अहले बैयत की तैयारी कयामते सुगरा

         अहले बैयत की  तैयारी कयामते सुगरा


 घर में आते हैं तो दस साल की मजूलम बच्ची शहज़ादी ए हुसैन सय्यदा फातिमा सुगरा की फ़रियादो फ़ग़ाँ और आह व ज़ारी ने कुयामते सुगुरा का नक्शा खींच रखा है ।

             बीमारी बच्ची बुख़ार की शिद्दत से बेताब है । जिस्म जल रहा है । उठती है तो गिर पड़ती है , गिरी हुई कि जो उठाने लगता है तो उसी के सामने फ़रियाद शुरू कर देती है । फूफी ज़ैनब आगे बढ़कर सहारा देती हैं और तसल्ली के अल्फ़ाज़ कहती हैं । 

       मज़लूम बच्ची की आह निकल जाती है । बेकरार होकर फूफी का दामन पकड़ लेती है । हाथ काँप रहे हैं , ज़बान में लर्ज़ा है , जिस्म पर राअशा तारी है , बात करते हुए ज़बान में बल पड़ते हैं , इस हालत में अर्ज करती है । 

             मेरी प्यारी फूफी क्या बात है ? आज आप सब क्यों बदले हुए हैं । आप सब मेरी तरफ़ खोई खोई नज़रों से क्यों देखते हैं । प्यारी फूफीजान ! यह कैसी तैयारियां हैं । आप सब किधर जा रहे हैं । मुझे आप क्यों तैयार नहीं करते । 

          फूफीजान ! मेरे हाले - ज़ार पर रहम कीजिए । मुझसे यह सब कुछ नहीं देखा जाता । फूफीजान सुगुरा इस सदमा से मर जाएगी ।  

              भय्या अली अकबर भी तैयार मालूम होते हैं । अली असग़र का झूला भी सहन में मँगवा रखा है । अम्मीजान भी बुरका ओढ़ने की तैयारी कर रही हैं ।

            लेकिन ! मुझ किस्मत की मारी को कोई पूछने वाला नहीं है । आज से पहले तो आपने कभी ऐसा नहीं किया । फूफीजान बता तो दीजिए कि बात क्या है ?

           इमाम आली मुकाम बच्ची की हालत देख रहे हैं । दिल में सफर का ख़्याल आता है । बीमार को इस हालत में छोड़ जाने का तसव्वुर करते हैं तो रोआं रोआं काँप उठता है ।

         दिल में ख़्याल आता है हुसैन तेरा इम्तिहान अभी से शुरू हो चुका है । यह तेरे इम्तिहान की पहली कड़ी है । आप दिल को सँभालने की कोशिश करते हैं और फिर बारगाहे इज़दी में अर्ज़ करते हैं : -या अल्लह मेरे हाल पर रहम फरमा । मुझे मेरे इम्तिहान में कामयाबी नसीब फ़रमा । 

         फिर हज़रत शहरबानों को इशारा करते हैं कि अली अकबर को बुलाओ । अली असग़र को लाओ । ताकि बीमार बहन से आख़िरी बार गले मिल लें । 

              बानो को इशारा किया हज़रत ने कि जाओ

      अकबर को बुलाओ , अली असग़र को भी लाओ 

                आए अली अकबर तो कहा शाह ने आओ 

                   रूठी है बहन तुम से गले उसको लगाओ

                    चले हुए जी भर के ज़रा प्यार तो कर लो

                  लेने इन्हें कब आओगे , इकरार तो कर लो

                                                             ( अनीस ) 

        शहज़ादा ए हुसैन अली अकबर आगे बढ़ते हैं । बहन की यह नाजुक हालत देख कर पहले ही बेकरार थे और बेकरार हो गए । आँसुओं को रोकने को बड़ी कोशिश करते रहे लेकिन यह तूफ़ान कब रुकता है ।

             सायम कमाले ज़ब्त की कोशिश तो की मगर

               पलकों का हल्का तोड़ के आँसू निकल गए

                                                      ( सायम चिश्ती ) 

बात करने लगते हैं मगर बात नहीं होती । हमशीर के चेहरे की तरफ़ देखना चाहते हैं मगर आँसुओं की दीवार हायल हो जाती है । बड़ी मुश्किल से इतनी बात कर सके ।

