हुसैन नाना मदीना छूट गया

  हुसैन नाना के मज़ार पर 




     इमामुलंबिया का दरबारे अकदस है । रात तीसरे पहर में.      दाखिल हो रही है । मलाइका - कराम आसमान से सफ़ व सफ़ सलामी व ज़ियारत के लिए नाज़िल हो रहे हैं ।
        एक नूर है जो ज़मीन व आसमान के दरम्यान ख़िलाओं और फ़िज़ाओं को मुनव्वर किए हुए हैं ।
      यह फ़ैसला करना इंतिहाई मुश्किल है कि यह नूर आसमान की जानिब परवाज़ कर रहा है या आसमान से ज़मीन की तरफ नजूल कर रहा है ।
       अहले इरफ़ान ही इस हक़ीक़त से पर्दा उठा सकते हैं । क्योंकि यह मरकज़ें नूर की बात है ।
       इन्हीं अन्वार व तजल्लियात की बरसात में हुसैन हाज़िर होकर मुक़द्दस नाना के हुजूर में सलात व सलाम का हदिय पेश करते हैं और फिर अर्ज़ करते हैं : -
              नाना तेरे करम के खज़िने की ख़ैर हो 
               दे भीख मुझको तेरे मदीने की ख़ैर हो
                                           ( सायम चिश्ती
                मैं जा रहा हूँ छोड़ कर आँखों के चैन को
                उठकर गले लगाइये अपने हुसैन को
                                              ( सायम चिश्ती ) 
        कौन अंदाज़ा कर सकता है , गुम व आलाम के उस तूफ़ान का जो इमाम आली मुकाम हुसैन के सीने में मौजज़िन था । आप तस्वीरे - दर्द हुए फ़रियाद करते हैं ।
        ऐ मेरे गुमगुसार व मेहरबान नाना ! तेरा हुसैन हाज़िर है और शर्फ़ - बारियाबी चाहता है । 
     नानाजान ! आप बोलते क्यों नहीं । मैं आपका वही हुसैन हूँ 
 जिसकी आमद पर आप खुत्वा छोड़कर मिंबर से उतर आते थे । 
       हाँ मेरे मोहतरम नाना ! वही हुसैन जो हालते नमाज में आपको पुश्त पर सवार हो जाता था तो आप उस वक्त तक सज्दा से सिर न उठाते थे जब तक मैं खुद न उतर आता । 
        नानाजान ! आप का नाजों का पाला हुआ हुसैन ! आज तेरे कदमों से दूर जा रहा है , इसको सहारा दीजिए । 
        हुजूर ! मैं आपका जमाले जहाँआरा देखने के लिए हाज़िर हुआ हूँ ।। मैं वल्लैल जुल्फ़ों के झुरमुट में वहा चेहरे की जियारत को आया हूँ , मुझे शर्फे ज़ियारत बख्शिये । 
         नानाजान ! मेरी हालते जार पर रहम फरमाइये ! मुझे मेरे फ़राईज से आगाही बख़्शिये , मेरी रहनुमाई कीजिए . मेरी मुश्किल कुशाई फरमाइये । 
              मुझको नाना देखिए मैं आपकी तस्वीर हूँ 
             जिसको कंधों पर बिठाते थे वही शब्बीर हूँ   
                                 ( सायम चिश्ती
नानाजान ! जब मैं आप के कंधों पर सवार था तो मैं न एक आवाज़ सुनी कि हुसैन को कितनी अच्छी सवारी मयस्सर है । तो आपने फ़रमाया था सवार भी तो बहुत अच्छा है ।
            मुकद्दस नाना ! मैं आपकी अंबरी जुल्फों को थाम लेता था कि कहीं गिरं न जाऊँ । आपने मुझे शहसवार बनाया है । नाना मैं हके शहसवारी अदा करूंगा । 
              प्यारे नानाजान ! मैं उस वक्त तक अपने सीने पर नेजों , भालों , तीरों और तलवारों के जख्म खाता रहूँगा , जबतक मेरी सवारी की कूंचे न काट दी जाएं । 
            नानाजान ! आपका सवार उस वक्त जमीन पर गिरेगा , जब सवारी गिर जाएगी । 
              मगर मेरे हुजूर ! आप मुझे शहादत की जिन बुलंदियों पर देखना चाहते हैं , वह आपकी दस्तगीरी के बगैर मुहाल है । 
            उस मुकाम पर आप ही मुझे गिरने से बचा सकते हैं । ख़ुदा रा अपने हुसैन को उस वक्त थाम लेना , मेरे नाना उस वक्त मुझे सहारा देना । 
             प्यारे नानाजान ! आप जवाब क्यों नहीं देते । आप तो हुसैन के लिए बेकरार हो जाते थे ।
         मेरे बचपन मैं जब आपको मेरी शहादत की खबर दी गई तो

