा अभी लेटने वाला ही था कि पहले छोटा लेट गया और कहा कि पहले मुझे कत्ल कर दो । मैं भाई को कुत्ल होता हुआ नहीं देख सकता । बड़े ने कहा- रुक जाओ , पहले मुझे कुत्ल करो ।
 मासूम मौहब्ब्त का यह अंदाज़ देखकर हूरों की चीखें निकल गईं । आसमान का कलेजा फट गया । अर्शे खुदावंदी को लरज़ा आ गया । फ़रिश्ते तिलमिला कर रह गए । ज़मीन को ज़लज़ला आ गया । कायनाते आलम काँप उठी । लेकिन बेरहम हारिस को रहम न आया । ज़ालिम ने कहा : -ज़्यादा बातें न बनाओ और दोनों एक साथ लेट जाओ । 
      नबी के तारे , अली के दुलारे , हुसैन के प्यारे , मुस्लिम के यतीम , अक़ील के पोते , मौहब्बत के शहकार , अहले बैयत की बहार , एक दूसरे को सीने से लगाकर ऐसे लेट गए जैसे बिस्तर पर आराम करने के लिए लेटे हों । अब्बाजान से मुलाकात का शौक शहादत का जौक हर गुम से बेनियाज़ कर देता है । सीने मिले हुए हैं । एक दूसरे के बाजू गर्दनों में हमाइल हैं । सोने के अंदाज़ में आँखें बंद कर लेते हैं । हारिस की तलवार उठती है , चमकती है और दोनों यतीमाने मुस्लिम के सिर तन से जुदा कर देती है ।
      इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलिहि राजेऊन अहले बैयत के मासूम , मौहम्मद के मज़लूम हमेशा हमेशा के लिए चैन की मीठी नींद सो जाते हैं । दुनिया के दुखों से निजात होती है । अब्बाजान से मुलाकात हो जाती है । 
      ज़ालिम ने जुल्म व जबर की इंतिहां कर दी । साबिरों ने सबर की इंतिहा कर दी । 
    फ़रिश्तों की मासूमियत कांपती रही । शैतान की शकावत मुस्कराती रही। 
     जन्नत में जाते जाते नन्हे शहीदों की रूहों ने दुनिया के बड़ - बड़े फलासफ़रों और दानशवरों को एक पैग़ाम दिया कि मौत को सिर पर देख कर भी भाई को भाई से मौहब्बत का रिश्ता नहीं तोड़ना चाहिए । ईसार करना सीखो , ऐ दुनिया वालों । ईसार ही मकसूदे इंसानियत है । जान तो देना ही पड़ेगी । एक दूसरे पर कुर्बान होना सीखो । 

                   जुल्म की सज़ा 

  शैतान हारिस ने यतीमों के धड़ों को नहर में फेंक दिया । यह वही नहर फरात है , जिसका पानी शहीदों के लिए बंद कर दिया गया था । अहले बैयते मुस्तफ़ा उस नहर का पानी कैसे पी सकते थे जिसमें मुस्लिम के बच्चों का खून मिला हुआ था । हारिस ने सिर उठाए और तश्त में सजाकर इब्ने ज़ियाद के पास ले गया । तश्त उसके सामने रख कर , ऊपर से रुमाल उठाकर हाथ बाँधकर खड़ा हो गया । दिल में ईनाम मिलने की खुशी से लड्डू फूट रहे हैं । 
        इब्ने ज़ियाद ने शहज़ादों के कटे हुए सिर देखकर पूछा : -यह क्या है? 
       हुजूर यह मुस्लिम के बच्चों के सिर हैं । बड़ी मुश्किल से पकड़े गए थे । हारिस ने खुश होकर कहा । 
        इब्ने ज़ियाद ने गुस्से से काँपते हुए कहा : - तुम्हें किसने कहा था कि बच्चों के सिर काट कर लाओ । अहमक के बेटे मुझ से यज़ीद ने जिंदा बच्चे माँगे हैं , सिर नहीं माँगे । हरामजादे तुमने इन्हें क़त्ल क्यों किया । 
         हारिस ने काँपने लगता है । काँपते काँपते कहा गुलती हो गई , जनाब । माफ़ कर दीजिए । 
         इब्ने ज़ियाद ने और गुस्से में आकर कहा : -यह गलती माफ़ नहीं हो सकती । जल्लाद ले जाओ इसे , चौराहे में गाड़कर इस पर खुंख्वार कुत्ते छोड़ दो । इस की यही सज़ा है ।
       इब्ने ज़ियाद को बच्चों की शहादत का गम नहीं था । उसे यज़ीद कुछ भी था यह कुदरत का इंतिक़ाम था , की तलबी का डर था । फितरते ख़ामोश का इंतिकाम , मज़लूम बच्चों की मासूम रूहों का इंतिकाम । कातिल को क़त्ल होना ही पड़ता है । जालिम को अपने जुल्म का बदला वसूल करना ही पड़ता है । 
          यह निज़ामे कुदरत है इसे कोई नहीं तब्दील कर सकता । ज़ालिम को जुल्म करने के लिए वक्त दिया जा सकता है लेकिन उस पर गिरफ्त कायम रहती है । उसके लिए कुदरत का शिकंजा तैयार रहता है । सिर लेने के बदले में सिर देना ही पड़ता है । किसी के अरमानों का खून करके अपने अरमानों को लाशा उठाना ही पड़ता है । 
   यह कानून ए फितरत है । यह कुजा व कुद्र का उसूल है , यह कुदरत का अटल दस्तूर है । इसकी गिरफ्त से बचने का सवाल ही पैदा नहीं होता । कानूने कुदरत को तोड़ा नहीं जा सकता । यह अजुली है और अबद तक रहेगा । 
       दुनिया के बाद अभी आख़िरत बाकी है , जहाँ जुरें जुरें का हिसाब होगा । मंय्या मल मिसकाला ज़र्रातिन खैरंय्यरा ओ मंय्या मल मिसकाला शय्यरा 
         हारिस को कूफ़ा के चौराहे में सीने तक गाड़ दिया गया और उस पर वही दही फेंक कर खुख्वार कुत्तों को छोड़ दिया गया ।
        खुंख्वार कुत्तों ने इंसान नुमा कुत्ते के जिस्म की तिक्का बोटी कर दीं । ज़ालिम को जुल्म की सज़ा मिल गई । फितरते ख़ामोश का सकून हासिल हो गया । कजा व कदर ने अपना इंतिकाम ले लिया । अभी यौमे हिसाब बाकी है ...... है । 
                   इबरत है अहले नज़र के लिए

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