             मेरी बहन क्या तू मुझ से नाराज़ हो गई है । अच्छी बहन ख़फ़ा न हो । मेरा तो कोई कसूर नहीं और फिर इज़्तिराब में कफे अफ़सोस मलने लगे । 

         बीमार बच्ची ने भाई के सीने पर सिर रखकर कुछ इस तरह फ़रियाद की कि अर्शे - बरीं को भी लरजा़ाह आ गया । 

             फ़रियाद क्या थी , बर्के गम थी । जिसने सब अहले बैयत के दिलों को तड़पा दिया । आप आलमे बेखुदी में भाई से बातें करती रहीं । उसकी शादी की बातें भाभी को लाने की बातें घोड़ी पर चढ़ने की बातें । दूल्हा बनाने की बातें । बाग पकड़ाई की बातें |

         चिल्लाने लगी छाती पर मुँह पर रख के वह दिलगीर 

                         महबूब बिरादर तेरे कुरबान यह हमशीर

                           सदक तेरे सिर पर से उतारे मुझे कोई

                         बल खाती हुई जुल्फों पे वारे मुझे कोई 

                     रूख़्सारों पे सब्ज़े के निकलने के मैं सदके

                         तलवार लिए शान से चलने के मैं सदके

                    अफ़सोस से उन हाथों के मलने के मैं सदके

                 क्यों रोते हो अश्क आँखों से ढलने के मैं सदके

                      जल्द आके बहन की ख़ाबर लीजियो भाई

                           बे मेरे कहीं ब्याह न कर लीजियो भाई 

                                                              ( अनीस )

 मेरे अच्छे भाईजान ! अगर मेरा हाल पूछा है तो अम्मीजान से मेरी सिफ़ारिश भी कर दो । आप जहाँ भी जाना चाहते हैं मुझे अपने साथ ले चलो । 

    आप लोगों की जुदाई मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगी । अब अगर आओगे तो मेरी कबर से मुलाकात करोगे 

      भय्या मुझे अपने साथ लेते चलो । मेरी अम्मी से सिफ़ारिश कर दो । नहीं तो मैं मर जाऊँगी भय्या । 

      बीबी शहर बानों ने बीमार बच्ची के यह अल्फ़ाज़ सुने तो कलेजा मुँह को आ गया , रो कर फ़रमाने लगीं : - 

       जाने मदर ! मजबूर माँ के दिल पर छुरियां न चलाओ । प्यारी बेटी मुझे अब और न तड़पाओ । तुम्हारी गुफ्तगू से मेरी जान निकल जाएगी । 

     प्यारी असगुर ! मेरी सिफारिश की बात करती हो । माँ कब चाहती है कि अपने जिगर के टुकड़े को इस हालत में छोड़कर चली जाए । 

         बेटी ! तुम्हें सख़्त बुख़ार है । तुम सफ़र के काबिल नहीं हो । तुम्हारी तकलीफ़ और बढ़ जाएगी ।

      मेरी दुआ है कि तू जल्द सेहतयाब हो जाए । अल्लाह तआला तेरी निगहबानी फ़रमाए । सुगुरां सबर करो । अल्लाह तआला सबर करने वालों के साथा है । तू तन्दरूस्त हो जाएगी तो अली अकबर तुम्हें आकर ले जाएंगे । अब न रोना मेरी बेटी ! नन्हा अली असगर तुम्हारी दर्दनाक आवाज़ सुनकर रोने लगता है ।  

                 मैं सदके गई बस ! न करो गिरिया जारी 

                 असगर मेरा रोता है सदा सुनके तुम्हारी

                 वह काँपते हाथों को उठाकर यह पुकारी

                 आ आ मेरे नन्हें से मुसाफिर तेरे वारी

                 छुटती है यह बीमार बहन जान गए तुम ?

               असग़र मेरी आवाज़ पहचान गए तुम ?