आप जारा - कतार रोते रहे थे ।
        ऐ मेरे आका व मौला ! ए फरियाद करने वालों के फ़रियादरस देने वाले मुकद्दस और बेकसों के मल्जा व मावा , ऐ नादारों और मिस्कीनों को पनाह देने वाले मुक़द्दस रसूल , ऐ इमामुलंबिया , ऐ रहमतुल लिल आलिमीन अपने हुसैन को एक बार आगोश में ले लूँ । मैं आपकी बेटी का बेटा हूँ । आप मुझे और भाई हसन को आसमानों के गोशवारे फ़रमाते थे। 
        मेरे प्यारे नाना ! मुझे जियारत की भीख अता करो । मुझे सीने से लगाकर एक बार प्यार तो कर लो । मुझे सहारा दो । मुझे इस्तिकामत अता फरमाओ मुझे करबला का नज़ारा करा दो ।
          मुझे मेरी कुत्लगाह दिखा दा मेरे मौला ! तेरा हुसैन कब तक फ़रियाद करता रहेगा । इसी तरह आहवज़ारी करते हुए हुसैन नाना के मज़ार से चिमट जाते हैं । बादे रहमत चलती है , नीम - ख्वाबी का आलम तारी हो जाता हैं 
               हुसैन देखते है। कि अंबिया व मलाइका के झुरमुट में शवेअसरा के चुल्हा इमामुलबिया सल्लल लाहु अलिहि व सल्लम दरूदो- अलम व मलाल की तस्वीर बने हुए सामने तशरीफ़ फ़रमा हैं ।
            नाना के हसरत व यास मे डूबे हुए रूखे वहा की जियारत हुसैन धर्रा जाते हैं । नाना बढ़ते हैं । नवासे का सिर अपनी गोद में लेते हैं और अपनी उंगलियों से हुसैन की जुल्फ़ों में कंघी करते हैं । 
            नाना की आगोश में सिमट जाते हैं और सिसकियां भरते हुए फरियाद करते हैं ।
            नानाजान : दुनिया बदल चुकी है । हुसैन का अब इस बेवफा दुनिया में रहना मुश्किल हो गया है ।
           मेरे प्यारे नानाजान ! मुझे अब अपने पास रख लो । अपने मुक़द्दस घोड़ी सी जगह दे दो । 
          नाना । मुझे अपनी इसी आगोशे रहमत मीठी नींद के मज़े लेने दो। मुझे अब जिंदगी की ख्वाहिश नहीं है ।
                नाना मैं आपके हुज्रामे रहना चाहता हु  नाना मै, माँ के हुज्रा में रहना चाहता हूँ । मुझे माँ के हुज्रा में रहने की इजाजत दी जाए ।
 इमामुलंबिया बेकरार हो जाते हैं और फ़रमाते हैं : - हुसैन ! ऐसी गुफ्तगू न करो । नाना का दिल न तोड़ो । मेरे लाल तुम्हें तो मेरे दीन को जिंदगी देना है । तुम्हें तो बहुत बड़ा इम्तिहान देना है । 
             शेरे - ख़ुदा के शेर ! अपने इम्तिहान की तैयारी करो । 
ऐ नौजवानाने जन्नत के सरदार और मेरे गुलशन की बहार हुसैन उधर देखो ! वह सामने तुम्हारी कुत्लगाह है ।
           यह तुम्हारी शहादत की जगह भी और तुम्हारी इम्तिहानगाह भी ! यहां तेरा इम्तिहान होगा । अज़ीम इम्तिहान ।