    नन्हें से अली असग़र ने जब बहन की फैली हुई बाहों का देखा तो पास जाने के लिए मचलने लगे । 

    माँ ने जब नन्हें से भाई को बहन की गोद में देना चाहा तो सुगरा ने हाथ पीछे कर लिए ।

    इस गुम को किन अल्फ़ाज़ में बयान किया जा सकता है । इस अल्म का कैसे इज़हार किया जा सकता है । 

     इस गम के बयाँ करने को अल्फ़ाज़ नहीं मिलते । 

  एक तरफ़ तो हमशीर तड़प रही है कि नन्हें को गोद में लेकर प्यार करूँ , सीने से लगाऊँ , उसका मुँह चूमूँ , उसे लोरियां दूँ । 

   और दूसरी तरफ़ इस जज़्बा के साथ हाथ खींच लिए कि मुझे तेज़ी से बुखार चढ़ा हुआ है । 

      आप कहती हैं : -अम्मी अली असग़र को अपने पास ही रखा । मेरे बुख़ार की गर्मी से मेरा नन्हा सा फूल मुरझा जाएंगा ।.

      बस मेरे क़रीब बैठ जाओ कि मैं इसे देखती रहूँ ।

   बीबी शहर बानों क़रीब बैठ जाती है और मज़लूम बहन याँ मज़लूम भाई से मुखातिब होती है ।

                  तुम जाते हो साथ और बहन जा नहीं सकती 

                     तप है ! तुम्हे छाती से लिपटा नहीं सकती

                     बेकस हूँ मेरा कोई मददगार नहीं है

                  तुम हो सो तुम्हें ताकते गुफ़्तार नहीं है

                                                         ( अनीस )

      ने जिस दम यह सुनी दर्द की गुफ़्तार 

     सुगरा की तरफ़ हाथों को लटका दिया यकबार

                  ले लेक बलाएं यह लगी कहने वह बीमार

                  झुक झुक के दिखाते हो मुझे आख़िरी दीदार 

                दुनिया से कोई दिन में गुज़र जाएगी सुग्रा

                तुम भी यह समझते हों कि मर जाएगी सुगुरा

                                                               ( अनीस ) 

     मेरे माँ - जाए असग़र ! मेरा जी चाहता है कि तुम्हें सीने से लगाकर तुमहारी बलाएं लूँ , लेकिन बहन मजबूर है ।

    तू बहन के जलते हुए जिस्म और तपते हुए सीने की गर्मी बर्दाश्त नहीं कर सकेगा । 

     मेरे नन्हें चाँद तुम मेरी तरफ़ देखते रहो और मैं तुम्हारी तरफ देखती रहूँ । 

    इस किस्म की दर्द अंगेज़ गुफ़्तगू करते करते बुखार और तेज़ जाता है । बीमार को फिर गुश आ गया । 

     इमाम आली मुकाम बच्ची की यह हालत देखकर तड़प गए । बेटी के सिरहाने बैठकर नब्ज़ पर हाथ रखा तो बुख़ार इस कद्र तेज़ था जैसे भट्टी जल रही हो । माथे को छुआ तो हाथ जलने लगे । 

     पैकरे - सबर व रज़ा हुसैन की आँखें आँसुओं से लबरेज़ हो जाती है।

       बीबियों से नज़र बचाकर दस्तारे - मुबारक के पलड़े में गरम गरम आँसुओं को जज़्ब कर लेते हैं ।

       फिर भी जिगर को चीरती हुई ठंडी आह निकल ही गई । सूरः फ़ातिहा पढ़कर बच्ची को दम किया ।

     शहज़ादी ए मुस्तफ़ा की कूव्वते मसीहाई ने पूरा पूरा असर किया । बच्ची ने आँखें खोल दीं । 

                       बीमार ने पाई जो गुले ज़ोहरा की खुशबू

                       आँखों को तो खोला , पे टपकने लगे आँसू

                                                               ( अनीस ) 

इमाम के हुजूर मुजस्समा ए फ़रियाद बनकर बीबी सुगुरा ने अर्ज़ किया , बाबा आप आ गए , बाबा ! मेरे मसीहा आप अब तक कहाँ थे , यहाँ क्या हो रहा है , बाबा । 

      मेरे प्यारे अब्बूजान ! यह कहाँ की तैयारी हो रही है । आप अपनी सुगरा को किस के सहारे छोड़कर जा रहे हैं ।

        मुझे सब कुछ बता दो मेरे अब्बा , मैं बहुत परेशान हूँ 

       इमाम आली मुक़ाम ने फ़रमाया : - बेटी सबर करो । हम देर से आए हुए तुम्हारी हालत देख रहे हैं । 

        बेटी तुम्हारी यह हालत मुझ से देखी नहीं जाती ।

         बेटी मैं इसलिए नहीं आया था कि तुम्हारे सवालों का क्या जवाब दूँगा । अब सुन मेरी बेटी मैं तुम को सब कुछ बता देता हूँ ।

                   तुम रोती हो इस वास्ते सब रोते हैं सुगुरा 

                   हम आज से आवारा वतन होते हैं सुगुरा

                                                           ( अनीस )

     बेटी ! मेरा इम्तिहान शुरू हो चुका है । मुझे बहुत लंबे और दिल हिला देने वाले सफ़र पर जाना हैं । मैं तुम्हें ज़रूर साथ ले जाता मगर मेरी बच्ची तुम बीमार हो । तुम्हे शदीद बुख़ार है , ज़बरदस्त नकाहत है । तुम्हें लम्हा ब लम्हा गुश आ रहा है । तुम सवारी पर भी नहीं बैठ सकोगी । तुम्हें बड़े आराम की जरूरत है । रास्ता पुरहौल भी है और तवील भी । 

     मेरी प्यारी बेटी ! तुझे इस हाल में यहाँ में यहाँ छोड़ते हुए जो मेरा हाल हो रहा है वह तुझ पर कैसे जाहिर करूँ । तुझे यहाँ छोड़ कर जाना भी मेरे लिए बहुत बड़ी मुसीबत है ।

             नाचार यह फ़रकृत का अलम सहता हू सुगुरा 

              है मस्लेहत हक भी यही जो कहता सुगरा

                                                       ( अनीस ) 

             सेहत दे तुम्हें अल्लाह यही बाबा की दुआ है 
             औलाद को राहत हो तो जीने का मज़ा है 
              अब बादिया पैमाई है , ईजा है , बला है
             क्या जानिए शब्बीर की तकदीर में क्या है 
             दिल जलता है जब तप मैं तुम्हें पाता हूँ सुगरा 
             इस रेंज में मैं घुला जाता हूँ सुगुरा

                                                     ( अनीस )

              तुम जाने के काबिल नहीं मैं रह नहीं सकता

               शब से है वह तशवीश को कुछ कह नहीं सकता

               बच्चों में कोई तुम से ज़्यादा नहीं प्यारा

              मजबूर हूँ बेजिर नहीं अब कोई चारा 

              फुरकृत में सदानाला व फुरियाद करूँगा उतरूँगा 

              जो मंज़िल पे तुम्हें याद करूँगा 

                                                         ( अनीस )

        बाबा की दर्द भरी और वाज़ेह गुफ्तगू सुनकर मज़लूम बीमार के दिल की धड़कन और भी तेज़ हो गई । फिर गुश की हालत होने लगी । शिद्दत करब से आँखें बंद होती जा रही थीं लेकिन न जाने सुगुरा किस कुव्वत के सहारे बेहोशी के जाल को तोड़ दिया । बीमार की यह आख़िरी कोशिश थी जिसने लरजते हुए जिस्म को सँभाला दे दिया । पानी का प्याला क़रीब था , बुखार से काँपते हुए हाथों को सँभाल कर प्याले को उठाया , चंद घूँट पानी पीकर बचे हुए पानी के आँखों पर छींटे मारे । लगों पर ज़बरदस्ती की मुस्कराहट पैदा करके इमाम से मुख़ातिब होती है । "

    बाबा मेरी नब्ज़ देखो अब में तंदरूस्त हूँ । अब तो सारा बुख़ार उतर गया है मेरे बाबा । मैं अब बिल्कुल ठीक हूँ । मामूली सी नक़ाहत है सो वह भै आपकी ज़ियारत से दूर हो ही जाएगी । 

   " अगर आप चाहें तो मैं चल फिर कर भी दिखा सकती हूँ । प्यारे अब्बूजान अब मुझे ज़रूर साथ ले चलें । 

     मैं आप के बहुत काम किया करूँगी , बाबा ! मैं अली असग़र का झूला झुलाया करूँगी । वह मेरे साथ बहुत मानूस है । मेरी गोद में आकर कभी रोता नहीं । बाबा मैं उसे कभी नहीं रोने दूँगीं अगर मैं साथ न गई तो वह बहुत रोयेगा । अम्मी जान को और आपको बहुत परेशान करेगा । 