          तो इसी मुकाम पर ही तो फ़राईजे ज़िबेह अज़ीम का तकमील करेगा । मेरे हुसैन इस बे आब व गयाह और तपते हुए सहरा और कबर व बला की ज़मीन को तेरे खून से आबयारीके बाद करबला ए मुअल्ला का नाम दिया जाएगा । 
       हुसैन ! यह फ़रात है । लेकिन तुझे इस का पानी नहीं मिलेगा । तेरे नन्हे अली असगर का हलक सूखकर काँटा हो जाएगा । 
            मेरी प्यारी सकीना को प्यास बेताब कर देगी ।
       मेरी तमाम अहले बैयत अतहारे शिद्दते - प्यास से तड़प रही होगी । लेकिन ऐ मेरे हुसैन ! तुझे इस नहर से पानी नहीं मिलेगा ।
           तेरे दुश्मनों के जानवर तक पानी इस के इस्तेमाल से महरूम कर दिया जाएगा इस है तुझे प्यासे ही को इम्तिहान देना है ।
          पीते होंगे मगर मेरे लाल तुझे पात इस लिए कि तेरा इम्तिहान मेरे लाल हुसैन ! तेरा इन सदक़ात को क़बूल करना इख़्तियारी होगा । तू अगर चाहे तो इस तपते हुए सहरा और चटियल मैदान को समुद्र बन जाने का हुक्म देकर तमाम रेगज़ारों को पानी में तब्दील कर सकता है । 
             लेकिन मेरे हुसैन ! तुझे प्यारे रहकर इम्तिहान देना है ।
        तुझे सय्यदजादियों के खुश्क होंठों और सूखे हुए हलकूम देखकर सबर करना है । यही तो तेरा इम्तिहान है कि दुनिया भर की तमाम मुसीबतें जमा करके तुम पर डाल दी जाएं और फिर भी तू सबर व इस्तिकामत की तस्वीर बनकर शुक्रे खुदावंदी करता रहे और यॉ पैकरे - तस्लीम व रज़ा बनकर अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की खुशनूदी हासिल करे । 
         हुसैन ! तेरा नाना कुयामत के दिन ख़ुदा तआला के हुजूर में तेरी
 कुर्बानियां पेश करके उम्मत की बख्शिश तलब करेगा ।
      मरे हुसैन ! तेरी शहादत मेरी नबूवत का कमाल है । उससे तमाम शहादतों से अज़ीम और अरफान होना चाहिए । 
         हुसैन ! तू मुझसे है और में तुझसे हूँ । तेरी माहादत मेरी शहादत है । तेरी मुसीबत मेरी मुसीबत है , तेरा इम्तिहान मेरा इम्तिहान है , करवला की तपती हुई जमीन तेरी गर्दन से मेरा खून बहेगा ।
           हुसैन ! तेरा खून मेरा खून है । तेरा गीत मोठा गोमता है । देना तुह मेरा नूर है । हुसैन तू मुझसे है और मैं तुझसे हूँ । 
           हुसैन ! तेरा नाना तुझसे दूर नहीं होगा । वह हर मुकाम पर तेरे साथ होगा । तेरी राहनुमाई करेगा । तेरे इम्तिहान का मुशाहिदा करेगा और तेरी शहादत को उस अरफा मुकाम तक पहुँचा देगा जो किसी दूसरे को नसीब नहीं । 
            मेरे लाल हुसैन ! तेरे नाना का व हर मन्सब तमाम कायनात  से बुलंद व बाला है । और यह मन्सबै शहादत जो हमे तेरी तरफ से होकर यह भी तमाम कायनात से अजीम होगा । 
      