          मैं आप के कपड़े भी धोया करूँगी , बाबा ! अम्मी के भी काम आऊँगी । आटा गूँधूगी , रोटियां पकाऊँगी । अब्बाजान मैं आपके खेमों में झाडू भी दिया करूँगी । आप के जाएनमाज़ को हर वक्त साफ रखूँगी ।

     सवारी कम है तो जब भी कोई बात नहीं । मैं आपकी सवारियों के पीछे पीछे दौड़ती हुई चलती रहूँगी , बाबा ! जब मैं आपकी सवारी के पीछे दौडूंगी तो पसीना आ जाने से बाक़ी मांदा बुखार भी बिल्कुल उतर जाएगा । 

               कुछ भूख का शिकवा नहीं करने की यह बीमार 

               पानी जो कहीं राह में माँगूँ तो गुनाहगार 

               गर्मी मैं भी राहत से गुज़र जाएगी बाबा 

                आएगा पसीना तप उतर जाएगी बाबा

                क्या तब अगर मुँह से कहूँ दर्द है सिर में

               उफ तक न करूँ भड़के अगर आग जिगर में

               भूले से भी शब को कराहूँगी सफ़र में

                कुरबान गई छोड़ के न जाओ , मुझे घर में

                 हो जाना ख़ाफ़ा राह में गर रोएगी सुगुरा

               याँ नींद कब आती है जो वाँ सोएगी सुग्रा

                हर सुबह मैं पी लूँगी दवा आप बनाकर

                दिन भी मेरी गोद में रहेंगे अली असगर

                मैं यह नहीं कहती कि अम्मारी में बिठा दो 

                बाबा मुझे फ़िज़ा की सवारी में बिठा दो

                                                        ( अनीस )

 बीमार बच्ची के मासूम जज़्बे की कैफियत को अल्फ़ाज़ बीमार ने खुद को तंदरुस्त साबित करने के तर्ज़ पर ढाला जा सकता लिए आख़िरी कोशिश भी करके देख ली । 

       सुगरा ने कहा : -बाबा ! मैं आपको चल फिर कर दिखा सकती हूँ । आप देख लें मैं अब बिल्कुल नहीं गिरुँगी । यह जुमला कहते ही अपनी तमाम ताकृत को जमा करके मज़लूम बच्ची पूरे एतेमाद के साथ खुद को सँभालते हुए उठी । अभी पहला क़दम ही उठाया था कि चक्कर आ गया और तेवरा कर गिर पड़ी । 

बच्चों से लेकर बड़ों तक की चीखें निकल गईं । घर भर में कोहराम मच गया । इमाम आली मुकाम के दिल से हूक उठती है ।

       आप बेहोश बच्ची की तरफ देख कर फ़रमाते है : -मेरी प्यार बेटी ... ! अल्लाह तआला तुम पर रहम फ़रमाए । 

        जाने - पिदर ! बाप तेरी इस मासूम कोशिश ख़्वाहिश थी कि जिस तरह भी हो सके तो हमारे कुर्बान । तेरी बीमारी के साथ मुकाबला करके देख लिया । बीमारी जीत गई और तू हार गई ।

     प्यारी सुगुरा ! बाप तेरे इस मुकद्दस जज़्बे की कद्र करता है । हुसैन तेरे दिल की कैफ़ियत को पूरी तरह जानता है । 

।      मरे सीने में भी दिल है बेटी । मैं सब कुछ महसूस कर रहा हूँ । मेरी बेटी , औलाद के ग़म को जानता हूँ । तू मेरी औलाद है । अगर तुझे बिछड़ने का गुम है तो तेरे बाबा हुसैन को दोहरा गुम है । एक अपना गुम है और एक तेरे गुम का गुम । बेटी यह तकदीरे - इलाही है इसे क़बूल करो । मैं भी ख़ुदा की रज़ा को क़बूल करता हूँ और तू भी कर 

    जाने - पिदर ! अगर बाबा की रज़ा की बात होती तो मैं तुझे अभी तंदरुस्ती अता कर देता । लेकिन तेरे गुम को सीने में लेकर इस दर्दनाक सफ़र का आग़ाज़ करना है । मुझे नाना के मदीना को इसी हालत में छोड़ना है कि तेरा बुख़ार में जलता हुआ जिस्म और सुता हुआ ज़र्द चेहरा हर वक़्त मेरी आँखों के सामने रहे , मुझे तेरा ग़म तड़पाता रहे और मैं इस करब और बेकरारी को सीने में दबाता हुआ अपना सफ़र जारी रखूँ ।

 मेरे दिल के टुकड़े सुगुरा ! अल्लाह तआला तुझे शिफ़ा ए कामिल नसीब फ़रमाए , तू जल्द सेहतयाब हो जाए । बाबा की दुआ है कि तेरा बुख़ार मुझे आ जाए । तेरी बीमारी मुझे मिल जाए और तंदरुस्त हो जाए । 

इमाम आली मुकाम की गुफ़्तगू ने घर भर को मातमकदाह बना कर रख दिया । सीने से उठने वाले गुम के तूफ़ान आँखों के रास्ते आँसुओं की नहरें बनकर रवाँ थे ।

 मज़लूम बच्ची सकीना रोती हुई , बाप के सीने से लिपट जाती है । आप ने इर्शाद फ़रमाया : -बेटी एक बार अपनी बहन सुगुरा को होश में लाओ । बाप उसे आखिरी बार अलविदा कहना चाहता है ।

   शहज़ादी ए हुसैन जनाब सकीना आगे बढ़ती है । बीमार के मुँह पर छींटे मारती है और होश में लाने की कोशिश करती है : -

                   कहती थी सकीना कि बहन आँखें तो खोलो 

                   कुछ बात करो हम से ज़रा मुँह से तो बोलो

                       हम जाते हैं तुम उठ के बगलगीर तो हो लो

                       छाती से लगो बाप की दिल खोल के रो लो

                    तुम जिन की हो शैदा वह ब्रादर न मिलेगा

                     फिर घर में जो ढूंढोगी तो अकबर न मिलेगा

                        असग़र को करो प्यार कलेजे से लगाकर

                        हुशियार हो ! क्या देर से बेहोश हो ख़्वाहर 

                    छाती से लगो उठके खड़ी रोती है मादर

                     हम रोते हैं ! देखो तो ज़रा आँख उठाकर

                       अफ़सोसे इस तौर से गुफ़लत में रहोगी ?

                        क्या आख़िरी बार बाबा की ज़ियारत न करोगी 

                                                               ( अनीस ) 

           मुँह पर पानी के छींटे देने से बीमार ने आँखें खोल दीं । नका पहले से कई गुना बढ़ गई है । साथ चलने की आस भी टूट चुकी है । अब तो उठकर बैठ जाने की भी हिम्मत नहीं । तस्वीरे यास व नाउम्मीदी बने हुए हर एक का चेहरा देखे जा रही है , सीने के अंदर उठने वाले तूफ़ान का इज़हार भी नहीं किया जा सकता । ' 

            आँखें हैं जैसे पथरा गई हों , चेहरा ज़र्द है , बात करने को जी चाहता है , लेकिन होंट थर्रा कर रह जाते हैं । तमाम अहले बैयत चुपके चुपके से रहे हैं और बीमार को देखते जा रहे हैं । किसी में भी बात करने का हौसला नहीं । बात की भी जाए तो कौन सी .... बिल्कुल यां मालूम होता था जैसे सब किसी लाश के पास खड़े हों और हसरत व यास के साथ देखते जा रहे हों । इस सुकराते मौत जैसे आलम में इमाम आली मुकाम की दर्द में डूबी हुई आवाज़ उभरती है । 

 मेरी बच्ची ! हमें इन हसरतज़दा निगाहों से न देखो । हमारे सीने छलनी हो जाएंगे । प्यारी सुगुरा सबर करो ! सबर मेरी बेटी , सबर ही से इन गुमों का मदावा हो सकेगा , हमे बहुत देर हो गई है । सफ़र तवील है हम को सुबह तुलूअ होने से पहले पहले सफ़र का आग़ाज़ कर देना चाहते हैं । मेरी बच्ची अल्लाह तआला तुझे जल्द सेहतयाब फ़रमाए । ' 