           इथे तेरे अकबर उते दरहन गियां शमशीरां
           इथे तेरे कासिम ताईं करनाँ ई कत्ले शरीरां 
           इथे जिस्म तेरे विच आके खुभनाँइ ज़ेहरी तेरां
           इथे सायम वक्त जुमे दे हो न्यां गुल अखिरां

                    इथे इथे खो मे लादी ए परदेसी मेरे 
                    गो तेरी विच तीर है खाना इथे असग़र तरे
                    ईस तरफ़ थीं खमियां ताईं ज़ालिमां आन जलानां
                    इथे असग़र दे झूले दियां दौड़ियां ने जल जानां 
                                                             ( सायम चिश्ती )

              हुसैन ! खूब अच्छी तरह देख लो । यहां तेरे अली अकबर को ज़िबह किया जाएगा । इस मुकाम पर हसन की निशानी क़ासिम की जवानी टूटेगी । 
          और यह वह दर्दनाक मुकाम है जहां तेरे मज़लूम अली असगर के नाजुक गले में ज़हर बुझा हुआ तीर पेवस्त कर दिया जाएगा और वह तेरी गोद में हसरतज़दाह निगाहों से तेरी तरफ़ देख कर दम तोड़
देगा । 
             यह वह जगह है जहाँ मेरी बेटी की बेटी ज़ैनब शहीदान ए बड़ा की लाशों के टुकड़े जमा करेगी । 
         और यह वह जगह है जहाँ शहरबानों सारा घर उजड़ जाने के बाद तेरी शहादत का नज़ारा करेगी । अपना लुटा हुआ सुहाग देखेगी । अपनी उमंगों और आरजूओं का जनाजा निकलते देखेगी ।
           इमाम आली मुकाम एक एक करके करवला के तमाम मनाजिर का मुशाहिदा फ़रमाते जा रहे हैं और आगोशे रसूल हैं ख़्वाबे राहत का मज़ा ले रहे हैं ।
         लेकिन यह सकून व राहत भी आरजी सावित हुए । इमामुलंबिय सल्लल लाहू अलिहि व सल्लम ने रुखो अन्वर को बोसा देकर फ़रमायाः- मेरे मज़लूम हुसैन अब जाओ । अहले बैयत तुम्हारा इंतिज़ार कर रहे हैं मेरे परदेसी और ग़रीबुल वतन होने वाले हुसैन ! उठो और अपनी मंज़िल की जानिब रवाना हो जाओ और जान की बाज़ी लगाकर सिर उठाती हुई इब्लीस की तागूती ताकतों को फना कर दो । 
        मेरे लाल उठो ! और बातिल की सिर उभारती हुई कुव्वतों को कुचल कर रख दो ।
        कज़ब व इफ़्तरा की बुनियादों पर कायम की हुई सल्तनत टकरा जाओ । खुद फ़ना होकर बकाया हासिल करो । लेकिन बातिल के खूनी अफुरियत को उसके पंजे गाड़ने से पहले हमेशा हमेशा के लिए फ़ना कर दो । 
        मेरे हुसैन ! मेरी उम्मत की किश्ती ए इमारत के चढ़े हुए तूफ़ान के थपेड़े खा रही है । उठो और अपनी जान देकर उसे किनारे पर लगा दो । मेरे मुक़द्दस दीन को जुल्म व जबर की ताक़तें ख़त्म कर देना चाहती हैं । उठो और मेरे दीन को हमेशगी की जिंदगी दे दो । 
           मेरे हुसैन तुम बड़े इम्तिहान के लिए जा रहे हो । अल्लाह तुम्हें कामयाब करे । जाओ मेरे शहजादे अल्लाह तुम्हारा हामी व नासिर है । 
नाना के दिल के टुकड़े तुम जहाँ कहीं भी होगे हम तुम्हारे साथ होंगे । 
          खुदा हाफ़िज़ , मेरे हुसैन खुदा हाफ़िज़ । 
         हुसैन इस नीमबेदारी में आँखें खोल देते हैं । ख़्वाब देखा हुआ करबला का तमाम मंज़र आँखों के सामने फिर जाता है । 
       आप उठते हैं , नाना की कबर को वालिहाना तौर पर बार बार चूमते हैं और सलाम अर्ज़ करके हुज्रा ए रसूल से हुज्रा ए बतूल में आ जाते हैं ।

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