.      चलने फिरने के काबिल हो जाओ , तो नाना के हुजूर में हमारे लिए दुआ करने को जाना । अपनी दादी मख्दूमा ए कायनात खातूने कयामत के हुजूर रोज़ हाज़िरी देना और बाबा के लिए दुआ करती रहना । खुदा हाफ़िज़ मेरी सुगरा , खुदा हाफ़िज़ ! गुमज़दा हुसैन की बेटी अलविदा ! बच्ची के सिर पर आखिरी प्यारे देकर इमाम आली मुकाम हुज्रा से बाहर तशरीफ़ ले आते हैं । खाना ए हैदर की इज्ज़त , नामूस ए मुस्तफा , बुलिस्ताने फातिमा की कलियों को सवारियों पर बिठाया , सामाने सफर तैयार हो चुका था , एक बीमार थी जिसे उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे सल्मा रज़ियल्लाहु अन्हू की किफालत में देकर हाश्मी ख़ानदान की औरतों और हज़रत अब्दुल्लाह बिन जाफ़र को पूरा पूरा ख्याल रखने का इर्शाद फ़रमाया । 

.      अजीब बात है कि मदीना को बसाने वाले खुद मदीना से दूर जा रहे हैं । बीमार सुगुरा को भी हज़रत ज़ैनब के घर में रहना था । गोया आज हुज्रा ए फ़ातिमा ख़ाली हो गया है । वह मुक़द्दस घर जिस में अपनी हयाते ज़ाहिरी इमामुलंबिया सल्लल लाहु अलिहि व सल्लम रोज़ाना तशरीफ़ लाते थे आज उसकी तालाबंदी हो रही है । 

                            रूबाई 

                        गली गली मदीने वही चीखा उठी 

                        जदों को बिलादे शहसवार दुरया

                        ईहते जिगरा हुसैन दा ई जान दा ऐ 

                        क्यों बच्ची न दे के प्यार टुरया 

                        टुरया कोई नही घराँ नॅ छिड्डा ईन्

                         जिवे फातिमा व माह अनवार टुरया 

                         रौन्दा हो या हुसैन जीशान सायम 

                        जिन्दरे अम्मा दे हुये न मार टुरया 

                                                      ( सायम चिश्ती ) 

       सवारियां अभी दरवाजे के पास ही मौजूद हैं कि हुजरा के अंदर से दर्द में डूबी और लरजती हुई मद्धम सी आवाज़ आई : - ऐ मरे . अली असगर ! 

बीबी सुगरा की वालिदा बेताब होकर इमाम आली मुकाम की बारगाह में अर्ज करती हैं : - ऐ नामूसे - मौहम्मद के मुहाफ़िज़ ! ऐ मेरे सरताज ! एक बार सुगरा की चारपाई बाहर मँगवा दें । सिर्फ एक लम्हा के लिए मेरे सरताज , मुझ से इस की दर्दनाक चीख़ बर्दाश्त नहीं हो सकी । बीमार को सिर्फ दो बातें कर लेने दें ।

        इमाम आली मुकाम ने जल्दी जल्दी बीमार की चारपाई दरवाज़े के करीब लाने का हुक्म दिया : - 

                 सुगरा को नकाहत से न श्री ताकते रफ्तार 

                 दरवाजे के पास आके यह कहती थी वह बीमार 

                 कबान गई आख़िरी दीदार करा दो

                अम्माँ मुझे असगर को फिर इक बार दिखा दो

                 मुजतिर हुई सुनकर यह सुख्न बानीए बेपर

                 पर्दे से जिगर बंद का मुँह कर दिया बाहर

                 बेटी से कहा , दस्ते पिसर माथे पे रख कर

                 लो आख़िरी तस्लीम बजा लाते हैं असगर

                  मुँह ज़र्द है रुख़्सारों पें आँसू भी वह रहे हैं 

                  यह नरगिसी आँखों से तुम्हे देख रहे हैं

                  थरते हुए हाथ उठाकर वह पुकारी

                  इस हाथ के इस चाँद से माथे हैं वारी 

                  आखिर कोई दिन में है बस अब मौत हमारी

                 भय्या नहीं जीने की मैं फुरकत में तुम्हारी

                जब आके फिर इस झूले को आबाद करोगे

                  तुम भी मिरी गोदी को बहुत याद करोगे 

                                                               ( अनीस ) 

           बहन भाई से आखिरी गुफ्तगू कर लेती है , फिर चारपाई अंदर रखवा दी जाती है । सवारियों को चलने का हुक्म देकर करबला का मुसाफिर नानाजान के रोजा ए अकदस की जानिब मुँह करके आख़िरी कलाम करता है ।


नोट 

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